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सीबीआर्इ: बड़ी जांच एजेंसी का छोटा होता भरोसा

Sat, 27 Oct 2018 03:07 PM IST
सारंग उपाध्याय
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सीबीआई - फोटो : file photo
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जांच एजेंसियां किसी भी राष्ट्र की आंतरिक सुरक्षा की रीढ़ होती हैं। यह संस्थाएं देश में एक वफादार चौकीदार की तरह होती हैं। यह वह भरोसा होती हैं जिनके बूते राष्ट्र की सामाजिक आैर संवैधानिक संस्थाएं कार्यवाहियों आैर उत्तरदायित्व के प्रति निष्ठावान रहती हैं। 
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इस समय देश में भ्रष्टाचार आैर बड़ी से बड़ी आपदा व दुर्घटना की जांच के लिए बनाई गई शीर्षस्थ जांच एजेंसी केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो यानी सीबीआई एक बार फिर से विवादों में है। सीबीआई के अंदर जो कुछ भी हो रहा है वह बेहद शर्मसार करने वाला है। जांच करने वाली संस्था के दो शीर्ष अधिकारी खुद ही भ्रष्टाचार के आरोपों में फंसे हैं आैर दोनों के बीच झगड़ा देश की बड़ी अदालत में पहुंच गया है। 

भ्रष्टाचार की जांच करने वाली सीबीआई पर जांच की आंच
मीडिया में लगातार घटनाक्रम सामने है। खबरें जितनी आ रही हैं, सीबीआर्इ से भरोसा उतना ही कम होता जा रहा है। अपनी जांच को लेकर अक्सर विवादों में रहने वाली केंद्र सरकार की इस संस्था की छवि दरकते जा रही है। पहले बड़े अधिकारियों के बीच विवाद, फिर देश की दिग्गज आंतरिक सुरक्षा एजेंसी आर्इबी के अधिकारियों का जासूसी के आरोप में गिरफ्तार होना बताता है कि जांच एजेंसियों में हो क्या रहा है, आैर जो हो रहा है वह बहुत ही हल्का आैर शर्मिंदा करने वाला है।
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देश ही नहीं दुनिया में है सीबीआर्इ का प्रभाव
दरअसल, सीबीआर्इ की स्थापना भ्रष्टाचार के मामलों की जांच करने के लिए हुर्इ थी। सीबीआर्इ 1941 में स्पेशल पुलिस एक्ट के तहत अस्तित्व में आर्इ थी आैर कामकाज के बूते ही यह भारत सरकार की सबसे प्रमुख जांच एजेंसी बन गर्इ आैर आज भी मानी जाती है।

देश में इस जांच एजेंसी के प्रभाव का अंदाजा ही इस बात से लगाया जा सकता है कि यह इंटरपोल यानी की अंतरराष्ट्रीय आपराधिक पुलिस संस्था की भी आधिकारिक र्इकार्इ है। इसका अर्थ है कि यह ना केवल इंटरपोल से जानकारी साझा करती है, बल्कि कर्इ हार्इ प्रोफाइल मामलों में विदेश से जानकारी जुटाने के लिए इंटरपोल से सूचनाआें का आदान-प्रदान भी करती है। फिलहाल भारत ही नहीं बल्कि विदेशों से कनेक्शन रखने वाले कई महत्वपूर्ण मामलों की जांच भी इस समय सीबीआई के पास है।

जाहिर है एेसे में अंदाजा लगाया जा सकता है कि सीबीआर्इ की साख आैर प्रतिष्ठा भारत ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में क्या अहमियत रखती है। जबकि हाल के उपजे विवाद ने उसकी साख को देश में ही कमजोर नहीं किया है, बल्कि विदेश में भी उसकी प्रतिष्ठा को चोट पहुंचार्इ है।

