नागरिकता कानून के विरोध में सपाइयों का प्रदर्शन
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आखिर क्या वजह है कि आज रामचंद्र गुहा जैसे लोगों को सड़कों पर उतरना पड़ता है, क्या वजह है कि चुनाव से पहले तमाम साहित्यकार, संस्कृतिकर्मी और बुद्धिजीवी एक होकर इस सरकार को दोबारा न चुनने की अपील करता है, लेकिन विकल्प के अभाव का फायदा उठाते हुए एक बार फिर पहले से भी मज़बूती के साथ मोदी सरकार दोबारा सत्ता में आ जाती है।
क्या वजह है कि राहुल गांधी अपने बचकाने बयानों और हरकतों की वजह से जनता का भरोसा नहीं जीत पाते और दोबारा मोदी सरकार बनने के बाद कांग्रेस पूरी तरह हथियार डाल देती है.. क्या वजह है कि अपने देश में अब विपक्ष के नाम पर कोई ऐसी पार्टी नज़र आती है जिसपर जनता भरोसा कर सके और जो संसद में तमाम बिलों को कानून बनने से रोक सके या फिर सरकार को मनमानी करने की ऐसी छूट न मिल सके?
दरअसल, ये सवाल जनता को भीतर ही भीतर इस कदर परेशान करते रहे हैं कि अब उसके पास खुद एक मज़बूत विपक्ष बनने के अलावा और कोई रास्ता दिख नहीं रहा है। ये स्थिति कहीं न कहीं एक बार फिर से 1974 की याद दिला रही है। उस दौरान गुजरात की तत्कालीन चिमनभाई पटेल सरकार के खिलाफ और गुजरात विश्वविद्यालय में मेस की बढ़ी हुई राशि के खिलाफ छात्रों का जो आंदोलन शुरु हुआ, वह कैसे पूरे देश और खासकर बिहार पहुंचकर व्यवस्था परिवर्तन का क्रांतिकारी आंदोलन बन गया। तब जयप्रकाश नारायण जैसे नेता मौजूद थे जिन्होंने इसका नेतृत्व संभाला।
जेपी ने ही 1973 के दिसंबर में ‘यूथ फॉर डेमोक्रेसी’ बनाकर छात्रों और युवाओं को मिलकर लोकतंत्र की रक्षा के लिए आगे आने की अपील की थी। 1974 में गुजरात से उठे छात्र आंदोलन की चिंगारी महंगाई, भ्रष्टाचार, बेरोज़गारी और इंदिरा सरकार की निरंकुशता के खिलाफ कुछ इस तरह फैली कि बिहार में 18 मार्च 1974 को संपूर्ण क्रांति के आह्वान के साथ जेपी के ऐतिहासिक आंदोलन ने सत्ता में बदलाव के संकेत दे दिए।
कहते हैं कि सत्ता अपनी ताकत के गुरूर में अपना विवेक खो देती है। इंदिरा गांधी ने भी 1975 में इमरजेंसी लगाकर, तमाम नेताओं और आंदोलनकारी छात्रों को जेलों में डालकर और पुलिस की बर्बरता की बदौलत खुद पूरे देश की जनता को अपने खिलाफ खड़ा कर लिया था। और आखिरकार 1977 के चुनाव में इसका खामियाजा उन्हें भुगतना पड़ा। गौरतलब है कि उस आंदोलन के छात्र नेताओं में आज के तमाम सत्ताधारियों के साथ साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी शामिल थे।
दरअसल, कुर्सी पर कोई भी हो, सत्ता का चरित्र कभी नहीं बदलता। मजबूरियां चाहे जो हों, ज़िद की वजहें चाहे जो हों या ‘देश बदलने’ के लिए किसी भी हद तक चले जाने का जुनून चाहे जैसा हो, पर जनता तो जनता है। नागरिकता संशोधन कानून के बाद जो आग हर तरफ भड़की है और जिस तरह पूरे देश में हालात बिगड़े हैं, उससे आने वाला वक्त संदेहों और अंदेशों से भरा लग रहा है।
