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सकारात्मकता की ओर: टूट रही बाल विवाह पर चुप्पी की संस्कृति

सार

बाल विवाह के खात्मे के लिए गांवों में जागरूकता अभियान निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, बशर्ते वे एक ढर्रे पर चलने वाले लकीर के फकीर न हों।  बहुत से ग्रामीण परिवारों को यह नहीं पता होता कि बाल विवाह प्रतिषेध कानून क्या है या इसके उल्लंघन के क्या परिणाम हो सकते हैं।
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बाल विवाह पर प्रशासन की पैनी नजर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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गांवों में बाल विवाह की अधिकता यह साबित करने के लिए काफी है कि समस्या की जड़ें वहीं सबसे गहरी हैं। लिहाजा समाधान की शुरुआत भी वहीं से होनी चाहिए। इसीलिए बाल विवाह के खात्मे के लिए गांवों में जागरूकता अभियान निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं, बशर्ते वे एक ढर्रे पर चलने वाले लकीर के फकीर न हों। जरूरत है कि इन्हें ग्रामीण परिवेश और ग्रामीण समाज के सामाजिक मनोविज्ञान को समझते हुए उसके अनुरूप ढाला जाए।

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ग्रामीण समाज में बाल विवाह जैसी कुप्रथा के पीछे रीति रिवाजों, बच्चियों की सुरक्षा को लेकर भय, गरीबी, लैंगिक असमानता और सामाजिक दबाव जैसे कारक अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में जागरूकता ही वह माध्यम है जो इन अदृश्य कारकों को चुनौती दे सकता है। ग्रामीण समाज में इसे कई बार “जरूरी” या “सम्मान से जुड़ा” निर्णय माना जाता है। जागरूकता अभियान सीधे इसी सोच को चुनौती देते हैं और इसमें आया बदलाव ही उनका हासिल है।

जागरूकता अभियानों की जरूरत ही तभी पड़ती है जब रूढ़ियों में जकड़े समाज की मानसिकता में बदलाव की जरूरत स्पष्ट रूप से महसूस की जाने लगती है। ऐसे में बाल विवाह के खिलाफ जब स्थानीय बोलियों, लोक परंपराओं और समाज में विश्वसनीयता रखने वाले तबकों जैसे शिक्षक, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और विशेष रूप से धर्मगुरु आगे आकर लोगों को समझाते हैं कि बाल विवाह बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और भविष्य के लिए विनाशकारी है, तो समाज की स्वीकृति धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगती है।
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धर्मगुरुओं की भूमिका यहां अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि ग्रामीण समाजों में उनकी विशेष रूप से एक नैतिक सत्ता होती है। जब वे स्पष्ट रूप से कहते हैं कि बाल विवाह न तो धार्मिक रूप से उचित है और न ही नैतिक रूप से स्वीकार्य तो रिवाजों के नाम पर दी जाने वाली दलीलें स्वतः कमजोर पड़ने लगती हैं।

जागरूकता अभियानों का दिख रहा है असर

दूसरे, जागरूकता अभियान जरूरी जानकारियां देते हैं और लोगों को उनके अधिकारों के बारे में भी बताते हैं। बहुत से ग्रामीण परिवारों को यह नहीं पता होता कि बाल विवाह प्रतिषेध कानून क्या है या इसके उल्लंघन के क्या परिणाम हो सकते हैं। यहां जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन जैसे संगठनों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम कर रहे 250 से भी नागरिक समाज संगठनों के देश के इस सबसे नेटवर्क ने बाल विवाह के खिलाफ जागरूकता अभियान को गांव-गांव तक पहुंचाया है। पोस्टरों, बैनरों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और रैलियों के जरिए न केवल लोगों को समझाया कि बाल विवाह कानूनन अपराध है, बल्कि लोगों को यह भी सिखाया है कि बाल विवाह को कैसे रोका जाए, शिकायत कहां की जाए और पीड़ित बच्चों को कैसे सुरक्षित किया जाए।

