ये आंदोलन दरअसल कई मायनों में ऐतिहासिक था। ये नए तरह के भारत, नए समाज, नई पीढ़ी के तेवर और सरोकारों से परिचय कराने वाली घटना थी। इस आंदोलन में एक साथ इतनी विरोधाभासी तस्वीरें थीं कि दिमाग घूम जाए। किसे सही मानें और किसे गलत? ये वर्जनाओं को तोड़ने, समाज को मोड़ने और कई बिखरे बिंदुओं को जोड़ने वाला घटनाक्रम था। कितने भ्रम टूटे और कितनी नई परिभाषाएं लिखीं गईं, ये इस बात पर तय होगा कि यह घटनाक्रम एक अपवाद बनता है या फिर नींव।
पहले बात विरोधाभास की...
जंतर-मंतर का घटनाक्रम तो एक विराम बिंदु पर आ गया पर विरोधाभास और विडंबनाओं के इतने अक्स छोड़ गया, जिन्हें आईने बदलने और चेहरे चमकाने के लिए लंबे समय तक उपयोग में लिया जाता रहेगा। इसे जेन जी आंदोलन कहें, छात्र आंदोलन कहें, युवा आक्रोश कहें, कॉकरोच जनता पार्टी कहें, अहंकार का दमन कहें, टाइमिंग कहें, राजनीति कहें, गुबार कहें या और कितने ही नाम ढूंढ लाएं, पर जो हुआ, वो सच है।
बहुत नाम इसलिए भी कि इस आंदोलन के कई चेहरे थे और कई सच। कोई एक वीडियो, कोई एक एंगल कोई एक हुजूम इस पूरे मामले को पूरी ईमानदारी से नहीं दिखा सकता। इसमें अचानक इतनी परतें, इतने मसले, इतने उद्देश्य, इतने स्वार्थ, इतने तत्व, इतने छात्र, इतने युवा, इतने राजनेता, इतने रीलबाज़, इतने मस्तीखोर इतने पीड़ित, इतने उपेक्षित, इतने हताश, इतने निराश, इतने उत्सवी, इतने तामाशबीन जुड़ गए कि दिमाग का फ्यूज उड़ जाए।
इसके एक सिरे पर पुलिस वाले को अंकल कह कर फूल थमाते युवा थे, तो दूसरी ओर भयानक भद्दी गालियां देते और नारे लगाते युवा भी थे। एक तरफ युवाओं पर लाठी, आंसू गैस और पैलेट गन चलाते पुलिस और सुरक्षाकर्मी थे, तो दूसरी ओर पुलिस, सुरक्षा बल के जवानों और पत्रकारों को पीटती उन्मादी भीड़। अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक थे, तो दूसरी ओर बर्गर, पिज्जा और बिरयानी उड़ा कर मौज मनाती टोलियां भी थीं।
इस आंदोलन ने समाज की उस सचाई को सामने लाकर खड़ा कर दिया, जिसे हम लंबे समय से चादर के नीचे छुपाना चाहते थे। इसी घटनाक्रम में बेडरूम के चुटकुले बाहर निकलकर स्टैंड अप कॉमेडी से गुजरते हुए अब राजधानी की फिज़ाओं में खुले आम गूंजने लगे। इलाहबादिया का समय करवट लेकर माता-पिता के शयन कक्षों से गुजरता हुआ सीधे जंतर-मंतर जा पहुंचा।
इसी घटनाक्रम में दूर से निहारकर हल्के में लेता सत्तापक्ष भी था, तो वहीं मायूस होकर कोने किरचता विपक्ष भी था। इसी आंदोलन में सच में दुखी छात्र और व्यवस्था से त्रस्त युवा भी थे, तो वहीं गरम तवे पर अपनी-अपनी रोटियां सेंकते विचारधारा से नत्थी, भटकाए और भड़काए युवा भी थे। किसी के लिए ये जीवन और आजीविका का प्रश्न था और किसी के लिए सिर्फ कौतूहल।
इस सबके बीच में एक सच खड़ा था- वो ये सच कि नेता, मंत्री और सरकारें बदलने के बाद भी भ्रष्ट तंत्र ना केवल वहीं था, बल्कि कई मामलों में पहले से मजबूत होता चला गया। जिससे उम्मीद ज्यादा होगी, उससे नाराज़ी भी उतनी ही ज्यादा होगी। अगर आपने अच्छे दिनों का वादा किया है, तो आपको उसे हर क्षेत्र में पूरा करना होगा। इसीलिए आक्रोश का स्वर भी उतना ही तीखा और बड़ा था।
इसी में वो स्वर भी जुड़ गए, जो बारह साल से इस तरह के बड़े विरोध के इंतज़ार में थे। इस सबके चलते
इतने सारे विरोधाभास में एक और विरोधाभास जुड़ गया - एक युवा जिसने ओडिशा में पेपर लीक का विरोध कर के लाठियां खाते हुए ही राजनीति में प्रवेश किया था, उसे इसी मुद्दे पर शिक्षा मंत्री के पद से इस्तीफा देना पड़ा।
इस पूरे घटनाक्रम ने कई चीजें बदल दीं...
1. शिक्षा मंत्री
धर्मेंद्र प्रधान की जगह प्रह्लाद जोशी।
2. आंदोलन का चेहरा
किसी बड़े नेता या समाजसेवी की जगह ढेर सारे युवा।
3. विपक्ष
तमाम कोशिशों के बाद भी बात हुई तो उस नई पार्टी के प्रवक्ताओं से, जो अभी पंजीकृत भी नहीं है।
4. आंदोलन
नई परिभाषा। साधन और साध्य, दोनों की पवित्रता आवश्यक नहीं। खादी पहने भजन गाते और तयशुदा नारे लगाते अनुशासित बुलाए या बिना बुलाए लोग नहीं। बर्गर और बिरयानी खाते, ढोल बजाते, रील बनाते युवा भी आंदोलन कर सकते हैं।
5. सरकार
इस्तीफे नहीं होते से लेकर इस्तीफा होने तक। बहुत कुछ बदल गया। बदलाव दिखना चाहिए। प्रश्नों का जवाब प्रेस वार्ता में नहीं, तो सड़क पर तो देना ही होगा।