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नेपाल के जरिए भारत-पाकिस्तान के बीच क्यों सरपंच बनना चाहता है चीन?

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पश्चिम में भारत का शत्रु देश पाकिस्तान उसके पाले में बैठा है तो उत्तर में अब तक सबसे घना मित्र देश नेपाल अब भारत से छिटका नज़र आता है। - फोटो : पीटीआई
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नेपाल का बयान है। वह पाकिस्तान से विवाद में मध्यस्थ बनना चाहता है।अभी उसका भारत से कालापानी पर विवाद सुलझा नहीं है। चंद रोज़ पहले ही उनके प्रधानमंत्री ने भारत को एक इंच ज़मीन नहीं देने का बड़ा बेहूदा बयान दिया था। अपना विवाद छोड़ अब वह भारत और पाकिस्तान के बीच सरपंच बनना चाहता है। अचानक उसके रवैए में यह बदलाव क्यों और कैसे आया? क्या अपने नए अभिभावक के कहने पर उसने यह पांसा फेंका है। परदे के पीछे की इसकी कहानी क्या हो सकती है। महत्वाकांक्षी चीन अब भारत के इर्द गिर्द कूटनीतिक और सामरिक घेरे बंदी की प्रक्रिया क़रीब- क़रीब पूरी कर चुका है। पश्चिम में भारत का शत्रु देश पाकिस्तान उसके पाले में बैठा है तो उत्तर में अब तक सबसे घना मित्र देश नेपाल अब भारत से छिटका नज़र आता है।

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पूरब में म्यांमार ने बीते सप्ताह ही ऐलान किया था कि वह हरदम अपने नए दोस्त चीन के साथ खड़ा रहेगा। दक्षिण में श्रीलंका सरकार चीन की गिरफ़्त में है। वह हंबनटोटा बंदरगाह पहले ही लीज़ पर ले चुका है और वहां की सरकार पूरी तरह चीन के आर्थिक जाल में उलझ चुकी है। बीते दिनों पाकिस्तान को साथ लेकर चीन ने अफ़ग़ानिस्तान में भारतीय प्रभाव कम करने के लिए तालिबान और अमेरिका के बीच कई दौर की वार्ताएं कराईं।

डोनाल्ड ट्रंप ने इस चीनी चाल को भांप लिया और बातचीत फ़ुस्स हो गई। इसके बाद उसने म्यांमार और बांग्लादेश के बीच रोहिंग्या मसले पर समझौता कराया। अब नेपाल के ज़रिए वह भारत और पाकिस्तान के बीच बातचीत कराना चाहता है। सूत्रों की मानें तो इसकी पटकथा पिछले दिनों चीन के राष्ट्रपति की तीन माह पहले नेपाल यात्रा के दौरान लिखी गई थी।भारत - चीन के 1962 में हुए युद्ध के बाद चीन ने भारत के मित्र पड़ोसियों के साथ एक शिष्ट दूरी बना ली थी। 

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अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मद्देनज़र यह भारत के लिए एक झटके से कम नहीं है। इसके पीछे चीन की एक और सामरिक मंशा दिखाई देती है।
मगर डोकलाम घटनाक्रम के बाद उसने जिस तरह भारतीय पड़ोसियों से खुलकर दोस्ती और मदद देने का रवैया अपनाया है, उससे भारत उलझन में है। अभी तक कूटनीतिक और बैक डोर सियासत के ज़रिए संभवतः हिन्दुस्तान कोई संदेश या संवाद चीन को नहीं दे सका है। चीन को इसके दो लाभ हुए हैं। एक तो भारत मनोवैज्ञानिक दबाव में आ गया है और दूसरा पड़ोसियों की निग़ाह में भारत का क़द बौना हुआ है।

अंतर्राष्ट्रीय संबंधों के मद्देनज़र यह भारत के लिए एक झटके से कम नहीं है। इसके पीछे चीन की एक और सामरिक मंशा दिखाई देती है। एशिया में भारत, अमेरिका का भरोसेमंद साथी माना जा रहा है। ऐसे में वह चाहेगा कि अमेरिका के साथ तीख़े तनाव की स्थिति में भारत उसे कोई नुक़सान और अमेरिका को कोई लाभ न पहुंचा सके। इसलिए उसने हिंदुस्तान के इर्द गिर्द बसे मुल्क़ों के माध्यम से भारत का सिरदर्द बढ़ाने का पूरा प्रबंध कर लिया है। भारत खुलकर अमेरिका की मदद नहीं कर पाएगा तो दोनों देशों के मधुर रिश्तों पर भी असर पड़ेगा। इससे चीन का मक़सद पूरा होता है। इसे देखते हुए भारत के लिए यह अत्यंत संवेदनशील समय है।      
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 
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