कोरोना के बाद प्रकृति ने राहत की सांस ली है
कभी वक्त ना मिलने की शिकायत करने वाले लोग आज वक्त ना कट पाने का गिला कर रहे हैं। इस खाली समय में अपने को शांति और शक्तिशाली बनाए रखने के लिए आध्यात्म का सहारा लिया जा रहा है।
ये भी कोई नया थोड़े है। ये तो सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा है। योग और ध्यान तो 5000 साल पुरानी हमारी सांस्कृतिक परंपरा है। कोरोना महामारी की वजह से ये सारी चीजें हमें याद आ रही हैं। हर स्थिति और परिस्थिति के दो पहलू होते हैं।
कोरोना के बाद के हालात का दूसरा पहलू थोड़ा सुखद है। दुनिया की स्पीड कम हो गई है। लोगों का घर से निकलना कम हो गया है। सड़क पर गाड़ियां ना के बराबर हैं। इससे हमारी प्रकृति ने राहत की सांस ली है।
हमारे तेज और भीड़ भरी जिंदगी के बीच नेचर का भी दम फूल गया था। आज खुला आसमान, चिड़ियों की आवाज,ताजी हवा हमें छूकर जाने लगी हैं। कुछ भी नया नहीं वही पुरानी बाते हैं, जिन्हे हम खो बैठे थे।
आखिर में सबसे महत्वपूर्ण बात। आज की नई परिस्थिति में हमारे सामने नए हालात और पुरानी बातों में सामंजस्य बनाने की बड़ी चुनौती है। इस माहामारी के अंत के बाद हम सबके सामने एक नई शुरुआत का मौका है।
जब एक बार फिर सामान्य जीवन शुरू होगा तो शायद हम सबके हिस्से की दुनिया थोड़ी-थोड़ी बदल चुकी होगी। इस बदलाव में हमें अपने अंदर के उस इंसान को बनाए और बचाए रखना है जिसे हम सब ने इस लॉकडाउन में अपनी आत्मा से महसूस किया है।
शायद अब भौतिकता की भागम-भाग से ज्यादा हमको अपनी खुशी और अपनो की खुशी को प्राथमिकता देना की जरूरत होगी। ये सब अपनी जड़ों से जुड़ने जैसा है। जो है,जैसा है उसमें खुश रहना ही सबसे बड़ी उपलब्धि है।
अगर घोसला उजड़ने के बाद भी चिड़िया खुश रह सकती है तो इंसान सीमित संसाधन में प्रसन्न क्यों नहीं रह सकता?
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