कुछ लोग भले इसे नकारात्मक सोच मानें, लेकिन कोरोना 2 ने एक बार फिर इंसान के दो चेहरों को बेनकाब कर दिया है। एक तरफ वो लोग हैं, जो दिन रात एक कर कोविड के जानलेवा हमले से मरीजों को अपनी जान जोखिम में डालकर बचाने में जुटे हैं तो दूसरी तरफ वो हैवान हैं, जो इस महाआपदा में भी अवसर खोज कर इंसानियत के मुंह पर कालिख पोत रहे हैं।
दवाइयों की कालाबाजारी नई बात नहीं थी, लेकिन इस कोरोना काल में हमने जीवन की प्रतीक ऑक्सीजन और अस्पताल के बेड की भी कालाबाजारी और लूट देखी, जो शायद 'भूतो न भविष्यति है।'
गुजरात के एक ऑक्सीजन निर्माता कंपनी के मालिक का यह बयान हिला देने वाला है कि जीवन में कभी सोचा नहीं था कि लोग ऑक्सीजन की एक-दो बोतल तक के लिए इस कदर मिन्नतें करेंगे।
इस कोरोना काल 2 में जहां एक तरफ डॉक्टरों, मेडिकल स्टाफ, प्रशासन, पुलिस, मीडिया, सामाजिक संस्थाएं तथा कोरोना के खिलाफ लड़ाई में शामिल कुछ और लोग थक कर चूर होने के बाद भी मनुष्यता की मशाल बाले हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ इंसानियत की उसी लौ पर कुछ लोग बेशर्मी के साथ अपनी रोटियां सेंकने रहे हैं। इसमें वो हैवान तो शामिल हैं ही, जिनकी संवेदनाएं मर चुकी है, लेकिन वो राजनेता भी शामिल हैं, जिनके लिए कोरोना संकट मानों वोट पकाने की भट्टी बनकर आया है।
सचमुच कठिन समय है
'सांसे टूटने' या 'सांसें छीन लेने' जैसे दर्दीले काव्यात्मक प्रयोग अब अस्पतालों के दैनंदिन नजारों में तब्दील हो चुके हैं। चिकित्सा के नोबल कारोबार में भी निकृष्टता के नए मानदंड हमें देखने को मिलेंगे, यह सोचना भी मुश्किल था। शिवपुरी के एक अस्पताल में वॉर्ड ब्वॉय द्वारा पैसे लेकर एक का ऑक्सीजन मास्क हटाकर दूसरे को लगा देना शायद हैवानों को भी लजा देगा। चंद सांसों के लिए लोग गिड़गिड़ा रहे हैं और सांसों के अभाव में स्वजनों को अपनी आंखों के सामने दम तोड़ता हुआ देख रहे हैं। अब सवाल तो यह है कि ऑक्सीजन से लेकर ईमान तक क्या है, जो बिक नहीं रहा?
कोविड जैसी संक्रामक महामारी से मरने वाले के शवों को छूने तक से परिजनों के परहेज की घटनाएं पिछले साल भी देखने को मिली थीं। एक बेटा तो अपनी मां के अंतिम संस्कार से भी मुकर चुका था। लेकिन अब तो मामला उससे भी एक कदम आगे जा चुका है।
अंतिम संस्कार के लिए भी हो रही हैं दिक्कतें
कोविड से मरने वालों की लाश देखकर पड़ोसी दरवाजे बंद कर लेते हैं और शैतान मृतक के शरीर से गहने तक उतार ले जाते हैं। शायद इसलिए, क्योंकि दुनिया तो जीने वालों की है। उधर निजी अस्पतालों में शव देने के लिए भी लाखों रुपये मांगे जा रहे हैं। शव मिला तो अंतिम संस्कार के लाले हैं।
श्मशान घाट और कब्रिस्तान में भी अंतिम संस्कार के लिए नंबर लग रहे हैं और अंत्येष्टि जरा जल्दी हो जाए, इसके लिए रसूखदारों से सिफारिश लगवाने की नौबत आ गई है। ऐसे में यमराज के यहां क्या स्थिति होगी, इसकी कल्पना ही की जा सकती है। ऐसे में असली देवदूत वही प्रशासन के लोग हैं, जो सिर्फ मानवता के नाते अंजान शवों को भी अग्नि दे रहे हैं।