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मामा भी और महबूब भी है चांद, माशूका की खूबसूरती का जिक्र भी है चांद

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चंद्रयान-2 जब देर रात, चांद की सतह को छूएगा तो महबूब का माशूका़ से मिलन होगा। उस महबूब का जो सालों से अपनी माशूका के इंतजार में था। - फोटो : ISRO
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चंद्रयान-2 जब देर रात, चांद की सतह को छूएगा तो महबूब का माशूका़ से मिलन होगा। उस महबूब का जो सालों से अपनी माशूका के इंतजार में था। इंतजार की इस घड़ी में अब बस कुछ ही घंटे बचे हैं। इसरो के वैज्ञानिकों के साथ ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी खुद इस ऐतिहासिक पल का गवाह बनने के लिए मौजूद रहेंगे। चांद का सौंदर्य हमेशा से ही कवियों, लेखकों और शायरों के साथ ही आम जन को लुभाता रहा है।

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ये ही वजह है कि हिंदी साहित्य में चांद मामा बन जाता है तो वहीं, उर्दू साहित्य में चांद को महबूब की उपमा दे दी जाती है। 'चंद्र खिलौना लैहों' जैसे बिंब अब भी हमारे जेहन में उसी तरह से बैठे हुए हैं जैस बचपन में थे। रुबाई हो या गीत या फिर शायरी हमारे 'चंदामामा' कभी आंगन में चांद के टुकड़े के तौर पर उतर आते हैं तो कभी हमारे महबूब की सूरत में झलक जाते हैं। कहीं छुरी भी बन जाते हैं, कहीं मिश्री की तरह पानी में घुल जाते हैं। गुलजार का चांद अलग है तो सूरदास का चांद अलग ... मुक्तिबोध के चांद का मुंह टेढ़ा है तो परवीन शाकिर का चांद तन्हा है। तुलसीदास का चांद रूपक बनकर खिलौने में तब्दील हो जाता है और बच्चा चंद्रमा की चाहत खिलौने के तौर पर करने लगता है।

दरअसल, हिंदी में चांद की समागत तुलना रूप और गुण के आधार पर हुई। हर किसी को हर वक्त चांद ने लुभाया, चांद ने अपनी तरफ आकर्षित और सम्मोहित किया। इसलिए, आज भी हम चांद की तरह ही महबूबा मांगते हैं। चांद को दूध-भात खिलाने का सपना देखते हैं। बच्चा, छत में खड़े होकर चांद को अपनी मम्मी का भाई समझता है और पुकार लगाता है- चंदामामा, चंदामामा।
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हममे से हर किसी ने उस कविता को बचपन में जरूर दोहराया होगा जहां हमारा बाल मन उड़नखटोले में बैठकर चंदा मामा के घर जाने की ख्वाहिश संजोता था। अगर यह कविता याद नहीं आ रही तो गुनगुना लीजिए ताकि रात के तीसरे पहर जब चांद दक्षिणी ध्रुव को छुएगा तो |बचपन के चंदमामा बिंब के तौर पर आपके आंखों के सामने उतर आएंगे--

चंदामामा दूर के,
पुए पकाए पूर के
आप खाएं थाली में,
मुन्ने को दें प्याली में

प्याली गई टूट मुन्ना गया रूठ
लाएंगे नई प्यालियां
बजा- बजा के तालियां
लाएंगे नई प्यालियां..
 
मुन्ने को मनाएंगे
हम दूध मलाई खाएंगे, 
चंदामामा दूर के...
 उड़नखटोले बैठ के मुन्ना
चंदा के घर जाएगा
तारों के संग आंख मिचौली
खेल के दिल बहलाएगा
ठुमक ठुमक मेरा मुन्ना
वापस घर को आएगा, 

 

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हिंदी में चांद की समागत तुलना रूप और गुण के आधार पर हुई। हर किसी को हर वक्त चांद ने लुभाया, चांद ने अपनी तरफ आकर्षित और सम्मोहित किया। - फोटो : self
सूरदास ने तो भगवान कृष्ण के बाल्यावस्था में चांद की ललक की ओर इंगित करते हुए पूरा दोहा ही लिख दिया।  

'चंद्र- खिलौना लैहों, मैया 
मैया, मैं तौ चंद-खिलौना लैहौं
जैहौं लोटि धरनि पर अबहीं, तेरी गोद न ऐहौं
सुरभी कौ पय पान न करिहौं, बेनी सिर न गुहैहौं
ह्वै हौं पूत नंद बाबा को , तेरौ सुत न कहैहौं
आगैं आउ, बात सुनि मेरी, बलदेवहि न जनैहौं
हँसि समुझावति, कहति जसोमति, नई दुलहिया दैहौं
तेरी सौ, मेरी सुनि मैया, अबहिं बियाहन जैहौं
सूरदास ह्वै कुटिल बराती, गीत सुमंगल गैहौं


दरअसल, चंद्रमा, मनुष्य सभ्यता के इतिहास में कई रंगों और छटाओं में हमारे जीवन के हर आयाम को प्रभावित करता आ रहा है। वह बच्चों के खिलौने से लेकर बच्चों की आंखों में आश्चर्य और जिज्ञासा भरने वाला तारा तक है जिसकी चमक बाल मन में यदा- कदा ही नहीं, रात्रि के अंधकार में भी हमेशा जाग्रत रहती है। चंद्रमा, प्रेमियों के लिए सुंदरता का उपमान है। शायरों और कवियों के लिए खूबसूरती का पैमाना। गालिब हों, मीर हों, सूर हों या फिर गुलजार से लेकर जावेद अख्तर तक चांद के सौंदर्य को हर कलम ने अपनी-अपनी भावनाओं और संवेदनाओं के जरिए समेटा है। फिल्मों में चांद ही था जो प्रेमी और प्रेमिका के मिलन का साक्षी बना। चांद, जहां विज्ञान की दुनिया का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पिंड रहा तो वहीं पृथ्वी पर मनुष्य के भीतर ख्वाहिशों, ख्वाबों और कल्पनाओं को जगाने वाला सौंदर्य का प्रतिमान।

चंद्रमा घूम रहा है। पृथ्वी की परिक्रमा कर रहा है और इसी परिक्रमा के कारण पृथ्वी पर ऋतु चक्र परिवर्तन हो रहा है। मौसम बदल रहे हैं। चंद्रमा के जन्म की अनेक कहानियां, मनुष्य सभ्यता के इतिहास से निकलकर आधुनिक मानव जाति के पास मौजूद है।  आज जबकि आधुनिक विज्ञान ने सूचना प्रौद्योगिकी के बूते अंतरिक्ष और ब्रह्मांड के रहस्यों को उजागर किया है तो निरंतर खोज करते हुए बहुत कुछ ऐसा हासिल किया है जो हमारी कल्पनाओं से इतर एक नई दुनिया को हमारे सामने रखता है। चंद्रमा, मनुष्य की उसी जिज्ञासा और खोज की यात्रा का एक पड़ाव है। साल 2009 में भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में चंद्रयान की उड़ान ने दुनिया के नजरिए को बदल कर रख दिया। आज 2019 में चंद्रमा की सतह पर भारतीय आधुनिक विज्ञान का स्पर्श एक नया इतिहास रचने जा रहा है। 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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