फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

मौसम के रस-रंगः सर्दी में गर्मी बढ़ाएगी मुसीबत

सार

इस बार फरवरी में ही गर्मी जैसा आभास हो रहा है। इन दिनों 25 से 28 डिग्री तक तापमान चल रहा है। 20 फरवरी के बाद और ज्यादा तापमान बढ़ने की आशंका जताई जा रही है। मौसम वैज्ञानिक मान रहे हैं कि मार्च में ही तापमान 40 डिग्री तक पहुंच सकता है।
विज्ञापन
इस बार ज्यादा गर्मी पड़ने की आशंका - फोटो : freepik
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

इस बार न हेमंत ऋतु में सर्दी पड़ी और न शिशिर यानी शीत ऋतु का ही असर रहा। फरवरी जहां सर्दी का मौसम होता था, इस बार लोग-बाग दिन में बिना स्वेटर और जैकेट के घूम रहे हैं। धूप अच्छी नहीं लग रही है। दिन गर्म हैं और रातें मुकाबले में थोड़ी सर्द। दिन में कभी सामान्य हवा चलती है तो कभी सर्द। इससे तापमान फ्लैक्चुएट हो रहा है। नतीजे में न सिर्फ मन और शरीर पर असर पड़ रहा है, बल्कि फसलों को भी नुकसान हो रहा है। 

विज्ञापन


सर्दी का अनुमान गलत निकला

इस बार बारिश भरपूर हुई। मौसम वैज्ञानिकों ने बताया कि पिछले साल जैसी ही अच्छी सर्दी पड़ेगी। फरवरी 2024 में भरपूर ठंड रही थी तो इस अनुमान पर सभी को भरोसा था। सर्दी को लेकर लगाया गया कयास गलत साबित हुआ। दिसंबर भी उतना सर्द नहीं रहा, जितना कि होना चाहिए था। दिसंबर में न ज्यादा कोहरा पड़ा और न शीत लहर ही चली। कई बार तापमान सामान्य से ज्यादा रहा। 

क्या रही वजह?

बरेली कॉलेज में पर्यावरण विभाग के अध्यक्ष डॉ. एपी सिंह कहते हैं कि इस बार विंटर रेन नहीं हुई। इसकी वजह से मौसम अभी से गर्म है।

आम तौर पर दिसबंर और जनवरी में बारिश होती थी। कई दिनों तक होने वाली इस बारिश से न सिर्फ जमीन नम हो जाती थी, बल्कि वातावरण में भी नमी रहती थी। इस नमी की वजह से कोहरा और पाला बना रहता था। इस बार इनवारयमेंट में डिस्टर्बेंस रहा। इससे मौसम का मिजाज अभी से बदल गया है। बारिश की साइकिल आगे बढ़ी है। अब जून की जगह जुलाई में बारिश शुरू होती है। इसके समकक्ष जाड़े का मौसम आगे नहीं बढ़ा, बल्कि गर्मी जल्दी आ गई। 
विज्ञापन


फरवरी में ही गर्मी जैसा आभास हो रहा है। इन दिनों 25 से 28 डिग्री तक तापमान चल रहा है। 20 फरवरी के बाद और ज्यादा तापमान बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।

मौसम वैज्ञानिक मान रहे हैं कि मार्च में ही तापमान 40 डिग्री तक पहुंच सकता है। डॉ. एपी सिंह कहते हैं कि जनवरी सामान्य से ज्यादा गर्म रही। इस लिहाज से लग रहा है कि लोगों को मार्च में ही मई जैसी गर्मी झेलनी पड़ सकती है। अगर अब भी पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय हो जाता है तो बारिश हो सकती है। इससे सर्दी का असर बढ़ सकता है। वरना गर्मी का बढ़ना तय है। 

विज्ञापन

फसलों पर मौसम का असर - फोटो : Freepik.com
बदले मौसम का खेती पर सबसे बुरा असर

दिसंबर में तापमान न गिरने और फिर फरवरी में ही गर्मी जैसा मौसम हो जाने का सबसे बुरा असर खेती पर पड़ा है। सरसों जैसी फसलों में वक्त से पहले फूल आ गए। इसकी वजह से फलियां भी कम हुई हैं। विंटर रैन न होने से फसलों में रोग की संभावना भी बढ़ी है और फसली कीड़ों की पैदावार भी।

एशिया के सबसे बड़े संस्थान इंडियन वैटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट स्थित कृषि विज्ञान केंद्र के विषय विशेषज्ञ डॉ. रणजीत सिंह कहते हैं- 

इस बार दिसंबर से ही तापमान ज्यादा रहा। इससे खेतों में पौधे ज्यादा बड़े नहीं हो पाए। अधिक तापमान से अभी भी फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। इस बार रबी की फसलों में कल्ले कम आए हैं। राई और सरसों के पौधों में वक्त से पहले फूल और बालियां आ गई हैं। मौसम के इस बदलाव की वजह से गेहूं की पैदावार भी कम होगी।

इस दफा पैदावार 20 किलो प्रति बीघा कम होने का अनुमान है। डॉ. रणजीत सिंह ने बताया कि मौसम के इस बदलाव से फसलों में रोग आने की संभावना भी बढ़ गई है। पौधों में खर्रा रोग होने की उम्मीद बढ़ जाएगी। माहू, चेपा, भुनगा, थ्रिप्स जैसे कीड़ों की पैदावार बढ़ जाएगी। थ्रिप्स प्याज-लहसुन के लिए नुकसानदेह है।

हवा में नमी रहने और तापमान अचानक बढ़ जाने से पौधों की डंडी सूखने लगती है। इससे फसलों को नुकसान होता है। तापमान बढ़न से आलू के पौधे भी ज्यादा बड़े नहीं हो सके। इससे आलू की साइज भी छोटी रह जाएगी। उन्होंने कहा कि तापमान का उतार-चढ़ाओ पौधों में बीमारियों को जन्म देता है और पौधों का रस चूसने वाले कीड़े बहुत बढ़ जाते हैं। 

मौसम का बदलाव नुकसानदेह

सामान्य तौर पर देखा जाए तो मौसम के बदलाव के हिसाब से लोग लाइफ स्टाइल चेंज कर लेते हैं। यह एक सामान्य बात लगती है, लेकिन बात बस इतनी भर नहीं है। मौसम का यह बदलाव पूरे पर्यवारण के लिए खतरनाक है। इसे गंभीरता से लेने की जरूरत है।

पर्यावरण एक्टिविस्ट शंभू दयाल कहते हैं कि तेजी से बदल रहे पर्यावरण पर सरकार से लेकर अवाम तक, सभी को चिंता करने की जरूरत है। तमाम सरकारी एजेंसीज हैं जो पर्यावरण के लिए काम कर रही हैं, लेकिन उनका प्रॉसेस बहुत स्लो है। वक्त की जरूरत है कि इसमें तेजी लाई जाए। एक दिन यह विकराल समस्या बनकर सामने खड़ी होगी, तो संभालना मुश्किल होगा। इस बदलाव को कोई भी गंभीरता से नहीं ले रहा है, वरना इसे सुधारा जा सकता है। 


-------------
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें