असम सोमवार से ही बंद का दौर जारी हो गया था। ऊपरी असम में इसका व्यापक प्रभाव देखा गया।
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असम सोमवार से ही बंद का दौर जारी हो गया था। ऊपरी असम में इसका व्यापक प्रभाव देखा गया। यह सिलसिला लंबा चलेगा। बंद के अलावा भी विभिन्न संगठन अपने तरीके से इसका विरोध कर रहे हैं। जो हित में न हो, उसका विरोध होना चाहिए।
हर नागरिक को लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करने का अधिकार है। लेकिन आंदोलन कर रहे समूहों को इस बात के लिए चौकस रहना होगा कि आंदोलन हिंसक रूप न ले। जिस तरह से डिब्रूगढ़ और सदिया में असम गण परिषद के कार्यालय में तोड़फोड़ की गई, उसकी जरूरत नहीं थी। यदि अगप से नाराजगी है तो अगप कार्यालय के समक्ष धरना-प्रदर्शन किया जा सकता है, लेकिन कानून हाथ में लेने से परहेज करना चाहिए। आंदोलन में कई बार उत्तेजना या भावुकता में हिंसक घटनाएं घट जाती हैं।
कई बार कुछ स्वार्थी तत्व आंदोलन को बदनाम करने के लिए हिंसक घटनाओं का अंजाम दे देते हैं। जब कोई आंदोलन लोकतांत्रिक तरीके से हटकर हिंसक हो जाता है तो प्रशासन को हस्तक्षेप का मौका मिल जाता है।
हिंसा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का बहाना मिल जाता है। उसके बाद आंदोलन को दबाने के लिए दमन का चक्र आरंभ हो जाता है। वैसे भी हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है। लोकतांत्रिक आंदोलन से भी सत्ता को झुकाया जा सकता है।
मंगलवार और बुधवार के माहौल को देखते हुए लगता है कि हालात और खराब होंगे। इसका असर गुवाहाटी में होने वाले भारत और जापान के प्रधामंत्री की शिखर पर पड़ सकता है। पूरे गुवाहाटी को शिखर वार्ता के सजाया गया है। दीवालों पर रंग-रोगन किया है। उन दिवालों पर अब कैब विरोध लिखे गए हैं।
इस आंदोलन का शुरुआत अखिल असम छात्र संघ ने और पूर्वोत्तर के छात्र संगठनों के साझा मंच नेसो ने किया है, लेकिन आंदोलन पर उनका नियंत्रण जूकता नजर आ रहा है। इसी वजह से आसू के सलाहकार डॉ समुज्ज्वल भट्टाचार्य ने छात्रों से अनुशासन में आंदोलन करने का आह्वान किया है।
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