मनरेगा को सरकार की अन्य योजनाओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए- सांकेतिक तस्वीर
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इसने गरीब घरों की जरूरत के अनुसार बकरी, मुर्गी और मवेशी शेड उपलब्ध कराया है, सार्वजनिक वस्तुओं का निर्माण किया है, जिन्होंने ग्रामीण आय में वृद्धि की है। आधार के आने से मनरेगा भुगतान में फायदा देखना को मिला है। लेकिन फिर भी कुछ समस्याएं है जो सुलझाने की जरूरत है देरी से मुआवजे का भुगतान करने से बचने के लिए प्रणाली विकसित हो क्योंकि मजदूरी के भुगतान में देरी जानबूझकर दबा दी जाती है।
18 राज्यों में मनरेगा मजदूरी दरों को राज्यों की न्यूनतम कृषि मजदूरी दरों से कम रखा गया है। काम की बढ़ती मांग के कारण योजना धन से बाहर चल रही है। कई राज्यों में सूखे और बाढ़ के कारण काम की मांग बढ़ गई है। राज्यों में मनरेगा मजदूरी में डाटा की असमानता है। कृषि न्यूनतम मजदूरी लगभग सभी राज्यों में मनरेगा मजदूरी से अधिक है।
मनरेगा को सरकार की अन्य योजनाओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, ग्रीन इंडिया पहल, स्वच्छ भारत अभियान आदि। मनरेगा के तहत कार्यों को पूरा करने में देरी हुई है और परियोजनाओं का निरीक्षण अनियमित रहा है।
इसके अलावा, मनरेगा के तहत काम की गुणवत्ता मुख्य मुद्दा है। स्थानीय स्तर के सामाजिक आडिट, फंडिंग और परिणामों की ट्रैकिंग पर ध्यान देने के माध्यम से मनरेगा के मांग-संचालित पहलुओं को मजबूत करने की आवश्यकता है। राज्य सरकारों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हर गांव में सार्वजनिक काम शुरू हो। कार्यस्थल पर काम करने वाले श्रमिकों को बिना किसी देरी के तुरंत काम प्रदान किया जाना चाहिए।
स्थानीय निकायों को निश्चित रूप से वापस लौटे और प्रवासी श्रमिकों की खोज करनी चाहिए और जॉब कार्ड प्राप्त करने की आवश्यकता वाले लोगों की मदद करनी चाहिए। पारदर्शिता और सरपंचों की जवाबदेही को बेहतर बनाने के लिए, यह अनुशंसा की जाती है कि मनरेगा की परियोजनाओं को गाव-स्तर पर ही सही, न कि ग्राम पंचायत स्तर पर ही ट्रैक किया जाए।
जहां आज सब कुछ बंद है वहां ग्रामीण क्षेत्र में मनरेगा योजना रोजी-रोटी का सहारा बनकर उभरी है। गांव में प्रवासियों के लिए रोजगार के रास्ते खुले हैं और लोगों को भूखे पेट सोना नहीं पड़ रहा।
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