इन सबके बीच अहम सवाल यह है कि मौसम का यह बदलता मिजाज क्या किसी खतरे की घंटी है?
यही सवाल हमने पर्यावरणविद् डॉ. एपी सिंह से पूछा। वह कहते हैं, “यह क्लाइमेट का पीरियाडिकल टाइम चल रहा है। ऐसा अभी आगे भी चलते रहने की उम्मीद है।” वह कहते हैं कि इसे निश्चित तौर पर खतरे के तौर पर देखने की जरूरत है। मौसम का यह बदलाव अचानक किसी बड़ी घटना को जन्म तो नहीं देगा, लेकिन कालांतर में इसके नुकसान उठाने पड़ेंगे।
यह बदलाव बहुत धीमी गति से निरंतर हो रहा है। ऋतु का यह परिवर्तन इतना धीमा है कि हम इस पर गौर भी नहीं कर पाते हैं, लेकिन जब हम पिछले 30-35 साल का डेटा उठाकर देखते हैं तो समझ में आता है कि मौसम किस तरह से बदल रहा है।
जैसा की शुरू में बताया गया कि दो-तीन साल में हुआ मौसम का यह बदलाव अब स्पष्ट दिखने लगा है, लेकिन मौसम विज्ञानियों का कहना है कि यह बदलाव निरंतर हो रहा है। अब चीजें साफ दिखने लगी हैं और हमने इस पर गौर भी करना शुरू किया है। डॉ. एपी सिंह ने कहा कि 30-35 साल पीछे जाकर देखें तो पता चलता है कि उत्तर भारत में उन दिनों मई के दूसरे-तीसरे हफ्ते में वर्षा ऋतु दस्तक दे देती थी।
अब बारिश का यह मौसम आगे शिफ्ट हो गया है और अब जून में बारिश होती है। धीरे-धीरे मानसून की आमद जुलाई की तरफ बढ़ रही है। इसी तरह से सर्दियां भी पहले जल्दी आ जाती थीं। अक्टूबर के आखिर में ही रजाई-गद्दे निकल आते थे। अब नवंबर में गुलाबी सर्दी रहती है।
ऋतुओं के परिवर्तन का असर फसलों पर भी पड़ रहा है। डॉ. सिंह ने कहा कि आप किसी बूढ़े किसान से पूछें तो वो बताएगा कि 70 साल पहले गेहूं की फसल नवंबर में बोई जाती थी। किसी किसान की गेहूं की बुआई नहीं हो पाती थी तो बाकी किसान मजाक बनाते हुए कहते थे कि गंगा स्नान हो गया और अभी इनके यहां गेहूं नहीं बोया जा सका। अब गेहूं की फसल दिसंबर में बोई जाने लगी है। इसी तरह से अब गर्मी का मौसम भी देर से शुरू हो रहा है।
आने वाले दिनों में ऋतुओं का यह परिवर्तन गंभीर खतरे लेकर आ सकता है। डॉ. एपी सिंह ने बताया कि क्लाइमेट शिफ्टिंग का असर फसलों की पैदावार पर पड़ेगा। नए तरह के फ्लू और दूसरी बीमारियां आएंगी। वह सुझाव देते हुए कहते हैं कि शहरीकरण की जगह वनीकरण की स्कीम लाई जानी चाहिए।
शहरों की जगह अब गांवों को डेवलप किया जाए ताकि शहरों का विस्तार न हो। सिंगल घर की जगह फ्लैट कल्चर को बढ़ावा देने की जरूरत है, ताकि वनों और खेती की जमीन को कंक्रीट के जंगल में न बदलना पड़े। आज के मुकाबले पुराने लोग कुदरत और मौसम को लेकर ज्यादा जागरूक थे। लोगों को फिर से कुदरत के साथ जीना सीखना ही होगा।
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