''असम को अवैध विदेशियों से मुक्त करना जरूरी है''
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राज्य में अब तक विदेशी न्यायाधिकरणों की ओर से विदेशी घोषित व्यक्ति इस फैसले को हाईकोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दे सकता था, लेकिन सरकार के ताजा रुख से अब उसके सामने इसका मौका नहीं होगा।
लेकिन असम सरकार की दलील है कि असमिया जाति की पहचान बचाने के लिए घुसपैठ को पूरी तरह रोकना और असम को अवैध विदेशियों से मुक्त करना जरूरी है। मुख्यमंत्री का कहना है कि निहित स्वार्थ वाले कुछ तत्व और संगठन सरकार के इस प्रयास का विरोध कर रहे हैं। हिमंता ने कांग्रेस की भी खिंचाई की है। उन्होंने इस काम में आम लोगों से भी सहयोग की अपील की है।
उधर, राज्य के ताकतवर छात्र संगठन अखिल असम छात्र संघ (आसू) ने भी सरकार की पुश बैक की नीति का समर्थन करते हुए कहा है कि इसे जारी रखना जरूरी है। संगठन के मुख्य सलाहकार समुज्ज्वल भट्टाचार्य कहते हैं कि अगर इसे बीच में रोक दिया गया तो लोग समझेंगे कि सरकार ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए वोट बैंक के लिए ही इसे शुरू किया था।
कई अल्पसंख्यक संगठनों ने सरकार के इस रवैए के प्रति नाराजगी जताते हुए इसका विरोध किया है। अल्पसंख्यक-बहुल राजनीतिक संगठन ऑल इंडिया यूनाइटेड माइनॉरिटी फ्रंट (एआईयूडीएफ) ने सरकार की इस नीति के खिलाफ राज्यपाल गणेश आचार्य को एक ज्ञापन सौंपा है। उसका आरोप है कि अवैध विदेशियों की शिनाख्त करने के नाम पर भारतीय मुसलमानों को परेशान किया जा रहा है। अवैध आप्रवासी के बहाने लोगों को बेवजह गिरफ्तार और परेशान किया जा रहा है। उनमें से ज्यादातर की नागरिकता साबित होने के बाद उनको रिहा कर दिया गया है।
राज्य के अल्पसंख्यक छात्र संगठनों ने सरकार की इस नीति के खिलाफ आंदोलन की चेतावनी दी है। उनका कहना है कि बांग्लादेशियों को खदेड़ने के नाम पर राज्य के अल्पसंख्यकों को बेवजह परेशान किया जा रहा है।
हिमंता बिस्वा सरमा के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह मुद्दा काफी जोर पकड़ चुका है
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एक अल्पसंख्यक छात्र संगठन ऑल बीटीसी माइनॉरिटी स्टूडेंट्स यूनियन ने इस नीति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की थी। याचिका में दावा किया गया था कि असम सरकार उचित कानूनी प्रक्रिया के बिना ही लोगों को विदेशी नागरिक मानकर हिरासत में ले रही है और उन्हें बांग्लादेश सीमा के पार भेज रही है। कई मामलों में राज्य के नागरिकों के साथ भी ऐसा हो रहा है। यह उनके संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। लेकिन शीर्ष अदालत ने इस पर सुनवाई से इंकार करते हुए याचिकाकर्ता को गौहाटी हाईकोर्ट में याचिका दायर करने को कहा है।
दूसरी ओर, सौ से ज्यादा बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं ने भी एक खुला पत्र जारी कर पुश बैक नीति को संविधान और मानवाधिकार विरोधी करार दिया है। लोगों की पहचान की पुष्टि के बिना जबरन सीमा पार भेजने की वजह से बांग्लादेशी अधिकारी उनको जेल भेज सकते हैं। इसके अलावा इस कवायद के दौरान बांग्लादेशी सुरक्षाबलों की ओर से फायरिंग में जान गंवाने का भी खतरा है।
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि वैसे तो सीमा पार से घुसपैठ की समस्या राज्य में दशकों पुरानी है। अस्सी के दशक में आसू के बैनर तले इसके खिलाफ असम आंदोलन भी हो चुका है। लेकिन भाजपा के सत्ता में आने और खासकर हिमंता बिस्वा सरमा के मुख्यमंत्री बनने के बाद यह मुद्दा काफी जोर पकड़ चुका है। एनआरसी के दौर में भी इसमें काफी तेजी आई थी.
एक राजनीतिक विश्लेषक सुमन ठाकुरिया कहते हैं कि सरकार ने अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए पुश बैक की कवायद को तेज करने का फैसला किया है। अल्पसंख्यकों के प्रति मुख्यमंत्री हिमंता का नजरिया किसी से छिपा नहीं है। इस मुद्दे पर उन्होंने अपना रुख साफ कर दिया है।
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