जब भी दुनिया में तेल की कीमतें गिरती हैं, चीन अपने रिजर्व भंडार को फुल कर देता है।
इस समझौते के बाद चीन और भारत पर इसका उल्टा असर पड़ेगा। कोरोना कहर के चलते दोनों देशों पर आर्थिक मंदी की जबरदस्त मार पड़ी है। चीन ने तो अब कोरोना से ध्यान हटाकर अपने उपाय करने शुरू कर दिए हैं। प्रतिदिन उसके निर्यात का ग्राफ ऊपर जा रहा है। लेकिन भारत के लिए यह उतना आसान नहीं है। एक तो भारत की तेल भंडारण क्षमता अत्यंत सीमित है। वह केवल अपने नौ दिन की जरूरत का तेल भंडार में रख सकता है। उसकी यह क्षमता पांच मिलियन टन की है। अगर भारत के विशेषज्ञ युद्ध स्तर पर काम करके इसे 25 मिलियन टन रिजर्व क्षमता पर ले जाएं तो बहुत लाभ होगा। करीब डेढ़-दो महीने का सुरक्षित तेल भंडार किसी भी देश को अनेक चिंताओं से मुक्त कर देता है।
उदाहरण के तौर पर चीन को देखें तो पाते हैं कि उसकी रिजर्व तेल भंडारण क्षमता लगभग 90 मिलियन टन है। जब भी दुनिया में तेल की कीमतें गिरती हैं, चीन अपने रिजर्व भंडार को फुल कर देता है। जब तेल के मूल्य बढ़ते हैं तो चीन के माथे पर चिंता की रेखाएं गहरी नहीं होतीं।इसके अलावा एक कारण और भी है। भारत अपनी आवश्यकता का 86 फीसदी तेल आयात करता है। इसमें खाड़ी देशों का बड़ा हिस्सा है। ईरान से तेल आयात न्यूनतम हो जाने के बाद अमेरिका से आयात शुरू हो गया है। जिन देशों से तेल आयात करते हैं, उनकी अर्थव्यवस्था चौपट होने से भारत के इन देशों को निर्यात पर भी असर पड़ेगा। यह एक तरह से दोहरी मार जैसा है। इन मुल्कों में डेढ़ से दो करोड़ भारतीय रोजगार पा रहे हैं। वहां मंदी की मार से इन भारतीयों के बेरोजगार होने का संकट खड़ा हो सकता है।
भारत में अक्सर पूछा जाता है कि जब सारे संसार में तेल की कीमतें कम होने का लाभ उपभोक्ताओं को मिलता है, तो यहां क्यों नहीं? यह ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर किसी परदे में नहीं है। सरकारी प्रवक्ताओं का कहना है कि अगर तेल के दाम गिरने पर सरकार जनता को राहत नहीं देती तो कीमतें बढ़ने पर भी वह एक सीमा से ऊपर नहीं जाने देती। इसमें आंशिक सच्चाई हो सकती है, मगर हकीकत तो यही है कि इससे सरकार का खजाना भरता है और उसका घाटा कम होता है।
एक उदहारण काफी होगा। छह साल पहले पेट्रोल पर सरकार का टैक्स 10.50 रूपए प्रति लीटर था और डीजल पर केवल तीन रूपए। आज यह टैक्स बढ़कर 23 रूपए प्रति लीटर पेट्रोल पर और 18 रूपए प्रति लीटर डीजल पर हो गया है। इससे सरकार को कोई ढाई से तीन लाख करोड़ रूपए की अतिरिक्त आमदनी हो रही है। भारत की भंडारण क्षमता बढ़ जाने पर इसमें और इजाफा हो सकता है। लेकिन इतना तो तय है कि अगस्त तक कच्चे तेल की कीमतें 40 डॉलर प्रति बैरल हो जाएंगीं और उसके बाद हिन्दुस्तान को फिर महंगाई के नए सिलसिले का सामना करना पड़ सकता है।
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