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फिल्म छपाकः सामाजिक मुद्दे पर सशक्त सिनेमा जिससे झांकती है समाज की सच्चाई

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'छपाक' के एक दृश्य में दीपिका पादुकोण - फोटो : अमर उजाला
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एसिड अटैक महिलाओं के प्रति हिंसा का क्रूरतम रूप है। एसिड हमला एक ऐसा सस्ता और सुलभ हथियार है जिसका उपयोग बदला लेने के लिए किया जाता है। महिलाओं से उनके इनकार  का बदला उनके चेहरे को बिगाड़ कर उन्हें अपाहिज बनाकर लिया जाता है।

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पीड़िताओं पर  इसका असर ताउम्र बना रहता है। हमले के बाद उन्हें समाज से भी जूझना पड़ता है जो उन्हें सामान्य तरीके से स्वीकार नहीं करता है। साथ ही इलाज के दौरान आने वाला भारी खर्च भी पूरे परिवार का कमर तोड़ देता है।

कंबोडिया और दक्षिण एशिया के बंधु राष्ट्र भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश इस मामले में खासे बदनाम हैं। पिछले डेढ़ दशकों के दौरान भारत में एसिड अटैक एक स्थापित अपराध बन चुका है।
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एसिड हमलों की वजह 
एसिड हमलों के पीछे के कारण पूरी तरह से पुरुषवादी और कबीलाई हैं जैसे विवाह प्रस्ताव या शारीरिक संबंध ठुकरा दिया जाना, पर्याप्त दहेज न मिलना, लड़की को जन्म देना, मनपसंद खाना ना बनाना या फिर कोई और “हुक्म ना मानना, जिसके प्रतिशोध में सजा के तौर पर इस हथियार का उपयोग किया जाता है जो जिंदगी भर की सजा होती है। 

बीते एक दशक के दौरान भारत में एसिड हमलों के मामले बहुत तेजी से बढ़े हैं। - फोटो : twitter
बीते एक दशक के दौरान भारत में एसिड हमलों के मामले बहुत तेजी से बढ़े हैं। अभिनेता  शाहरुख खान की एनजीओ मीर फाउंडेशन जो कि एसिड हमला पीड़ितों के लिए काम करती है की वेबसाइट पर दर्ज आंकड़ों के अनुसार साल 2010 में भारत में 80 एसिड़ अटैक के मामले दर्ज किए किए थे, 2014 में 225 मामले दर्ज हुए जबकि 2016 में एसिड हमलों के 307 मामले दर्ज किए गए। यह तो सिर्फ दर्ज आंकडे हैं असल में इनकी संख्या और अधिक हो सकती है। 

हालांकि भारत में एसिड हमले की घटनाएं पहले से होती रही हैं परंतु एसिड अटैक सर्वाइवर लक्ष्मी अग्रवाल के हौसले और संघर्ष के बाद इसकी गंभीरता को स्वीकार किया जाने लगा है। सुप्रीम कोर्ट ने एसिड अटैक की घटनाओं को गंभीर अपराध माना और इसमें सजा के लिए भारतीय दंड संहिता में 326 ए और 326 बी धाराएं जोड़ी गई थीं, जिसके बाद अब एसिड हमले गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आ गए हैं और इसके लिए न्यूनतम दस साल की सजा का प्रावधान किया गया है। उनकी जनहित याचिका के बाद ही शीर्ष अदालत द्वारा एसिड को सिर्फ पंजीकृत दुकानों पर ही बेचने का निर्देश दिया था।

फिल्म ‘छपाक’की कहानी लक्ष्मी अग्रवाल के जीवन से प्रभावित है, जिन्होंने एसिड हमला झेला था। ‘छपाक’ बहुत जिम्मेदारी के साथ उनके साथ हुए हादसे, संघर्ष और जीवटता को दिखाती है। यह मालती (दीपिका पादुकोण) की कहानी है जो किसी भी आम लड़की की तरह है, लेकिन उसकी जिंदगी तब बदल जाती है जब बशीर खान नाम का एक युवा दर्जी उसमें रुचि लेने लगता है।

बशीर का उसके घर आना-जाना है और मालती उसे भैया कहकर बुलाती है। लेकिन बशीर को उससे एकतरफा प्यार हो जाता है और वह फोन पर उसे सन्देश भेजने लगता है। अचानक यह सब होने से मालती को कुछ समझ नहीं आता है और वो बशीर को चुपचाप नजरअंदाज करती रहती है। एक दिन बशीर मालती को एक और लड़के के साथ घूमते हुए देख लेता है। 

