भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुडी समस्याओं पर ध्यान देने की आवश्यकता है- सांकेतिक तस्वीर
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किसी भी वैश्विक महामारी का इतिहास इस बात की तसदीक करता है, कि महामारी से केवल मानव शरीर ही प्रभावित नहीं होता। अपितु लोगों की मनोवैज्ञानिक स्थिति से लेकर सामाजिक ताने-बाने को भी इसका खामियाजा भुगतना पड़ता है। यदि समाजार्थिक ताने बाने पर बदलाव होंगे तो निश्चित तौर पर मानसिक स्थिति पर गहरा संकट पैदा हो सकता है, जैसा मौजूदा दौर में हो रहा है।
खौफ के इस वातावरण में अवसाद, चिंता, पैनिक अटैक, तनाव, एंग्जाइटी इत्यादि की समस्या काफी बढ़ गई है। ऐसी स्थिति में जब डब्ल्यू. एच. ओ. ने कहा है कि भारत में तकरीबन 7.5 प्रतिशत लोग किसी न किसी तरह के मानसिक विकार से ग्रस्त हैं।
समाज और सरकार की चिंता और भी बढ़ती हुई नज़र आ रही है। संकट के इस दौर में सरकार को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं के साथ लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। समाज और सरकार को समाजार्थिक मापदण्डों को पूरा करने के लिए बेहतर खाका तैयार करने की आवश्यकता है। ताकि वर्तमान और भविष्य में भी आसानी से इस तरह की समस्याओं से निपटा जा सके।
राष्टृीय मानसिक स्वास्थ्य और स्नायु विज्ञान संस्थान ’’निमहांस’’ बेंगलुरू के एक सर्वे के अनुसार भारत में कम से कम 13.7 प्रतिशत सामान्य जनसंख्या किसी न किसी मेंटल डिसऑर्डर से ग्रसित है। जिनमें से 10.6 प्रतिशत लोगों को तत्काल किसी मैडिकल फैसिलिटी की आवश्यकता है।
भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुडी समस्या पर बेहद ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि भारत में हर 20 में से एक व्यक्ति डिप्रेशन का शिकार है। जिसमें 10 प्रतिशत जनसंख्या को काॅमन प्राॅब्लम है और 1.9 प्रतिशत लोगों को सीरियस मेंटल डिसऑर्डर है। ऐसे ज्यादातर मामले ग्रामीण इलाकों की जगह शहरों में ज्यादा देखे जा रहें हैं। जानकारी और तत्काल राहत न मिल पाने के कारण 60 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो मानसिक अस्वस्थता में किसी भी तरह की दवा नहीं करा पाते।
भारत में मानसिक रोगों के प्रति जागरूकता का आभाव है। ज्यादातर मामलों में मानसिक रोगी को पागल ही समझा जाता है। समाज का गलत बर्ताव कई बार मानसिक विकार को छुपाने के अहम कारण बनते हैं। लोग समाज की अवहेलना के डर से मानसिक रोगी से जुड़ी जानकारी अपने परिवार से भी साझा नहीं कर पाते। जिसके कारण छोटी मोटी समस्या भी विकराल रूप ले लेती है।
देश में मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल के लिए जितने मनोचिकित्सक की आवश्यकता है, उतने नहीं हैं- सांकेतिक तस्वीर
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डब्ल्यू.एच.ओ. की माने तो विश्व में सबसे ज्यादा मानसिक रोगी भारत में ही हैं। इसलिए भारत को वर्ड की मोस्ट डिप्रेस्ट कंट्री की संज्ञा भी दी जाती है।
ऐसा माना जाता है कि देश में मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल के लिए जितने मनोचिकित्सक की आवश्यकता है, उतने नहीं हैं। आंकडे बताते हैं कि प्रत्येक 100,000 लोगों के लिए देश में मात्र एक मनोचिकित्सक है, जबकि डब्ल्यू.एच.ओ के मानदण्डों की बात करें तो प्रत्येक 100,000 लोगों पर कम से कम तीन मनोचिकित्सक होने चाहिए।
हालांकि भारत सरकार के द्वारा मानसिक स्वास्थ्य समस्या से लड़ने के लिए समय-समय पर कई प्रयास किए गए हैं, जैसे-
- सन् 1982 में राष्टृीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरूआत करना।
- सन् 1987 में मेंटल हेल्थ एक्ट का लागू किया जाना।
- सन् 1996 में जिला मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम की शुरूआत।
- सन् 2014 में राष्टृीय मानसिक स्वास्थ्य नीति की घोषणा करना।
- मेंटल हेल्थ एक्ट, 1987 की जगह 2017 में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 का लाया जाना।
विडबंना इस बात की है, कि सरकार की इन कोशिशों का बावजूद भारत में अभी भी मानसिक स्वास्थ्य समस्या किसी चुनौती से कम नहीं प्रतीत होती। मौजूदा परिस्थिति इस बात का प्रमाण देती हैं कि मानसिक स्वास्थ्य समस्या का पुख्ता हल समाज और सरकार को मिलकर ही तलाशने होंगे।
महामारी से जुडे मुद्दों पर लोगों की निरंतर काउंसलिंग, सलाह आदि के माध्यम से समझ मजबूत करनी चाहिए। लोगों में उपजे भय और तनाव को कम करने के लिए योग, मेडिटेशन, शिक्षा आदि के माध्यम से लोगों को मानसिक स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता उत्पन्न करनी चाहिए। तभी सही मायने में हम महामारी के साथ-साथ मानसिक स्वास्थ्य सम्बंधित समस्याओं से मुस्तैदी से लड़ पाने में सक्षम होंगे।
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