राजनीतिक दुरुपयोग 
बीते कुछ दशकों में सीबीआई राजनीतिक दुरुपयोग का ऐसा शिकार हुर्इ है कि इसे पिंजरे में बंद तोता तक कहा गया है। इसके कर्इ दिग्गज अधिकारी भी भ्रष्टाचार के आरोप में जांच के घेरे में आए हैं। इस समय सीबीआई के दो रिटायर्ड महानिदेशक ए.पी. सिंह और रंजीत सिन्हा पर भी जांच चल रही है, लेकिन यह पहली बार है कि सीबीआर्इ के दो शीर्ष अधिकारियों का झगड़ा सड़क पर है, विपक्ष धरने पर है आैर सुप्रीम कोर्ट फैसला सुना रहा है।

छोटा होता सीबीआई का भरोसा
बहरहाल, शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट ने सीवीसी से इस पूरे मामले की जांच उच्चतम न्यायालय के एक सेवानिवृत्त जज की निगरानी में करवाने का आदेश दिया है। एक तरह से देखा जाए तो कोर्ट का यह आदेश न्यायपालिका आैर कार्यपालिका के बीच टकराव रोकने की आेर बढ़ाया गया कदम ही है। सरकार ने भी कोर्ट की सराहना की है। लेकिन सवाल यह है कि इस मामले के बाद देश की इस प्रमुख आैर बड़ी जांच एजेंसी का भरोसा भी उतना बड़ा रह गया है? या फिर वही लगातार छोटा होता जा रहा है?

शर्मसार करने वाला घटनाक्रम 
एक देश के लिए यह कितनी हास्यास्पद आैर शर्मसार करने वाली बात है कि एक जांच एजेंसी जो पूरे देश के हर बड़े मामले आैर घटनाक्रम की जांच करती हो उसके शीर्ष अधिकारी भ्रष्टाचार में एक-दूसरे पर आरोप लगा रहे हैं। जांच करने वाले ही जांच के दायरे में हैं। अंदाजा लगाइए यहां विश्वास की बुनियाद कैसी होगी? भरोसा कितना बड़ा आैर उसका दायरा कितना छोटा होगा?

सरकार का पक्ष 
खैर, इस मामले में वित्तमंत्री अरुण जेटली कह रहे हैं कि 'सरकार प्रोफेशनलिज्म को बरकरार रखने, छवि और सीबीआई की संवैधानिक अखंडता को बरकरार रखने में दिलचस्पी रखती है। ऐसे में सवाल फिर है कि जांच पारदर्शिता के साथ हो भी गर्इ, सीबीआर्इ की स्वायत्तता भी वैसी ही रही जैसी कि इस विवाद से पहले जैसी थी तो भी यह जांच एजेंसी वह भरोसा कहां से लाएगी जिसे लेकर समय-समय पर सवाल हर दल के नेता उठाते रहे हैं? एक दूसरे के खिलाफ इसके दुरुपयोग का आरोप लगाते रहे हैं?

कैसे लौटेगा भरोसा
सीबीआर्इ में उठा यह मामला इस बात की आेर भी इंगित करता है कि एक जांच एजेंसी लगातार राजनीतिक हस्तक्षेप के चलते क्या हो जाती है? उसकी शक्तियां, उसके अधिकार एक हथियार की तरह कैसे इस्तेमाल किए जाते हैं आैर बाद में उसके भीतर के शीर्ष नेतत्व एक दूसरे के खिलाफ ही इन शक्तियों का इस्तेमाल करने लग जाते हैं।

दरअसल, प्रजातंत्र संवैधानिक संस्थाआें आैर उनमें बचे लोकतंत्र के बीच जीवित रहता है आैर उसकी प्राणशक्ति एक मजबूत विश्वास में बहती है आैर यदि वह विश्वास ही चला जाए तो उसे लौटा पाना आसान नहीं होता।
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सोचकर देखिए सीबीआर्इ पर अब आपका भरोसा कितना रहा है?

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं. आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है.
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