फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

गांव और कोरोना महामारी: एक शब्द 'भावई' की कहानी

सार

पिताजी, ताऊजी जिन्हें हम सब दादा कहते थे, यह शब्द बोलते थे खासकर किसी मुसीबत के आ टपकने पर। इस शब्द की देशज उत्पत्ति की कथा अब सामने आई कोरोनाकाल में। पिताजी इन दिनों करीब करीब रोज ही यह कथा सुनाते हैं.
विज्ञापन
बचपन से गांव में, कस्बे में हर किसी से यह शब्द सुनता आया हूं। - फोटो : अमर उजाला।
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

मेरा मन सदैव देसज शब्दोँ की रम्यता और उनके देसज बनने  की यात्रा को जानने को उत्सुक रहता है बचपने से ही। पिताजी की ग्राम्य पृष्ठभूमि और मेरा जन्म कस्बे में होने से सदा देसज बोली, शब्द मन में रचे बसे रहते हैं। आज इस शब्द भावई की बात। बचपन से गांव में, कस्बे में हर किसी से यह शब्द सुनता आया हूं।

विज्ञापन


पिताजी, ताऊजी जिन्हें हम सब दादा कहते थे, यह शब्द बोलते थे खासकर किसी मुसीबत के आ टपकने पर। इस शब्द की देशज उत्पत्ति की कथा अब उदघाटित हुई कोरोनाकाल में। पिताजी इन दिनों करीब करीब रोज ही यह कथा सुनाते हैं, आंखों देखी और भोगी हुई। उन्हीं की जुबानी- 'संवत 2013 (ई. सन 1956 ) में आषाढ़-सावन-भादों (जून-जुलाई-अगस्त) में ऐसी बीमारी फैली की देश भर में लाखों लोग मर गए थे।

एक तो इलाज, डॉक्टर, अस्पताल थे ही नहीं, कोसों एकाध छोटी सरकारी अस्पताल थी भी तो सुविधाएं न थी, फिर बीमारी ने मौका भी न दिया। लोग झाड़ फूंक के भरोसे भगवान के सहारे बचने का प्रयास करते। हमारे गांव बरबाई (तहसील कुरवाई, जिला विदिशा- मप्र) की आबादी तब 500 से कम ही थी, तीन दर्जन से अधिक मौतें हुई थी। लोग मौत से आतंकित थे, इसे नाम दिया भावई मने भयावह। पिताजी दूसरे गांव में थे, दोनों बड़े भाई दो अलग अलग गांवो में भागवत कथा कह रहे थे। भावई पड़ी तो हर गांव में मौत ही मौत। तीनों गांवों के बाहर झोपड़ी बनाकर रहे और तीन माह घर नहीं लौटे।
विज्ञापन

 

विज्ञापन

गांव में कोरोना के मामले तेजी से बढ़, लेकिन इलाज कितना मिला सवाल यही है। - फोटो : अमर उजाला।
यहां हम करीब 17-18 साल के और 8- 9 साल उम्र के छोटे भाई। भाई की आंखो में बीमारी हो गई, आंखे चिपक गई। देसी घरेलू इलाज जारी था। घर के बाहर गुरसी में कंडे की आग में गुड डालकर लगातार धूनी देते रहते थे। हमारा घर गांव के चंद सौभाग्यशाली घरों में था, जहां इस भावई में सब सुरक्षित रह पाए। घर के सामने ' बंगला' में कष्ट निवारण के लिए संकीर्तन चल रहा था, उन लोगों में से एक तो बीमार होकल ऊपर से लुढ़के और खतम हो गए।

तीन लघुशंका को गए और वहीं गिरकर मर गए। उधर एक घर में कोई दामाद अपनी पत्नी को लिवाने आए थे, सास ससुर पत्नी और वे खुद एक ही दिन में चटपट हो गए..छोटा सा बेटा ही जीवित रहा। गांव में महामायी के चबूतरे पर बैठा पंडा लोगों को भावई से मुक्त करने नीम के झौरे से झाड़नी दे रहा था, आसपास के गांव से आई जातरू यानी भीड़ लगी थी, भीड़ में से तीन चार चक्कर खाकर गिरे और मर गए। पंडा चबूतरे पर से गिरा और मरा तो भगदड मच गई। भादों के महीने में भारी।

और लगातार बारिश...कैसै अंतिम संस्कार हो, नाले में लाशे बहाने के अलावा कोई चारा नहीं। कुछ दिन बाद स्वास्थ्य कर्मियों की टीम जिसमें तीन लोग थे, आई तो लोग उन्हे भगा देते..उसमें से भी एक की मौत हो गई। वैसे महामारी फिर कभी नहीं देखी, अब 65 साल फिर, मौतें लेकिन यह भावई से फिर कम है, इलाज तो मिल पा रहा है, फिर भी कोरोना भावई सा ही है।

पिताजी की इस भावई व्यथा कथा को अगर सरकारी रिकॉर्ड रिपोर्ट्स में देखें तो 1956- 57 के एशियन फ्लू में भारत में मौतों की अधिकृत संख्या 10 लाख थी, प्रधानमंत्री थे पंडित जवाहरलाल नेहरू। सरकार कोई भी हो जनता को पक्का यकीन है कि संख्या दो गुनी से ज्यादा होती है कम नहीं। नेहरू इसके सात साल बाद तक आजीवन प्रधानमंत्री रहे। भावई का पूरा सच शायद कभी पता ही न चले। आज मीडिया, सोशल, अनसोशल तमाम तरह का मीडिया है, स्वतंत्र, गुलाम सर्वे, जांच एजेंसियां हैं, श्मशानघाट, कब्रिस्तानों को गूगल मैप से लेकर कई तरीके से देखा निगरानी में रखा जा सकता है।

कोरोना से मौतों का सरकारी आंकड़ा करीब तीन लाख हो चुका है...यानी भावई मने एशियन फ्लू का करीव 30-35 प्रतिशत..। तीसरी लहर की आशंका....वैरियंट्स की कतार...साइड इफेक्ट्स...भावई तो है... उस भावई से बचने का वक्त और बचाव, इलाज न था, इस भावई से बचने के उपाय, वक्त, इलाज सब मौजूद है,, बच सकते हैं....खुद बचिए, दूसरों को सचेत कीजिए...बचाइए। मास्क लगाइए, फिजिकल डिस्टेंस रखिए, सेनेटाइज कीजिए...बारी आने पर वैक्सीन लीजिए...भावई मत बनिए।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें