बदले मौसम का खेती पर सबसे बुरा असर
दिसंबर में तापमान न गिरने और फिर फरवरी में ही गर्मी जैसा मौसम हो जाने का सबसे बुरा असर खेती पर पड़ा है। सरसों जैसी फसलों में वक्त से पहले फूल आ गए। इसकी वजह से फलियां भी कम हुई हैं। विंटर रैन न होने से फसलों में रोग की संभावना भी बढ़ी है और फसली कीड़ों की पैदावार भी।
एशिया के सबसे बड़े संस्थान इंडियन वैटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के विषय विशेषज्ञ डॉ. रणजीत सिंह कहते हैं-
इस बार दिसंबर से ही तापमान ज्यादा रहा। इससे खेतों में पौधे ज्यादा बड़े नहीं हो पाए। अधिक तापमान से अभी भी फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस बार रबी की फसलों में कल्ले कम आए हैं। राई और सरसों के पौधों में वक्त से पहले फूल और बालियां आ गई हैं। मौसम के इस बदलाव की वजह से गेहूं की पैदावार भी कम होगी।
इस दफा पैदावार 20 किलो प्रति बीघा कम होने का अनुमान है। डॉ. रणजीत सिंह ने बताया कि मौसम के इस बदलाव से फसलों में रोग आने की संभावना भी बढ़ गई है। पौधों में खर्रा रोग होने की उम्मीद बढ़ जाएगी। माहू, चेपा, भुनगा, थ्रिप्स जैसे कीड़ों की पैदावार बढ़ जाएगी। थ्रिप्स प्याज-लहसुन के लिए नुकसानदेह है।
हवा में नमी रहने और तापमान अचानक बढ़ जाने से पौधों की डंडी सूखने लगती है। इससे फसलों को नुकसान होता है। तापमान बढ़न से आलू के पौधे भी ज्यादा बड़े नहीं हो सके। इससे आलू की साइज भी छोटी रह जाएगी। उन्होंने कहा कि तापमान का उतार-चढ़ाओ पौधों में बीमारियों को जन्म देता है और पौधों का रस चूसने वाले कीड़े बहुत बढ़ जाते हैं।
मौसम का बदलाव नुकसानदेह
सामान्य तौर पर देखा जाए तो मौसम के बदलाव के हिसाब से लोग लाइफ स्टाइल चेंज कर लेते हैं। यह एक सामान्य बात लगती है, लेकिन बात बस इतनी भर नहीं है। मौसम का यह बदलाव पूरे पर्यवारण के लिए खतरनाक है। इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।
पर्यावरण एक्टिविस्ट शंभू दयाल कहते हैं कि तेजी से बदल रहे पर्यावरण पर सरकार से लेकर अवाम तक, सभी को चिंता करने की जरूरत है। तमाम सरकारी एजेंसीज हैं जो पर्यावरण के लिए काम कर रही हैं, लेकिन उनका प्रॉसेस बहुत स्लो है। वक्त की जरूरत है कि इसमें तेजी लाई जाए। एक दिन यह विकराल समस्या बनकर सामने खड़ी होगी, तो संभालना मुश्किल होगा। इस बदलाव को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है, वरना इसे सुधारा जा सकता है।
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