भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में प्राणियों और राजनीतिक दलों के प्रतीक चिन्हों में पुराना रिश्ता रहा है, लेकिन मजाक में ही सही किसी राजनीतिक पार्टी का नाम किसी तुच्छ समझे जाने वाले जीव पर रखा जाए और सोशल मीडिया में उसके फॉलोअरों की बाढ़ आ जाए, ऐसा पहले शायद ही हुआ है।
हैरानी की बात है कि एक मजबूत संगठन वाली सरकार भी ‘कॉकरोच एप्रोच’ से इतनी डर गई कि उसका सोशल मीडिया अकाउंट बंद करा दिया। हालांकि इस कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के स्वघोषित जनक अभिजीत दिपके ने दूसरा सोशल मीडिया अकाउंट चालू कर अपनी मुहिम चालू रखी।
अभी यह स्पष्ट नहीं है कि आभासी जगत में नवोदित कॉकरोच जनता पार्टी समूचे सिस्टम में बदलाव की एक शुरुआती मगर अभिनव और गंभीर मुहिम है अथवा इसका अंजाम भी किसी तात्कालिक आंदोलन के नतीजे में धूमकेतु की माफिक उभरी और बाद में बोरिया बिस्तर समेटने वाली सियासी पार्टियों की तरह होगा?
चुनाव चिन्ह में 'जानवर'
वैसे भारत सहित कई देशों में राजनीतिक दल अपनी विचारधारा को प्रतीकात्मक स्वरूप देने के लिए कोई न कोई प्राणी चुनते रहे हैं। जैसे कि बसपा का चुनाव चिन्ह हाथी है। पूर्वोत्तर की एक पार्टी एमजीपी का प्रतीक शेर है। लेकिन मानव समाज में सर्वाधिक मजाक का विषय और हेय दृष्टि देखा जाने वाला प्राणी गधा है, वह सियासी पार्टियों में सर्वाधिक लोकप्रिय है।
श्रीमती मेनका गांधी ने बहुत पहले लिखे एक लेख में बताया था कि दुनिया में 48 राजनीतिक दलों का प्रतीक चिन्ह गधा है, इनमें अमेरिका की डेमोक्रेटिक पार्टी भी शामिल है। गधे बेहद परिश्रमी होते हैं, लेकिन न तो बगावत करते हैं और न ही सवाल करते हैं। लेकिन सीजेपी ने तो कॉकरोच को अपना प्रतीक बनाया है।
इसके पीछे तात्कालिक कारण भारत के प्रधान न्यायाधीश द्वारा एक सुनवाई के दौरान की गई टिप्पणी है, जिसमें उन्होंने तंज किया था कि देश में ‘कॉकरोच’ की तरह ऐसे युवा हैं, जिन्हें इस पेशे में रोजगार नहीं मिल रहा है। इनमें से कुछ मीडिया, कुछ सोशल मीडिया और कुछ आरटीआई और दूसरी तरह के एक्टिविस्ट बन रहे हैं। ये हर किसी पर हमला करना शुरू कर देते हैं।’
व्यवस्था पर सवाल उठाने वालों ने इसे अपने पर हमला माना। अमेरिका में पढ़ रहे अभिजीत दिपके को भी यह बात चुभी और उन्होंने सोशल मीडिया पर सवाल फेंका कि क्यों न सारे कॉकरोच एक साथ आ जाएं। इसे व्यापक समर्थन मिला। इसके बाद एक्स पर एक गूगल फॉर्म जारी हुआ।
इसमें 'कॉकरोच जनता पार्टी' लिखी एक तस्वीर के साथ कैप्शन था- 'सभी कॉकरोचों के लिए एक नया प्लेटफॉर्म। पार्टी जॉइन करने के लिए 4 जरूरी योग्यताएं बताई गईं- ‘बेरोजगारी, आलसी, क्रॉनिकली ऑनलाइन, एबिलिटी टू रेंट प्रोफेशनली।'
उसी दिन कॉकरोच जनता पार्टी का ऑफिशियल X हैंडल- @CJP_2029, पार्टी की वेबसाइट cockroachjantaparty.org और इंस्टाग्राम अकाउंट बनाया गया। इससे एक संदेश यह भी गया कि यह पहल कॉकरोच को समाज में मान्यता दिलाने और राजनीतिक दृष्टि से अन्य पार्टियों को चट कर जाने का भाव लिए हुए है।
चूंकि आभासी दुनिया बिना हथियार के लड़ा जाने वाला महायुद्ध है, इसलिए स्थापना के महज पांच दिनों में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने डेढ़ करोड़ से ज्यादा फाॅलोअर जुटा लिए। बताया जा रहा है कि इसमें हर घंटे 5 लाख फाॅलोअर्स जुड़ रहे हैं। यह आंकड़ा बीजेपी और कांग्रेस के इंस्टाग्राम अकाउंट फालोअर्स से कहीं ज्यादा है। सीजेपी के हैंडल्स पर जो कंटेंट से बढ़ते यूथ कनेक्ट से इतना तो सिद्ध हुआ कि देश में बेरोजगार कितनी बड़ी संख्या में हैं।
सोशल मीडिया पर इस की राजनीतिक प्रतिक्रिया होनी ही थी।
- कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा कि कॉकरोच जनता पार्टी इस बात का स्पष्ट संकेत है कि आज देश का युवा भयंकर गुस्से में है। उन्होंने विपक्ष को सलाह दी कि वह युवाओं से सीधा संवाद करे।
- पूर्व क्रिकेटर और सांसद कीर्ति आज़ाद ने नई पार्टी में शामिल होने की इच्छा जताई। टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा ने भी इसका समर्थन किया।
- राजनीतिक विश्लेषक योगेन्द्र यादव ने कहा कि यह देश के युवाओं में व्यवस्था को लेकर दबे असंतोष की सोशल मीडिया अभिव्यक्ति है, जो आगे चलकर गंभीर रूप ले सकती है।
दूसरी तरफ नवजात सीजेपी पर अपना कानूनी मालिकाना हक जताने के लिए भी जंग शुरू हो गई है। मामला कॉकरोच जनता पार्टी के रजिस्टर्ड ट्रेडमार्क का है। इसके लिए दो लोगों ने आवेदन कर किए हैं। क्या इंटरनेट मीम और वायरल नामों पर भी मालिकाना हक तय किया जा सकता है? सोशल मीडिया यूजर्स इसे “मीम ब्रांडिंग” और “डिजिटल कब्जे” की नई लड़ाई बता रहे हैं। अगर किसी एक पक्ष को ट्रेडमार्क मिल जाता है, तो भविष्य में इस नाम के इस्तेमाल को लेकर कानूनी अधिकार भी तय हो सकते हैं।
सीजेपी औपचारिक रूप से चुनाव आयोग में रजिस्टर्ड राजनीतिक दल नहीं है। इसकी वेबसाइट पर व्यंग्य में लिखा गया है कि ये ‘कॉकरोचिस्तान के नो इलेक्शन कमीशन पर कॉकरोच एक्ट के तहत एक नॉन-रजिस्टर्ड पार्टी है।‘ तो क्या यह मुहिम सोशल मीडिया क्रांति के साथ ही खत्म हो जाएगी?
इसके पीछे कारण यह है कि अभिजीत दिपके 2020 से 2022 तक आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया स्ट्रैटेजिस्ट रहे हैं। वो आप के लिए वायरल मीम बेस्ड ऑनलाइन प्रचार का मटेरियल बनाते थे। बाद में वो अमेरिका चले गए और वहां से भारत में राजनीतिक मुद्दों और मोदी सरकार पर निशाना साधते रहे हैं।