फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

दूसरा पहलू: उषा मंदिर का बिगड़ता-बनता रूप और लोदी मीनार... बाणासुर की बेटी से जुड़ा है प्रसंग

Wed, 26 Aug 2026 09:22 AM IST
ज्योति भास्कर भूपेंद्र कुमार, अमर उजाला।

सार

आधा परिसर मस्जिद और आधा मंदिर है। इसे श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध और बाणासुर की बेटी उषा के प्रेम के प्रतीक के तौर पर बनवाया गया था। परिसर के पास ही लोदी मीनार है, जिसमें दरवाजा व घुमावदार सीढ़ियां हैं। द्वार पर फारसी में शिलालेख है, जिसके अनुसार 1519-20 ईस्वी में इसे इब्राहिम लोदी के शासनकाल में निजाम खान ने बनवाया था।
विज्ञापन
लोदी मीनार और उषा मंदिर - फोटो : अमर उजाला प्रिंट-ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

उषा या उखा। अगर आप राजस्थान के भरतपुर शहर से 30 किलोमीटर दूर ऐतिहासिक रूप से बेहद समृद्ध बयाना में हैं, तो यह सवाल आपके सामने बार-बार आएगा। उषा, यानी सूर्य की पहली किरण। असुरों के राजा बलि के सबसे बड़े बेटे बाणासुर के नाम पर ही बयाना बसा है और उषा इसी बाणासुर की बेटी थी। यह कहानी कब मिथक और इतिहास की भूलभुलैया में आपको ले जाएगी, इसका एहसास आपको तब होगा, जब आप उषा मंदिर या उखा मस्जिद के सामने खड़े होंगे।

विज्ञापन


मंदिर-मस्जिद वाला परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के अधीन है। आधा परिसर मस्जिद और आधा मंदिर है। दोनों को जोड़ने वाले दरवाजे को ईंटों से बंद कर दिया गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस मंदिर को श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध और बाणासुर की बेटी उषा के प्रेम के प्रतीक के तौर पर बनवाया गया था। मान्यता है कि सूर्य की पहली किरण सबसे पहले मंदिर को स्पर्श करती है, इसीलिए इसका नाम उषा है।

एएसआई के अनुसार, 956 ईस्वी में इसका निर्माण प्रतिहार वंश के राजा महिपाल के समय में रानी चित्रलेखा ने करवाया था। कुछ इतिहासकार इसे गुप्त काल से भी जोड़ कर देखते हैं। इस परिसर के पास ही लोदी मीनार है, जिसमें दरवाजा और घुमावदार सीढ़ियां हैं। द्वार पर फारसी में शिलालेख है, जिसके अनुसार 1519-20 ईस्वी में इसे इब्राहिम लोदी के शासनकाल में निजाम खान ने बनवाया था। दिलचस्प यह कि उखा शब्द उषा का ही अपभ्रंश है।
विज्ञापन


इस मस्जिद का निर्माण दिल्ली के अंतिम खिलजी सुल्तान कुतुबुद्दीन मुबारक शाह के शासनकाल में 1320 ईस्वी में मलिक काफूर मोहरदार ने करवाया था। कुछ इतिहासकार मानते हैं कि मंदिर के मलबे का इस्तेमाल मस्जिद बनाने में किया गया। मेहराब और गलियारे कुतुब मीनार की याद दिलाते हैं। जगह-जगह फारसी में शासनादेश भी लिखे हैं।

बहरहाल, 17वीं सदी आते-आते मुगल साम्राज्य कमजोर होने लगा। भरतपुर के जाट शासक सूरजमल के पिता बदन सिंह ने 1723 ईस्वी में बयाना पर कब्जा किया और परिसर में मूर्तियों की स्थापना की। इस परिसर में अब नमाज नहीं पढ़ी जाती है। मस्जिद वाले हिस्से को एएसआई ने बंद किया हुआ है। इस परिसर का रखरखाव खराब है और पहुंचना भी आसान नहीं है। कभी बाबर पर राणा सांगा की जीत से इतिहास के पन्नों पर बयाना की जो चमक थी, वह धीरे-धीरे गुम सी होती जा रही है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें