प्रश्न अनेक हैं, जिनके उत्तर सरकारी जांच की अंधेरी गलियों में गुम होना निश्चित हैं, क्योंकि ये तो मजदूर हैं, इनकी जान की कीमत कुछ भी नहीं है। मरने पर कोई पांच लाख लगा लेता है, किसी के लिए कम होगी, किसी के लिए ज्यादा..। घर जाने का उत्साह था या विवशता..नहीं कह सकते, हां, रोटी और रोजी की तलाश तो थी ही, जो साठ किलोमीटर पैदल चलकर स्टेशन पहुंचे।
सरकारों और उनके प्रशासन की निष्ठुर व्यवस्थाओं ने ही ली है इन निर्दोष सोलह श्रमिकों की जान, लेकिन अपने कहने से क्या? क्या इन मौतों का दर्द सत्ता और प्रशासन के गलियारों में अनुभव किया जा सकेगा? नहीं, होगा तो बस इतना, कागजों में लीपापोती..कुछ पैसे सरकार दे रही है, कुछ शायद रेलवे दे देगी..सब खामोश..।
बहस-बयानबाजी और मौतों का आंकड़ाें ....सियासत जारी है
मजदूरों को लेकर देश भर में बड़ी बहस सी छिड़ी है। प्रधानमंत्री से लेकर मुख्यमंत्रियों तक के बयान आ रहे हैं। ट्रेनें चल रही हैं। बसें भी आ-जा रही हैं, मजदूरों को भरकर। इस बीच, कहीं खबर आती है, रेलवे पैसे ले रही है, कहीं आती है कि रेलवे राज्य सरकारों से ले रही है। कभी कोई राजनीतिक पार्टी ऐलान कर देती हैं कि वो पैसे देगी। फिर कुछ राज्य सरकारें ऐलान कर देती हैं कि वो मजदूरों को मुफ्त वापस लाएंगी। दूसरी तस्वीर यह कि वे पैदल चल रहे हैं। उनके पांवों में छाले पड़ गए हैं।
मजदूरों की हजारों और सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलने वाली तस्वीरें कम नहीं हो रहीं। रास्ता चलते मौत के आंकड़े भी बढ़ रहे हैं। बहुत से मजदूर रेल की पटरियों के किनारे किनारे चल रहे हैं ताकि घर तक पहुंचने का कोई सीधा रास्ता मिल जाए। मज़दूर न तो ट्विटर पर है।
न फेसबुक पर और न न्यूज़ चैनलों पर। वरना वो देखता कि उन्हें लेकर समाज कितना असंवेदनशील हो चुका है। सरकारें तो खैर संवेदनशीलता की खान हैं, घोषणाओं पर घोषणाएं। ऐलान-दर-ऐलान। लेकिन ये मौतें फिर क्यों...? किसी के पास है जवाब?
औरंगाबाद में दर्दनाक हादसेे में निर्दोष लोगों की जान चली गई।
- फोटो : ANI
शर्म मगर हमें नहीं आती
ये ठीक है कि कोरोना वायरस की महामारी से पूरा विश्व भयाक्रांत है, महाशक्ति कही जाने वाली सरकारें और विकसित से विकासशील तक तक तकरीबन पूरे देश से इससे परेशान हैं। भारत भी कोरोना से इसी तरह पीडित है लेकिन क्या भारत ने इससे निपटने की तैयारी में कहीं कोई चूक की? फौरी तौर पर तो ऐसा नहीं लगता लेकिन लॉक डाउन के तीसरे दौर तक आते आते यह तो साफ हो गया है कि सरकार को इसका अंदाज तो था कि इससे चरणबद्ध तरीके से बढाया जाना होगा। तो क्या केंद्र सरकार और राज्य सरकारें इसका अनुमान लगाने और इंतजाम करने में नाकाम रहीं कि उद्योगाें के बंद होने से बेरोजगार होने वाले श्रमिकों के रहने, खाने और रुकने की व्यवस्था क्या होगी?
जाहिर है प्रधानमंत्री ने मालिकों से वेतन न काटने और समाजसेवियों से भोजन आदि देने की भावुक अपील की थी लेकिन वेतन नहीं देने पर मालिकों का क्या किया जाएगा?
फैक्टरियां बंद रहेंगी और वेतन भी देना होगा तो मालिकों का क्या होगा? सरकार ने पैकेज और खातों में पैसा डालने और तीन माह का राशन देने का ऐलान किया और उस पर अमल भी किया लेकिन क्या वह हो पाया?
और क्या वह पर्याप्त था? जाहिर सामान्य हालात में भी योजनाएं जमीन पर वैसी नहीं उतर पातीं जैसी वे कागज में होती हैं, तो फिर इस अभूतपूर्व आपातकाल में तो उतरना संभव ही नहीं था, नतीजा सामने है।
अफवाह तंत्र, अवसर का बेजा लाभ उठाने की राजनीतिक दुरभिमंशाएं सबने अपने काम किया और निशाने पर वही था जो गरीब है, विपन्न है और असहाय है अपने घरों से सैकडों मील दूर है। कोई ऐसे ही सैकड़ों मील पैदल नहीं चल पड़ता। नेताओं को समझना चाहिए कि टीवी चैनलों की बहसों, भव्य दफ्तरों से बाहर की दुनिया और हकीकत बेहद कठिन है। डीए और एरियर के लिए बिलबिलाने वाले सरकारी मुलाजिमों की सी सुरक्षा निजी क्षेत्र के मुलाजिमों और मजदूरों को क्या नहीं दिला पाती सरकारें?
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