पश्चिम बंगाल चुनाव में ममता बनर्जी की धमाकेदार जीत, असम में भाजपा और केरल में वाम गठबंधन की वापसी, यूपी पंचायत चुनाव में भाजपा की सिकुड़ती ताकत, बंगाल में चुनाव पश्चात हिंसा और श्मशान में शहनाई की तरह बजते आईपीएल की दुकान बंद होने जैसे कई घटनाएं हाल में घटी हैं, जिनपर लिखे जाने की अपेक्षा कई मित्रों को थीं। लेकिन लगा कि कोरोना का महाभयंकर शिकंजा इन सब पर भारी है।
आपदाएं आती हैं, बड़े हादसे भी होते हैं, लेकिन मौत का ऐसा चौतरफा मंजर सचमुच अकल्पनीय है।
ऐसा मंजर जो व्यक्ति, समुदाय और सम्प्रदाय निरपेक्ष है। जिसके निरंकुश तांडव में हमारी लाचारियों और मूर्खताओं के कर्कश घुंघरू भी बज रहे हैं।
आलम यह है कि कब आपका कौन-सा हंसता-बोलता परिचित या परिजन अचानक घुटती सांसों के बीच दम तोड़ देगा, कल्पना करना भी मुश्किल है।
अब दिन की शुरुआत ही किसी न किसी के चल बसने की खबर से होती है। एक के दिवंगत होने की खबर का झटका मंद भी नहीं पड़ता कि किसी दूसरे के जाने का सदमा झकझोर देता है। कहां तक गिनती करें।
एक को श्रद्धांजलि देकर मन कुछ हल्का होता है तो किसी दूसरे के बिछुड़ने के गम में सांत्वना के नए शब्दों की तलाश शुरू करनी पड़ती है। उफ्फ ये असमाप्त श्रद्धांजलियों का दौर कब थमेगा?
जिस कदर कोरोना वायरस इस देश में कहर ढा रहा है, उसमें सरकार, व्यवस्था और समाज तो दोषी हैं ही, वो ईश्वर भी कहीं जिम्मेदार है, जो लाखों-कराहों को अनसुना किए बैठा है। हादसे में मौतें तो सुनी थीं, लेकिन एक अदृश्य वायरस कुछ ही घंटों में परिवार के परिवार के लील जाएगा, यह सूचना भी भीतर से कंपा देती है। यानी एक के जीने की आस बंधती है तो दूसरा दुनिया से उठ जाता है। हम यह सब होते देख रहे हैं, उसे रोकने की हैसियतभर कोशिश भी कर रहे हैं, लेकिन लगता है काल के हाथ हमारे हाथों से कई गुना लंबे और निष्ठुर हैं।
वो समय शायद गया, जब अंतिम यात्रा या अंत्येष्टि भी जीवन का आखिरी लेकिन अनिवार्य संस्कार होती थी। 'श्मशान वैराग्य' के साथ ही सही, लोग अपनों को आखिरी विदाई के लिए एकत्र होते थे। सच्चे या अधूरे मन से ही सही दिवंगत की आत्मा की शांति के लिए दो शब्द कहते थे। दो मिनट का मौन रखते थे।
शोकाकुल परिवार को 'सब ठीक होगा' कहकर हिम्मत बंधाते थे। यह जानते हुए भी दुनिया उसी जीवटता से और उसी कुटिलता के आगे बढ़ती रहेगी। कहीं कोई फर्क पड़ने वाला नहीं है।
'श्मशान वैराग्य' मैंने इसलिए कहा कि श्मशान घाट में मृतक को अंतिम विदाई देते समय चिता से उठते धुएं या कब्रिस्तान में एक मुट्ठी खाक डालते वक्त क्षणभर के लिए ही जीवन की क्षण भंगुरता का अहसास भीतर तक होता है। यानी एक 'खेला' है, जो आदमी अपने तयशुदा किरदार के हिसाब से खेलकर किसी और दुनिया में चल देता है।
तब लगता है कि ऐसा जीना भी क्या जीना..! लेकिन मनुष्य है कि यह भाव वह अगले ही क्षण झटक कर नई चुनौतियों से जूझने के लिए सन्नद्ध हो उठता है, क्योंकि जीवन चलने का नाम है। श्मशान भूमि पर उपजा क्षणिक वैराग्य विश्राम घाट से निर्गम होते ही हवा के झोंके में विलीन हो जाता है।