भारतीय नागरिकता पाने के लिए भारत में रहने के 15 वर्ष की अवधि को घटाकर 6 वर्ष करने का प्रस्ताव है।
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इसमें भारतीय नागरिकता पाने के लिए भारत में रहने के 15 वर्ष की अवधि को घटाकर 6 वर्ष करने का प्रस्ताव है। इसे 15 जुलाई, 2016 को लोकसभा में पेश किया गया था, लेकिन बहुमत के अभाव की वजह से राज्यसभा में पेश नहीं किया जा सका।
अब केंद्र सरकार ने राज्यसभा में धारा-370 रद्द करके साबित कर दिया है कि इस विधेयक राज्यसभा में पारित कराने में परेशानी नहीं होगी। इस बीच कांग्रेस के सदस्य राज्यसभा से इस्तीफा दे चुके हैं और विधानसभाओं के बदले समीकरण की वजह से राज्यसभा में राजग के सांसदों की संख्या लगातार बढ़ रही है।
पूर्वोत्तर के जनजातीय समूहों को यह भी लगता है कि बांग्लादेश के साथ देश के अन्य हिस्से से भी लोगों का आना जारी रहेगा। जबकि केंद्र ने साफ कर दिया है कि बांग्लादेश से 31 दिसंबर, 2014 तक आए हिंदू शरणार्थियों को भारत की नागरिकता देने के लिए केंद्र सरकार नागरिकता संशोधन विधेयक (कैब) लाने का मन बना चुकी है। वैसे यह विधेयक भारतीय जनता पार्टी का कोई गुप्त एजेंडा नहीं है। उसने पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान इसे अपने घोषणापत्र में शामिल किया था।
इधर, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी इसके पक्ष में है, इसलिए केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में लौटने के बाद भाजपा अपने मूल वादे को लागू करने में जुट गई है। जम्मू-कश्मीर से धारा-370 हटाना के बाद रामजन्म भूमि विवाद सुलझाकर आयोध्या में राम मंदिर का निर्माण और हिंदू शरणार्थियों को भारतीय नागगिक का दर्जा देना भाजपा का मुख्य मुद्दा है।
राष्ट्रीय नागरिक पंजी में लाखों हिंदुओं के नाम शामिल न करने से उत्पन्न स्थिति से निपटने के लिए भाजपा कैब के माध्यम से उन्हें भारतीय नागरिकता देने का मन बना चुकी है। लेकिन उसकी चिंता पूर्वोत्तर राज्यों में कैब के विरोध को लेकर है।
असम सरकार भले ही इस मुद्दे पर चुप है, लेकिन क्षेत्रीय संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। सबसे अधिक विरोध अरुणाचल प्रदेश, नगालैंड, मेघालय और मिजोरम में हो रहा है। पूर्वोत्तर राज्यों के जनजातीय समूहों ने इसका प्रतिवाद करने के लिए साझा मंच का गठन किया है। ऐसा पहली बार हुआ है।
इसके पहले विभिन्न छात्र संगठनों ने नार्थ ईस्ट स्टूडेंट्स आर्गेनाइजेशन (नेसो) की अगुवाई में किया था, लेकिन इस बार प्रतिवाद का नेतृत्व विभिन्न जनजातीय समूहों के साझा मंच - नार्थ ईस्ट फो्रम ऑफ इन्डीजेनियस पीपुल (एनईएफआईपी) कर रहा है।
असम में आसू समेत कुछ क्षेत्रीय संगठनों ने भी विरोध करना आरंभ कर दिया है। विभिन्न जनजातीय समूहों के तेवर की वजह से पिछले माह गुवाहाटी में आयोजित नार्थ ईस्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (नेडा) नेडा की बैठक में मेघालय, नगालैंड और मिजोरम के मुख्यमंत्रियों ने केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के समक्ष अपनी आशंकाओं के बारे में बताया। विरोध अरुणाचल प्रदेश में भी हो रहा है, लेकिन वहां पर भाजपा की सरकार होने की वजह मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने इस बार कुछ बोलने से परहेज किया।
गृह मंत्री ने सभी को आश्वस्त किया कि विधेयक पास होने से पूर्वोत्तर राज्यों को मिले विशेष अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।
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कांग्रेस और आसू इसका विरोध कर रहे हैं। असम गण परिषद अब तक चुप है, लेकिन पूर्व मुख्यमंत्री प्रफुल्ल कुमार महंत कैब के खिलाफ मुखर हैं। नेडा की बैठक में कैब पर सहयोगी दलों की चिंता को देखते हुए भाजपा अध्यक्ष और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने स्पष्ट किया कि इससे पूर्वोत्तर राज्यों को चिंता करने की जरूरत नहीं है।
नागरिकता विधेयक को लेकर शंकाओं को दूर करते हुए कहा कि विधेयक से यहां के राज्यों को अनुच्छेद 371 से विशेष प्रावधानों के तहत मिले अधिकारों का हनन नहीं होगा।
जनजातियों और मूल निवासियों के अधिकारों के साथ इनर लाइन परमिट पर भी कोई असर नहीं पड़ेगा। 31 दिसंबर 2014 अंतिम तिथि होगी। गृह मंत्री ने सभी को आश्वस्त किया कि विधेयक पास होने से पूर्वोत्तर राज्यों को मिले विशेष अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। राज्यों में इनर लाइन परमिट की व्यवस्था है वहां बिना परमिट के कोई भी नहीं जा सकता तो नागरिकता पाने वाले लोगों को भी परमिट लेना पड़ेगा और यह राज्य सरकार पर निर्भर करता है कि किसे परमिट दिया जाए या नहीं।
केंद्र सरकार सभी राज्यों को आश्वस्त करने का प्रयास कर रही है। यह अच्छी बात है कि केंद्र सरकार ने सभी राज्यों की आशंकाओं को सुना और मिलकर आगे बढ़ने की इच्छा जताई। बेहतर होगा कि कैब लाने के पहले केंद्र सरकार इसका विरोध करने रहे संगठनों और दलों का विश्वास प्राप्त कर लें, वर्ना इसके दूरगामी परिणाम हो सकते हैं और पूर्वोत्तर राज्यों में नए सिरे से आंदोनल भड़क सकता है। यदि सहमति और संवाद से कैब को लागू किया जाता है तो लोकतंत्र के लिए बेहतर होगा।
(लेखक दैनिक पूर्वोदय के संपादक और पूर्वोत्तर मामले के जानकार हैं।)