समुदाय आधारित निगरानी जरूरी

तीसरी महत्वपूर्ण भूमिका है समुदाय आधारित निगरानी और भागीदारी का निर्माण। पहले जहां बाल विवाह को “निजी मामला” समझकर नजरअंदाज किया जाता था, वहीं अब कई गांवों में किशोरी मंडल, महिला मंडल और पंचायतें मिलकर ऐसे विवाहों को रोकने में सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के प्रयासों से एक ऐसा ईकोसिस्टम विकसित हो रहा है जो समय रहते हस्तक्षेप कर बाल विवाहों को रोकने में सफल साबित हो रहा है। यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जब समाज स्वयं खड़ा होता है, तो परिवर्तन अधिक स्थायी होता है।

चौथा पहलू है लड़कियों और परिवारों का सशक्तिकरण। ये अभियान केवल “रोकथाम” तक सीमित नहीं हैं, बल्कि शिक्षा, कौशल विकास और परिवारों को सरकारी योजनाओं से जोड़कर उन्हें विकल्प भी प्रदान कर रहे हैं। जब परिवारों को यह भरोसा होता है कि बेटी का भविष्य सुरक्षित और सम्मानजनक हो सकता है, तो वे शीघ्र विवाह के दबाव से बाहर आने लगते हैं।

जहां तक इन अभियानों के असर का प्रश्न है तो पिछले कुछ वर्षों में इसके सकारात्मक परिणाम स्पष्ट रूप से दिखाई देने लगे हैं। अब पहले की तुलना में अधिक बाल विवाह रोके जा रहे हैं और इसकी सूचना देने वाले भी स्वयं समुदाय के लोग ही होते हैं। पड़ोसी, रिश्तेदार, शिक्षक तो सूचना दे ही रहे हैं, लड़कियां खुद अपना बाल विवाह रुकवाने के लिए प्रशासन व नागरिक समाज संगठनों से संपर्क कर रही हैं।

यह संकेत है कि “चुप्पी की संस्कृति” टूट रही है। जिन क्षेत्रों में जागरूकता अभियान मजबूत हैं, वहां लड़कियों के स्कूल छोड़ने की दर में कमी आई है और विवाह को टालने की प्रवृत्ति बढ़ी है।

बाल विवाह के खिलाफ आवाज

एक और अहम बदलाव यह है कि जमीनी स्तर के प्रयासों के नतीजे में गांवों में अब एक स्थानीय नेतृत्व उभर कर सामने आ रहा है। किशोरी समूह, महिला मंडल, पंचायतें और धर्मगुरु, ये सभी मिलकर बाल विवाह के खिलाफ आवाज बुलंद कर रहे हैं। जब धार्मिक और सामाजिक नेतृत्व एक साथ इस कुप्रथा के विरुद्ध खड़ा होता है तो संदेश केवल कानूनी नहीं ही रह जाता बल्कि नैतिक और सामाजिक स्तर पर भी गहराई से असर छोड़ जाता है।

हालांकि, यह भी स्वीकार करना होगा कि यह बदलाव का यह चक्र अभी पूरा नहीं हुआ है। अब भी चोरी-छिपे या दस्तावेजों में हेरफेर करके बाल विवाह जारी हैं। लेकिन इसका एक मतलब यह भी है कि अब कानून के डर से बाल विवाह खुलेआम नहीं हो रहे। जागरूकता बढ़ी है, नतीजे में शिकायतें बढ़ी हैं, कानून का डर भी पैदा हुआ है। लेकिन पितृसत्तात्मक मानसिकता अभी पूरी तरह नहीं बदली है।

पूरा समाज और पूरी सरकार एक साथ के स्पष्ट नजरिए से चलाए जा रहे इन जागरूकता अभियानों का असर स्पष्ट है। आज रोकथाम, रिपोर्टिंग और सामुदायिक भागीदारी बढ़ी है। लेकिन बाल विवाह के पूरी तरह खात्मे के लिए इन अभियानों को निरंतर जारी रखना होगा ताकि बाल विवाह जैसे कानून की नजर में अपराध है, वह पूरे समाज की नजर में भी अपराध बन जाए।



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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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