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कोरोना से जंग: महामारी के बाद के दुष्परिणामों से कैसे बचेंगे हमारे बच्चे? पोषण, शिक्षा और विकास की क्याा होगी योजना?

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कोरोना जैसी महामारी के हमारे बच्चों पर दूरगामी परिणाम होंगे - फोटो : Social Media
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मानवता के इतिहास में शायद ऐसा पहला मौका आया है जब एक महामारी ने, बिना किसी भेदभाव और द्वेष के, धर्म, जात, रंग और भाषा के आधार पर बंटी और बिखरी हुई इस दुनिया को एक साझी लड़ाई के लिए एकजुट कर दिया है। यह एक अविश्वसनीय सत्य है जिसे हम अस्वीकार नहीं कर सकते हैं।

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एक अति-सूक्ष्म विनाशकारी वायरस 'कोरोना' जिसे नग्न आंंखों से भी नहीं देखा जा सकता उसने एक विशालकाय दुनिया में रहने वाली मानव-जाति को एक-बिंदु पर ला खड़ा किया है। यह विनाशक वायरस कितना घातक है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि इसने 210 देशों में अपने पदचिन्ह फैला लिए हैं। 1 लाख से अधिक लोगों ने इसके कारण अपनी जान गंवाई है।

ऐसा नहीं है कि यह विनाशकारी वायरस केवल इंसानों की जिंदगियां निगल रहा है बल्कि यह तो उनकी आने वाली पीढ़ियों और उनके बच्चों के भविष्य व वर्तमान को भी अपना निशाना बना रहा है। यह भुखमरी, बेरोजगारी, अवसाद, गरीबी और न जाने कितनी सामाजिक बुराइयों को जन्म देने वाला है। दुनिया के कई बड़े अर्थशास्त्री पहले ही इस संकट से उत्पन्न होने वाली आर्थिक मंदी की आशंका जता चुके हैं। कई बहुराष्ट्रीय कंपनियां बंद हो जाएँगी। कई देशों की अर्थव्यवस्था विकास की पटरी से उतर कर गर्त की और जाने लगेगी। 
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यह मंदी कई घरों की बर्बादी का कारण बनेगी। लाखों लोगों के रोजगार छिन जायेंगे। बेरोजगारी के कारण घरेलु हिंसा के मामलों में बढ़ोतरी देखने को मिलेगी और इस हिंसा की आग में हमारे बच्चों को भी झुलसना पड़ेगा। देश के ग्रामीण इलाकों में किसानों को घर का खर्च उठाने में बिना आमदनी के परेशानी हो सकती है। वे कर्जदार हो सकते हैं। ऐसे में बाल-तस्करी और बाल-श्रम के मामले और उभर कर सामने आ सकते हैं। छोटी-छोटी बच्चियों को वैश्यावृति में धकेल कर उनका शारीरिक और मानसिक शोषण किया जा सकता है। 
 

सबसे ज्यादा समस्या मिड डे मिल का आसरा लेने वाले बच्चों की है। - फोटो : सोशल मीडिया
कोरोना काल और उसके बाद भी यह महामारी बच्चों के मानसिक और बौद्धिक स्तर को प्रभावित करेगी। बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार इससे भारत में 40 मिलियन बच्चे प्रभावित हुए हैं इसमें सड़कों पर रहने और भीख मांगने वाले बच्चे शामिल हैं। बड़ा प्रश्न है कि हम अपने बच्चों को, जो आगे चलकर देश के सुनहरे भविष्य की कहानी लिखेंगे, उन्हें इस महामारी के प्रभाव और प्रकोप से कैसे बचा सकते हैं।

यह ऐसा समय है जब देश की शैक्षिक संस्थाएंं बंद हैंं। बच्चों को वो आधारभूत शिक्षा नहीं मिल पा रही है जो उनके बौद्धिक विकास के लिए अत्यंत जरूरी है। उन बच्चों के बारे में भी सोचना होगा जिनका पेट स्कूलों में चलने वाली मिड-डे मील योजना की वजह से भरता था। पौष्टिक आहार की बात तो छोड़िए उनके घरों में दो-जून की रोटी भी नहीं है।