मालती द्वारा लगातार नजरअंदाज किए जाने तथा उसे किसी और लड़के के साथ देखे जाने के कारण वह अपने परिवार की एक महिला के साथ मिलकर मालती के चेहरे पर एसिड फेंक देता है, इसके बाद मालती की जिंदगी बदल जाती है। उसका चेहरा पूरी तरह से बदल जाता है साथ ही समाज का रवैया भी। लेकिन इन सबके बीच उसके पिता की मालकिन शिराज और उनकी वकील अर्चना (मधुरजीत सरघी) उसके साथ खड़े होते हैं और लड़ने की हिम्मत देते हैं। 

इन सबके बीच मालती की मुलाकात एसिड अटैक सर्वाइवर्स के लिए संस्था चलाने वाले अमोल (विक्रांत मैसी) से होती है। मालती भी इस संस्था से जुड़ कर काम करने लगती है तथा अपने व दूसरे एसिड अटैक सर्वाइवर के लड़ाई को आगे बढ़ाती है। वह एसिड की बिक्री रोकने के लिए अदालत में एक पीआइएल भी दाखिल करती है और इसमें काफी हद तक सफल भी होती है।

यह पूरी तरह से दीपिका पादुकोण की फिल्म है जिन्होंने अपने आप को मालती के किरदार में पूरी तरह से ढाल लिया है। यहां वे अपने चेहरे के साथ नहीं बल्कि मालती के चेहरे के साथ है, फिर भी एक पल के लिए भी आप उनके चेहरे से अपनी नजर नहीं हटा सकते हैं। परदे पर वे दीपिका नहीं मालती नजर आती है।

उन्होंने मालती के किरदार को शिद्दत से जिया है और इस किरदार के हर शेड्स को बहुत बारीकी से पकड़ने की कोशिश की है। विक्रांत मैसी ने भी उनका अच्छा साथ दिया है। एक सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में उनका किरदार पूरी तरह से बारीकियों के साथ उभर कर सामने आता है। वकील की भूमिका को मधुरजीत सरघी प्रभावित करती हैं।
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एसिड अटैक पीड़िताएं - फोटो : अमर उजाला
मेघना गुलजार महिला प्रधान फिल्में बनाने में माहिर हैं इससे पहले वे ‘तलवार’ और ‘राजी’ जैसी फिल्मों के जरिए हम उनका कमाल देख चुके हैं। यहां भी वे विषय की गंभीरता से बिना कोई छेड़-छाड़ किए उसे सिनामाई रूप देती हैं।

मैलोड्रामा होने के तमाम संभावनाओं के बावजूद वे दीपिका के किरदार को इससे बचा ले जाती है और अपने सधे हुए डायरेक्शन के बूते वे दीपिका पादुकोण जैसी मेनस्ट्रीम की अदाकारा से इस दर्जे का अभिनय करवा लेती हैं।  

दुर्भाग्य से ‘छपाक’जैसी जरूरी फिल्म को भी नफरत और राजनीतिक बहिष्कार का सामना करना पड़ा है जिससे पता चलता है कि आज भारत जैसे देश में किसी भी कलाकार के लिए राजनीतिक स्टैंड लेना कितना जोखिम भरा काम हो गया है। दीपिका पादुकोण जवाहरलाल नेहरू जेएनयू में हमले के बाद वहां आंदोलनकारी छात्रों के बीच गईं थीं जिसके बाद सोशल मीडिया पर ट्रोल्स की सेना ‘छपाक’फ़िल्म के खिलाफ अभियान में जुट गई।

ट्विटर पर छपाक को बायकॉट करने का अभियान चलाया गया और इसको लेकर फ़ेक न्यूज़ चलाया गया कि मेकर्स ने “छपाक” में तेज़ाब पीड़िता पर हमले के मुख्य अभियुक्त नदीम ख़ान का नाम बदलकर राजेश रख दिया है।

बहरहाल, ‘छपाक’ ऐसी कहानी है जिसे कही ही जानी थी। यह सिर्फ फिल्म नहीं बल्कि एसिड हमलों पर एक गहन केस अध्ययन है। छपाक अपने मजबूत कॉन्टेंट पर पूरा भरोसा बनाये रखती है और पूरे समय इससे कहीं भटकती नहीं है।

यह बिना लेक्चर झाड़े एसिड अटैक पीड़िताओं के दर्द और संघर्ष को तो दिखाती ही है साथ ही उन्हें बेचारे के तौर पर पेश करने से पूरी तरह से बचती भी है। यह एक उलझे हुए विषय पर बहुत ही सहज सिनेमा है जो लड़कियों के चेहरों पर पड़े तेज़ाब के साथ इसे फेंकने वालों के दिमागों में पड़े तेज़ाब को भी दिखाती हैं।
 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें  blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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