इस समय कोरोना वायरस से पूरी दुनिया जूझ रही है। चीन कुछ हद तक संभला है लेकिन पूरी तरह नहीं। यूरोप और अमेरिका में संकट है। जहां तक भारत की बात है फिलहाल भारत की स्थिति इस समय बेहतर है। लेकिन हालात गंभीर हैं।
बहरहाल, कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में बहुत व्यापक स्तर पर बदलाव किए हैं। पर्यावरण के साथ सामाजिक विषमता और उसके भीतर छिपी चिंताओं को लेकर मनुष्य सभ्यता और जाति को नई तरह से सोचने के लिए विवश किया है। मनुष्य के आपसी संबंध, यंत्रणाएं और महानगरों के यांत्रिक जीवन ने मनुष्य को अकेला कर दिया हैैै। यही एकाकीपन उनमें बदलाव ला रहा है। महामारी के डर से शहरों में विस्थापित आबादी अपने घरों की ओर लौट रही है। जबकि बढ़ता विस्थापन एक बड़ी समस्या हुआ करता था। ऐसे ही नदियों का प्रदूषण, और दिल्ली की खराब हवा बड़ी चिंता थी।
भारत की बात करें तो प्रदूषण, सामाजिक एकता, आपसी भावना और पूरा देश इस समय एक परिवार की तरह एकजुट दिखाई दे रहा है। जाहिर है विपदा के समय नई तरह से सोचने का सिलसिला शुरू हुआ है। ऐसे में देश बीते दो दशकों में रोजी-रोटी की तलाश में ग्रामीण आबादी के विस्थापन के प्रति एक नया नजरिया सामने आता है।
उद्योग, फैक्ट्री, रोजगार के साधन के बीच आबादी के बोझ से दबे जा रहे शहरों की समस्याओं के प्रति इस समय सोचने का समय है। साथ गांव, कस्बों से लगातार काम की तलाश में भटक रही आबादी को भी उनके केंद्र में लौटाने की योजना बनाने का भी समय है। गांव की ओर लौटो या फिर गांधी की ग्रामीण अर्थव्यस्था की संभावनाएं यहीं आकार लेती हुई दिखाई देती हैंं।
यकीनन ये बदलाव हैं लेकिन रोजगार और पलायन के संकट के बदले ऐसे बदलाव स्वीकार्य नहीं है। ऐसे में ये सीख मिलती है कि स्वाभाविक हुए इन बदलावों से सरकारें सीखें और और नई योजनाएं बनाएं, नए सिरे से गांवों को बदलने की तैयारी करे।
दरअसल, ये तैयारी होगी उन गांवों को नए सिरे से सजाने और संवारने की। जहां के लोग तमाम सुविधाओं के लिए बड़े-बड़े शहरों की ओर रुख करते हैं। अब जब कोरोना के खौफ में इन गांवों के लोग शहरों से वापस अपने ठिकाने पर लौट आए हैं तो सरकार के पास यही सबसे मुफीद वक्त है कि वह गांव को बेहतर तरीके से तैयार करें। ऐसा गांव जो उनकी जरूरतों को पूरा कर सके। वह जरूरतेंं पूरी करें जिसके लिए गांव के लोग शहरों में जाते हैं। जिसमें रोजी रोटी के अच्छे साधन। अच्छी शिक्षा और स्वास्थ सेवाओं के साथ मनोरंजन के साधन हों।
गांवों में लाना होगा विकास
यही वह वक्त है जब हमें अपने ग्रामीण इलाकों को अर्बनाइजेशन के पैटर्न पर डेवलप कर सकते हैं। सरकार चाहे तो इंडस्ट्रीज को गांव में स्थापित करे। इसके लिए आवश्यक है अगर छोटी-छोटी इंडस्ट्रीज को दस बीस गांव के बीच में एक छोटे से क्लस्टर में बनाकर लगाया जाए। जैसे स्पेशल इकनोमिक जोन बनाए जाते हैं वैसे ही स्पेशल विलेज इंडस्ट्रीज जोन बनाए जाएं।
देश में सड़कों का बहुत अच्छा नेटवर्क है। उस नेटवर्क के सहारे जब गांव जुड़ सकते हैं तो वहां उद्योग भी खोले जा सकते हैं। इसको इस तरह से सोचिए। जब यूपी, बिहार, झारखंड, छतीसगढ़, पश्चिम बंगाल का मजदूर हज़ारों मील दूर दिल्ली मुम्बई जाकर कमा सकता है तो वो अपने आसपास के दस बीस किलोमीटर के बीच मे बसाए जाने वाले स्पेशल विलेज इंडस्ट्री जोन में जाकर वही काम और पगार क्यों नहींं ले सकता। ऐसा करके गांव के लोग जो शहरों की ओर आते हैं उनको अपने इलाको में ही रोककर सभी सुविधाओं को मुहैया कराया जा सकता है।