ऐसे सपनों के दिनों में मोबाइल कहां थे। वीडियो गेम कहां थे?
- फोटो : Social Media
फुरसती चिड़िया के रंग हजार
जानें कितने किस्से कितनी पीढ़ियों के पास किस रूप में दर्ज हैं। हर जेहन में यादों की ट्रेन लकदक गुजरती। नाना-मामा के घर यादें। हर एक के किस्से अलग, हर किस्सों में ख्वाबगाह अलग और ख्वाबगाह की दुनिया के जुगुनू अलग।
जो सड़क शहर की ओर गई वह लौटती बस के साथ गांव के बस स्टॉप पर आती और रिश्तों की खनकती आवाज, द्वार चौखट और दरवाजों की डेल पर बजती।
दिन हवा हुए की बच्चे घर लौट आए हों। इधर गर्मी की छुट्टियां लगी नहीं की उधर जमघट जमा। कहीं पेड़ों के नीचे तो कहीं नदी किनारे। कहीं मंदिर के पीछे से उठता शोर, तो कहीं किसी पगडंडी से दूर झांकते टीले तक पहुंचने की होड़। हर नदी पर डेरा और हर पहाड़ पर सवेरा। अनगिनत बातें और फुरसत का ऊंचा पहाड़।
बादलों ने लगाई भीगने की मनुहार
आंगन से बादल मुंह चिढ़ाते गुजरे और कारी बदरी ठुमकती हुई धूप पर मुंह फुलाते बरसने लगी। मुनिया, चीनू, मीनू का झूला हवा के साथ तैरा। बादलों के गुच्छों से अटे आसमान को पीपल की डारी ने देखा और आंख मिचकाती, मुंह बनाकर हिली।
लगा की ताना दे रही है तो देर से क्यों आए हो।
मुनिया का फ्रॉक उड़ता है और मीनू के बाल कहां ठहरते हैं। चीनू ने झूले को रोककर आवाज लगाई। घर चलो की बारिश होने वाली है। जंगल से गायें लौटती हैं बरगद मामा के नीचे। बादल उतरते हैं पहाड़ों के ऊपर।
बारिश की बूंदें मुनिया के चेहरे पर हैं और नन्ही सी जीभ ने धीरे-धीरे बूंदों का स्वाद चखा और फूल मुस्कुराते नाच रहे..!
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।