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कोराना वायरस: इस महामारी के अंत के बाद एक नई शुरुआत का मौका

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कोराना के कोहराम के आगे सब नतमस्तक हैं
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कोराना के कोहराम के बीच घर पर बैठे हम सब हालात के आगे नतमस्तक हैं। कहीं ना कहीं ये वक्त हमें एहसास दिला रहा है कि समय से शक्तिशाली कुछ भी नहीं। साथ ही यह एक मौका है सोचने का,समझने का और महसूस रहने का कि जीवन की इस आपाधापी में हमसे क्या छूट गया था। कुछ अपने थे जो रुठ गए थे। कुछ रिश्ते थे जिसमें गांठ पड़ गई थी। सपनों और संघर्ष के बीच अपनो से जो दूरी थी उसे पाटने का मौका हमें आज मिला है। कुछ सीखना था, कुछ बातें थी, कुछ शौक थे, कुछ जज्बा था. कुछ जज्बात थे जो तेज गति से गुजरती जिंदगी की गाड़ी से दिखाई नहीं दे रहे थे।

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अब वक्त मिला है कि हम ठहर कर वो सब देख सकें। हम ये समझ सकें कि हमने क्या खोया,क्या पाया? जो पाया वो क्या काफी है? जो खोया वो क्या ठीक था? 

वैसे अगर हम ध्यान से देखें तो आज जो चीजें हमारी जिंदगी में वापस आ रही हैं क्या वो नई हैं? शायद नहीं, ये तो वो चीजें हैं जो हमारे साथ बचपन से थीं। इसमें कुछ भी नया नहीं बल्कि ये तो बहुत पुरानी है, इतनी पुरानी कि इसे हम भूल चुके थे। इसीलिए आज हमें ये नई सी महसूस हो रही है।

जीवन की ऊंंचाइयों को पाने की हसरत में हम इतना मशगूल थे कि ये भूल गए थे कि जीवन में पैसा और प्रसिद्धि ही सबकुछ नहीं है। सबसे जरूरी है खुश रहना। जीवन का असली मकसद है मुस्कुराना और मुस्कुराहट बांटना।
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जरा ध्यान से सोचिए सच तो यही है ना? जिस सोशल डिस्टेंसिंग की बात हो रही है वो दरअसल अपने परिवार के करीब आने के एक बहाना है। बाहर की दुनिया को थोड़ी देर छोड़ कर अपनी घरेलू दुनिया को फिर कनेक्ट करने का वक्त है।

ये सब नया नहीं ये वो बाते हैं जो हम सब भूल गए थे। अपने घर,परिवार और दोस्तों को वक्त देना कोई नहीं बात नहीं बल्कि ये भी वो बात है जिसे हम भूल चुके थे। मॉल,क्लब,पार्टी को छोड़कर अपने साथ रहना,अपने आप में रहना भी कोई नहीं बात नहीं बल्कि यही जिंदगी जीने के सही तरीका है। अपने आप को वक्त देना,अपने को समझना,अपने को पहचानना यही तो इंसान का अल्टीमेट लक्ष्य है।

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कोरोना के बाद के हालात का दूसरा पहलू थोड़ा सुखद है....

कोरोना के बाद प्रकृति ने राहत की सांस ली है
कभी वक्त ना मिलने की शिकायत करने वाले लोग आज वक्त ना कट पाने का गिला कर रहे हैं। इस खाली समय में अपने को शांति और शक्तिशाली बनाए रखने के लिए आध्यात्म का सहारा लिया जा रहा है।

ये भी कोई नया थोड़े है। ये तो सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा है। योग और ध्यान तो 5000 साल पुरानी हमारी सांस्कृतिक परंपरा है। कोरोना महामारी की वजह से ये सारी चीजें हमें याद आ रही हैं। हर स्थिति और परिस्थिति के दो पहलू होते हैं।

कोरोना के बाद के हालात का दूसरा पहलू थोड़ा सुखद है। दुनिया की स्पीड कम हो गई है। लोगों का घर से निकलना कम हो गया है। सड़क पर गाड़ियां ना के बराबर हैं। इससे हमारी प्रकृति ने राहत की सांस ली है।

हमारे तेज और भीड़ भरी जिंदगी के बीच नेचर का भी दम फूल गया था। आज खुला आसमान, चिड़ियों की आवाज,ताजी हवा हमें छूकर जाने लगी हैं। कुछ भी नया नहीं वही पुरानी बाते हैं, जिन्हे हम खो बैठे थे।

आखिर में सबसे महत्वपूर्ण बात। आज की नई परिस्थिति में हमारे सामने नए हालात और पुरानी बातों में सामंजस्य बनाने की बड़ी चुनौती है। इस माहामारी के अंत के बाद हम सबके सामने एक नई शुरुआत का मौका है।

जब एक बार फिर सामान्य जीवन शुरू होगा तो शायद हम सबके हिस्से की दुनिया थोड़ी-थोड़ी बदल चुकी होगी। इस बदलाव में हमें अपने अंदर के उस इंसान को बनाए और बचाए रखना है जिसे हम सब ने इस लॉकडाउन में अपनी आत्मा से महसूस किया है।

शायद अब भौतिकता की भागम-भाग से ज्यादा हमको अपनी खुशी और अपनो की खुशी को प्राथमिकता देना की जरूरत होगी। ये सब अपनी जड़ों से जुड़ने जैसा है। जो है,जैसा है उसमें खुश रहना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है। 

अगर घोसला उजड़ने के बाद भी चिड़िया खुश रह सकती है तो इंसान सीमित संसाधन में प्रसन्न क्यों नहीं रह सकता?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 
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