फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

आखिरकार बंद हो जाएगा मुंबई के दादर का चित्रा सिनेमाघर 

विज्ञापन
पद्मावत फिल्म के वक्त चित्रा को पुलिस ने इस तरह संरक्षण दिया था। - फोटो : Social Media
विज्ञापन

मायानगरी मुंबई में यूं तो साल में सैंकड़ो फिल्में बनती हैं और महानगर के हजारों सिनेमाघरों में रिलीज होती हैं। लेकिन शहर में कुछ सिनेमाघर केवल फिल्म देखने की जगह भर नहीं हैं बल्कि परिवारों और पीढ़ियों की यादें संजोए बैठे हैं। मराठा मंदिर हो या फिर नवरंग या फिर प्लाजा सिनेमाघर। इन सारे ही सिंगल स्क्रीन थियेटर की अपनी कहानियां हैं और अपनी यादें हैं। खास बात यह है मल्टीस्क्रीन के बढ़ते चलन से अब सिंगलस्क्रीन थियेटर ना केवल अपनी पहचान खो रहे हैं बल्कि धीरे-धीरे बंद भी हो रहे हैं।ऐसी ही कहानी है मुंबई के प्रमुख उपनगर दादर पूर्व के एक सिनेमाघर चित्रा सिनेमाघर की।

विज्ञापन


दरअसल, दादर पूर्व का चित्रा सिनेमाघर आज आखरी बार प्रोजेक्टर चलाएगा। कल यानी की शुक्रवार से यहां की लाइटें फिर कब जलेंगी और कब प्रोजेक्टर बॉलीवुड की मायावी दुनिया परदे पर दिखाएगा पता नहीं।

यकीनन, आज हर एक हाथ में मोबाइल हैं और कई सारे ओटीपी प्लेटफॉर्म हैं जहां पर दिन रात कभी भी किसी भी समय फिल्में देखने का मौका मिल रहा है, लेकिन एक जमाना था जब सिनेमाघर के अलावा मनोरंजन का दूसरा कोई साधन नहीं था। ऐसे समय में चित्रा सिनेमा ने कई पीढ़ियों का मनोरंजन किया, लेकिन आज के जमाने ने हाल ही में फिर से शुरू हुए चित्रा का गला घोंट दिया है। कुछ समय पहले ही शारदा सिनेमाघर भी हमेशा के लिए बंद हो गया है।
विज्ञापन


एक सिनेमाघर की याद और पीढ़ियां 
मैं दादर में ही रहता था इसलिए चित्रा सिनेमा से कई यादें जुड़ी हुई हैं। दादर में उस समय शारदा, चित्रा, कोहिनूर, प्लाजा, बादल, बिजली, बरखा, धरती (जो आज प्रीमियम सिनेमाघर बना है), हिंदमाता थोड़ी दूरी पर एलफिन्स्टन में दीपक, वरली में सत्यम, शिवम, सचिनम, गीता, जयहिंद आदि कई सिनेमाघर थे।

हमारे लिए यह सिनेमाघर किसी मंदिर से कम नहीं थे। हर सिनेमाघर का अपना एक अलग वैशिष्ट्य था। धरती (अब का प्रीमियर) में लकड़ी के बेंच थे जिन पर सीट नंबर नहीं होते थे, भाग कर जगह पकड़नी पड़ती थी। उस समय टिकट के दाम भी सवा रुपये, डेढ़ रुपये, दो रुपये रहता था। बाद में यह बढ़कर तीन और पांच रुपये तक पहुंचा था।

चित्रा सिनमा से कई यादें जुड़ी हुई हैं। जीवन में सबसे पहली अंग्रेजी फिल्म राजर मूर द्वारा अभिनीत जेम्स बांड की लिव एंड लेट डाय यहीं पर देखी थी। जयाप्रदा की बॉलीवुड प्रवेश की पहली फिल्म सरगम भी यहीं देखी थी। इसके अलावा कई और फिल्में भी यहीं पर देखी थी। इंटरवल में बाहर आकर वडा पाव खाना एक अलग आनंद देता था। खैर, अब तो सिर्फ यादें बची हैं।

पुनः मिलने की इच्छा रखते हुए फिलहाल अलविदा चित्रा

लेखक वरिष्ठ फिल्म समीक्षक और मराठी भाषा के पत्रकार हैं। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें