ललिता ने उस संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करते मात्र 13 साल की उम्र में स्कूल में हो रहे छुआछूत के विरूद्ध मुखरता से आवाज उठाई।
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एक अन्य उदाहरण राष्ट्रीय बाल पंचायत की सरपंच ललिता का दिया जा सकता है। संविधान की मूल भावना है कि उसकी नजर में सब बराबर हैं। अस्पृश्यता का कोई स्थान न होगा और सबको गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार मिलेगा। ललिता ने उस संवैधानिक अधिकार का प्रयोग करते मात्र 13 साल की उम्र में स्कूल में हो रहे छुआछूत के विरूद्ध मुखरता से आवाज उठाई। समाज तथा स्कूल प्रशासन को उस बच्ची के सामने झुकना पड़ा।
ललिता के कारण केवल उसके स्कूल से भेदभाव नहीं मिटा बल्कि उस गांव में भी दलितों की सामाजिक स्थिति सुधरी जहां कि वह बाल सरपंच थीं। ललिता ने भी अपने अधिकार का इस्तेमाल कर खुद का जीवन बदला और और फिर अपने कर्तव्य का इस्तेमाल कर लोगों के जीवन में बदलाव लाया। इन बच्चियों की अपने अधिकारों के प्रति सजगता और अन्याय के विरूद्ध आवाज उठाने के संकल्प में हम आजादी का अमृत महोत्सव देख सकते हैं।
इस अवसर पर प्रस्तावना के दो अन्य शब्दों ‘समता’ और ‘व्यक्ति की गरिमा’ का भी उल्लेख विशेष रूप से जरूरी हो जाता है। समता का अधिकार देते समय संविधान उससे बच्चों को बाहर नहीं रखता। ऐसा कहीं कोई संदर्भ नहीं है जो बच्चों को बराबर मानने से रोकता हो। फिर हम उनका अधिकार उनसे क्यों छीन रहे हैं? आज भी लाखों बच्चों का बचपन गुलाम है और वे बाल मजदूरी के लिए अभिशप्त हैं। उनके लिए अमृत महोत्सव का यह अर्थ रहेगा!
हमें बच्चों की गरिमा का भी ध्यान रखना होगा। उनके भी सुझाव हो सकते हैं, उनकी भी सहमति और असहमति हो सकती है। यह अवसर आजादी के उत्सव का है इसलिए मैं कहूंगा कि भारत के बच्चों के साथ न्यायपूर्ण होने की आवश्यकता है। कोविड से सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चे ही हुए हैं। लेकिन दुनियाभर में इससे पैदा हुए संकट से उबरने के लिए जो आर्थिक अनुदान दिए गए, उनमें बच्चों के लिए हिस्सा बहुत ही मामूली है। हमें उनको उनका हिस्सा देना चाहिए।
हमारे संविधान की बड़ी खूबी है कि यह संशोधनों के लिए खुला है। जरूरत के अनुसार इसमें संशोधनों ने बड़े परिवर्तनों का सूत्रपात किया है। बच्चों के अधिकारों और उनके कल्याण के लिए भी संशोधनों के माध्यम से कई प्रावधान किए गए हैं। जिससे बच्चों को शिक्षा जैसे अधिकार मिले और उनके हर तरह के शोषण के विरूद्ध कानून बनाए गए। लेकिन, हमारे नीति निर्धारकों को थोड़ा और उदार होने की आवश्यकता है।
जैसा की श्री कैलाश सत्यार्थी कहते है कि बच्चों और शोषितों के प्रति सोचते समय हमें करूणा से भरे होने की आवश्यकता है। जात-पांत के भेदभाव को पूरी तरह खत्म करने और वास्तव में महिलाओं की समानता सुनिश्चित करने के लिए उदारमना होने की जरूरत है। इस अमृत महोत्सव में हमें उनके हिस्से का पूरा अमृत उन्हें देना होगा। हमारे बच्चों को उनके हिस्से का पूरा अमृत चाहिए। हम राजनैतिक नेतृत्व और नीति निर्माताओं से इतनी “करूणा” की आशा तो रख ही सकते हैं।
(अनिल पांडेय वरिष्ठ पत्रकार और बाल अधिकारों के जानकार हैं।)
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