बदरीनाथ के मास्टर प्लान पर भी आशंका
केदारनाथ की तरह ही विशेषज्ञों की राय के बिना बदरीनाथ का मास्टर प्लान भी बना। इससे पहले 1974 में बिड़ला ग्रुप के जयश्री ट्रस्ट द्वारा बदरीनाथ के जीर्णोद्धार का प्रयास किया गया था, लेकिन चिपको नेता चण्डी प्रसाद भट्ट, गौरा देवी तथा ब्लाक प्रमुख गोविन्द सिंह रावत आदि के विरोध के चलते उत्तर प्रदेश सरकार ने निर्माण कार्य रुकवा दिया था। बदरीनाथ एवलांच, भूस्खलन और भूकम्प के खतरों की जद में है और वहां लगभग हर 4 या 5 साल बाद एवलांच से भारी नुकसान होता रहता है।
प्राचीनकाल में अनुभवी लोगों ने बदरीनाथ मंदिर का निर्माण ऐसी जगह पर किया जहां एयर बोर्न एवलांच सीधे मंदिर के ऊपर से निकल जाते हैं और बाकी एवलांच अगल-बगल से सीधे अलकनन्दा में गिर जाते, इसलिए मंदिर तो काफी हद तक सुरक्षित माना जाता है, लेकिन 3 वर्ग किमी में 85 हैक्टेयर में फैले बदरी धाम का ज्यादातर हिस्सा एवलांच और भूस्खसलन की दृष्टि से अति संवेदनशील है।
वास्तव में जब तक वहां के चप्पे-चप्पे का भौगोलिक और भूगर्वीय अध्ययन नहीं किया जाता तब तक किसी भी तरह के मास्टर प्लान का कोई औचित्य नहीं है। बदरीनाथ के तप्तकुण्डों के गर्म पानी के तापमान और वॉल्यूम का भी डाटा तैयार किए जाने की जरूरत है, क्योंकि अनावश्यक छेड़छाड़ से पानी के स्रोत सूख जाने का खतरा बना रहता है।
गंगोत्री पर भैरोंझाप का खतरा
भागीरथी के उद्गम क्षेत्र में गंगोत्री मंदिर पर भैंरोंझाप नाला खतरा बना हुआ है। इसरो द्वारा देश की चोटी के वैज्ञानिक संस्थानों की मदद से तैयार किए गए लैण्डस्लाइड जोनेशन मैप के अनुसार गंगोत्री क्षेत्र में 97 वर्ग किमी. इलाका भूस्खलन की दृष्टि से संवेदनशील है जिसमें से 14 वर्ग किमी. का इलाका अतिसंवेदनशील है। गोमुख का भी 68 वर्ग कि.मी. क्षेत्र संवेदनशील बताया गया है।
भूगर्व सर्वेक्षण विभाग के वैज्ञानिक पी.वी.एस. रावत ने अपनी एक अध्ययन रिपोर्ट में चेताया है कि अगर भैरोंझाप नाले को ठीक नहीं किया गया तो ऊपर से गिरने वाले बडे़ बोल्डर गंगोत्री मंदिर को धराशयी करने के साथ ही भारी जनहानि कर सकते हैं।
यमुनोत्री मंदिर के सिरहाने खड़े कालिंदी पर्वत से वर्ष 2004 में हुए भूस्खलन से मंदिर परिसर के कई निर्माण क्षतिग्रस्त हुए तथा छह लोगों की मौत हुई थी। वर्ष 2007 में यमुनोत्री से आगे सप्तऋषि कुंड की ओर यमुना पर झील बनने से तबाही का खतरा मंडराया जो किसी तरह टल गया। वर्ष 2010 से तो हर साल यमुना में उफान आने से मंदिर के निचले हिस्से में कटाव शुरू हो गया है। कालिन्दी पर्वत यमुनोत्री मन्दिर के लिए स्थाई खतरा बन गया है। सन् 2001 में यमुना नदी में बाढ़ आने से मंदिर का कुछ भाग बह गया था।
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