जाहिर है जब आप कोई फरमान जारी करते हैं तो उसे लागू करवाने के लिए साम-दाम-दंड-भेद के साथ हर ताकत का इस्तेमाल भी करते हैं। नागरिकता कानून को लेकर अब आप भले ही शोर मचाते रहिए, लेकिन सरकार को लगता है कि नोटबंदी, जीएसटी, राम मंदिर, कश्मीर को लेकर लिए गए फैसलों के बाद नागरिकता कानून का शोर शराबा भी चंद दिनों में खत्म हो जाएगा, लोग इसे नियति मानकर घरों में दुबक जाएंगे और अगर देश में रहना है तो हर फैसले को सर झुकाकर कबूल करते रहेंगे।
जाहिर है सत्ता के इस आत्मविश्वास के पीछे नेतृत्वविहीन विपक्ष का ढुलमुल रवैया और बिखराव का एक मज़बूत हथियार है। आज न तो कोई जयप्रकाश नारायण हैं और न ही उस दौर के नेताओं सरीखा कोई जुझारु व्यक्तित्व। दूसरी बार जोरदार बहुमत से सत्ता मिल जाने का आत्मविश्वास जो है वो अलग। देशभर में ट्रेड यूनियनों और मज़दूर-किसानों के आंदोलनों की रीढ़ पहले ही तोड़ दी गई है। सोशल मीडिया का चमत्कारिक खेल का असर भी आजमाया ही जा चुका है। जाहिर है सरकार के लिए अब इन शोर शराबों का कोई मतलब नहीं रह जाता।
लेकिन महाराष्ट्र की सत्ता हाथ में आकर खिसक जाने के बाद और दिल्ली में एक बार फिर आम आदमी पार्टी के लौटने के संकेत ने कहीं न कहीं भाजपा में बौखलाहट तो भर ही दी है। फिलहाल झारखंड के चुनाव के नतीजे पर नज़रें टिकी हैं और फिर आने वाले विधानसभा चुनावों में सत्ता में आने के जोड़तोड़ शुरु हो चुके हैं। पुलिस हमेशा से सरकार के लिए एक हथियार का काम करती रही है। जब भी कोई आंदोलन उठता है तो पुलिस के ही ऐसे तमाम ‘अमानवीय’ तत्वों को सामने करके बर्बरता का खेल खेला जाता है और आंदोलन की दिशा मोड़ दी जाती है।
नागरिकता कानून का विरोधः आखिर कौन देगा सही दिशा?
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नागरिकता कानून के सवाल पर होने वाले आंदोलनों को कुचलने के लिए भी यही रास्ते अपनाए जा रहे हैं। लेकिन अब ये मामला महज छात्रों का नहीं, सीएए और एनआरसी को लेकर देश भर में फैले उस असंतोष का है जिसके लिए सरकार को बार-बार गला फाड़ फाड़ कर कहना पड़ रहा है कि इससे देश की जनता को या मुसलमानों को कोई नुकसान नहीं होगा, पहले इसे ठीक से पढ़ा और समझा जाना चाहिए या अखबारों में इश्तेहार देकर ये बताने कि कोशिश कि भला ये कानून है क्या। लेकिन देखते ही देखते हालात बेकाबू होते जा रहे हैं।
सरकार को बेशक लगे कि ये गुस्सा भी नोटबंदी या जीएसटी के विरोध प्रदर्शनों की तरह कुछ दिनों में शांत हो जाएगा, लेकिन इस बार ऐसा होता नहीं दिख रहा। क्योंकि सवाल अपने ही देश में अपनी नागरिकता की जंग लड़ने का है और उस आत्मसम्मान का है जो हर नागरिक को अपने देश का नागरिक होने वाले गर्व से जुड़ा है।
यह आग अभी बुझती नज़र नहीं आ रही है और बहुत संभव है कि अगर नागरिकता कानून को लेकर भड़का असंतोष और व्यापक रूप ले तो ये 1974 आंदोलन की तर्ज पर आगे भी बढ़ सकता है। लेकिन मुश्किल वही है कि आखिर आज न तो जेपी हैं और न कोई ऐसा कद्दावर नेता नजर आ रहा है जो नेतृत्व संभाल सके। तो क्या इस स्वत:स्फूर्त आंदोलन के भीतर से कोई नया नेतृत्व उभरेगा?
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