पीएम नरेंद्र मोदी, कांग्रेस नेता राहुल गांधी, बसपा प्रमुख मायावती, सपा नेता अखिलेश यादव
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उत्तर प्रदेश में यह मानकर चलना चाहिए कि बसपा का पुनर्जीवन किसी भी अर्थ में राजग और इंडिया गठबन्धन के लिए बड़ी चुनौती तो पेश कर ही सकता है। पर यह भी उतना ही सच है कि बहन मायावती के राजनीतिक फैसले का पूर्वानुमान लगना कम जोखिम भरा नहीं है। मायावती को कम से कम उत्तर प्रदेश में अपनी पार्टी को 'रिलॉन्च' करने और अपने भतीजे आकाश आनन्द को राजनीतिक कमान सौंपना भर देना काफी नहीं होगा। बसपा के कैडर को यह ठीक से समझना और साफ सन्देश देना होगा कि बसपा, भाजपा की बी टीम नहीं है और किसी भी चुनाव में उनके पार्टी के उम्मीदवारों का चयन भाजपा के मनमुताबिक नहीं होगा- जैसा कि इस बार लोकसभा चुनाव और इसके पहले सन् 2022 के उत्तर प्रदेश के राज्य विधान सभा के चुनावों में हुआ।
फिलवक्त भाजपा हर मुद्दे पर जैसे बचाव की मुद्रा में दिखती है। कई दफा तो उसकी स्थिति दयनीय नज़र आने लगती है। खासकर लोकसभा में विपक्ष के अक्रामक तेवर के समय। कई बार तो लोकसभा में संसदीय कार्य मंत्री के बजाय गृहमंत्री अमित शाह को मोर्चा संभालना पड़ता है। भाजपा के लोकसभा सदस्य जैसे सदन के नियम- कायदों से तो अंजान दिखते ही हैं, सोलहवीं लोकसभा में जैसे हर मुद्दे पर मोदी सरकार की रक्षा में खड़े होने वाले सांसदों का रुख भी इस बार कुछ बदला- बदला नज़र आता हैं।
सवाल है कि क्या वे मोदी सरकार के कुछ फैसलों से नाराज़ हैं ? और इस वजह से विपक्षी दलों के हमलावर रुख के सामने बेबस और लाचार नज़र आते हैं। कहीं ऐसा तो नहीं कि भाजपा को अन्दर से 'ब्रांड मोदी' की चमक फीकी पड़ने का अंदेशा होने लगा है, और अब मोदी सरकार विकसित भारत के संकल्प के लिए बड़े फैसले लेने के बजाय छोटे-छोटे फैसले पर यूटर्न लेने लगी है। वक्फ बोर्ड की संपत्ति का सवाल हो, चाहे ज्वाइंट सेक्रेटरी स्तर पर लेटरल इंट्री का मामला मोदी सरकार के हालिया रुख से तो कुछ ऐसे ही संकेत मिल रहे हैं। भाजपा कार्यकर्ताओं में भी ऐसा सन्देश जा रहा है। तो क्या यह मान लेना चाहिए कि मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का आशियाना ऐसे 'नाजुक साख ' पर खड़ा है, जिसकी जड़े हिलाने और फिर उखाड़ने का हथियार विपक्षी दलों के हाथ लग गया हैं?