ऐसे बच्चे कुपोषण का शिकार बनेंगे। उन बच्चों के शारीरिक और बौद्धिक विकास की जिम्मेदारी कौन लेगा? यह देश की सरकारों और हमारे सभ्य-समाज की नैतिक और सामाजिक जिम्मेदारी है कि हमारे यह असहाय और अनभिज्ञ बच्चे आधारभूत शिक्षा और पौष्टिक आहार से वंचित न रह पाए। उनका वही शैक्षिक, बौद्धिक और शारीरिक विकास हो जिसके वे हकदार हैं 

यहांं एक बात महत्वपूर्ण हैं कि महानगरों में जहां बिजली, इंटरनेट, मोबाइल और लैपटॉप आसानी से उपलब्ध है वहां बच्चों के लिए वैकल्पिक ऑनलाइन शिक्षा की व्यवस्था की जा सकती है। लेकिन ऐसी व्यवस्था को ग्रामीण क्षेत्रों में अमलीजामा पहननाना बेहद ही मुश्किल काम होगा।आज भी देश में ऐसे गांंव है जहांं बिजली, मोबाइल और इंटरनेट नहीं पहुंच पाया है या फिर इसकी संख्या कम है।

ऐसी स्थिति में, सरकारों को एक ऐसी बाल उन्मुख नीतियां बनाने की आवश्यकता है जिससे कोरोना के इस दौर में बच्चों के शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास की रफ़्तार में कमी न आने पाए। उनको कोरोना से बचाने के लिए जरुरी कदम भी उठाएं जाएं। वैश्विक स्तर पर कोरोना ने बच्चों को भी संक्रमित किया है। 

कोरोना से उत्पन्न हुए इस संकट में देश की समाजसेवी संस्थाओं का योगदान अहम रहने वाला है। यह संस्थाएं आज देश की सरकारों के साथ कंधे से कन्धा मिला कर बिना किसी स्वार्थ के अपने लोगों की सेवा में जुटी हुई हैं। सरकारों ने भी कई मौकों पर उनके किए जा रहे कार्यों को सराहा है। ऐसी संस्थाएं देश की सरकारों और लोगों के बीच एक माध्यम और 'सेतु' का काम कर सकती हैं। देश की नीतियों को अमलीजामा पहनाने में इन संस्थाओं का योगदान महत्वपूर्ण है। महामारी के इस काल में भी 'चाइल्ड हेल्पलाइन' नंबरों पर शिकायतों का दौर जारी है।
 
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देश को जल्द से जल्द इस महामारी से निजात पानी होगी - फोटो : अमर उजाला
बाल उत्पीड़न और तस्करी के मामले भी उभर कर सामने आ ही रहे हैं। ऐसे में जरुरत है यह समाजसेवी संस्थाएं बाल अधिकारों की रक्षा के कार्यों को सुचारु रूप से जारी रखें। साथ ही कोरोना से प्रभावित बच्चों की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में सहयोग दें। चाहे बात बच्चों को पौष्टिक आहार प्रदान करने की हो या फिर आधारभूत शिक्षा की, यह संस्थाएँ हर तरह से बच्चों के लिए वरदान साबित हो सकती हैं।

इस महामारी ने बच्चों के मन-मष्तिष्क पर गहरी चोट की होगी इन संस्थाओं द्वारा काउंसलिंग के माध्यम से उन पर पड़ने वाले मनोवैज्ञानिक कारकों के प्रभावों को कम किया जा सकता है। यह संस्थाएं बच्चों के लिए इन-डोर गेम्स की सुविधा मुहैया करने में भी सहयोग कर सकती हैं इससे इस लॉकडाउन और महामारी के दौर में बच्चे अपना ध्यान सकरात्मक चीज़ों में लगा सकें। 

ऐसे में इन समाजसेवी संस्थाओं की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे पूरी तत्परता के साथ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करें और देश और समाज ने जो बाल अपराध रहित समाज का सपना संजोया है उसे साकार बनाने में कदम से कदम मिलाकर हर बुराई से लड़े भी और जीते भी। क्योंकि कहते हैं न बुराई के सामने सर्वदा अच्छाई की ही जीत होती है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।


 
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