अभी बहुत ज्यादा दिन तो नहीं बीते जब मोदी सरकार की हर गारंटी भाजपा को भी भरोसा होता था और देश की जनता भी कुछ फैसलों को छोड़ कर आमतौर मोदी सरकार का साथ देती थी। ऐसा क्या घटित हो गया कि मोदी सरकार इस बार कुछ सहमी-सहमी नज़र आ रही है। इस देश में दसवीं लोकसभा के चुनावों के बाद नरसिम्हा राव की अल्पमत की सरकार भी पांच साल तो काट ही ले गई थी। उस सरकार में बड़े आर्थिक सुधार के फैसले लेने पीछे नहीं रही।
आम सहमति के आधार वह सरकार चल रही थी और देश डावाडोल आर्थिक हालत का सामना करने के लिए कमोवेश विपक्ष का भी साथ मिल ही जाता था। तब विपक्ष में अटल बिहारी वाजपेई, लालकृष्ण आडवाणी, जसवंत सिंह, विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर, इंद्रजीत गुप्ता, सोमनाथ चटर्जी और जार्ज फर्नांडीस जैसे कद्दावर नेता मौजूद थे। पर नरसिम्हा राव सरकार ने बड़े और कठोर फैसले लेने में न हिचकिचाई न पीछे हटी। यह अलग बात है कि उस सरकार के मंत्रियों और खुद प्रधानमंत्री पर भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोप लगे। बाबरी मस्ज़िद का विध्वंस उस सरकार के ढुलमुल रवैए की वजह से हुआ। इन आरोपों के कारण एक अरसे तक कांग्रेस अलग - थलग पड़ गई।
आज कांग्रेस हाल हाल तक मजबूत दिख रही मोदी सरकार पर नए जोश और आरक्षण, संविधान की रक्षा, जातीय जनगणना, किसानों के सवाल घेरती है, तो इन राजनीतिक मुद्दों के अलावा कांग्रेस इस रणनीति पर भी काम करती नज़र आती हैं कि इस सरकार को हर उस सवाल घेरा जाए और बदनाम किया जाए, जो आज के जवलंत मुद्दे हैं, मसलन महंगाई, बेरोजगारी, दलित-आदिवासी और अल्पसंख्यकों के मामले। फिर यह साबित किया जाए कि यह सरकार चंद पूजीपति घरानों की ही हितैषी है। इस सरकार में जानबूझकर आमजन को उसके वाजिब हक महरूम किया जा रहा है। इस रणनीति को कामयाब करने के लिए अगर झूठ - फरेब का भी सहारा लेना पड़े , तो कोई हर्ज नहीं । क्यों कि उत्तर आधुनिक राजनीति के इस दौर में राजनीति में किसी सरकार अथवा किसी व्यक्ति को असफल साबित करने के लिए इतना ही काफ़ी है कि उस सरकार अथवा व्यक्ति विशेष पर तमाम उलजलूल आरोप लगाकर बदनाम कर दिया जाए, इतना ही किसी सरकार को पराजित करने के लिए काफ़ी है।
इस दौर की राजनीति को एक छोटी कहानी के जरिये भी समझा जा सकता है। वह यह कि जब जनता में झूठ सुनने की योग्यता बढ़ जाती है। तब झूठ बोलने के दावे भी बढ़ जाते हैं। आचार्य रजनीश अपने प्रवचनों में अकसर मुल्ला नसरुद्दीन के हवाले से अपनी बात करते है। मुल्ला नसरुद्दीन अपने भतीजे को एक कहानी सुना रहे थे कि एक जंगल में यात्रा के समय उन पर दस शेरों ने एक साथ हमला किया। मैंने पांच शेरों को मार गिराया। उनके भतीजे ने उनके दावे पर आपत्ति जताई। कहा कि कुछ महीने पहले तो आप पांच ही शेरों के हमले किए जाने की बात बता रहे थे। मुल्ला नसरुद्दीन ठहरे एक होशियार आदमी। उन्होंने भतीजे को बताया कि तब तुम्हारी उम्र कुछ कम थी, इस नाते तुममें झूठ सुनने की उतनी योग्यता उस वक्त नहीं थी। अब तू कुछ बड़ा हो गए हो और बड़े झूठ सुनने के योग्य भी हो गए हो। इस लिए मैं कुछ बढ़ाचढ़ा कर झूठे दावे कर सकता हूं। आज कहीं विपक्ष भी कुछ मामले में उतने ही बड़े झूठे दावे तो नहीं कर रहा, और आमजन उनके झूठे झांसे में तो नहीं आ रही हैं।
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