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जनगणना 2027: भारत की पहचान और भविष्य का दर्पण

सार

2027 की जनगणना के बाद संसदीय सीटों का पुनर्सीमांकन एक संवेदनशील मुद्दा है। यह प्रक्रिया न केवल राजनीतिक ताकत का भूगोल बदल सकती है, बल्कि भारत के संघीय ढांचे को भी प्रभावित कर सकती है।
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जनगणना। - फोटो : freepik
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विस्तार
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भारत, एक ऐसा देश जहां विविधता और विशालता एक साथ सांस लेती हैं, अब अपनी अगली जनगणना के लिए तैयार हो रहा है। लंबे इंतजार के बाद सरकार ने 2027 तक जनगणना पूर्ण करने की घोषणा की है, लेकिन यह केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो भारत की सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक तस्वीर को नए सिरे से परिभाषित कर सकती है। जनगणना के आंकड़े न केवल यह बताएंगे कि हम कितने हैं, बल्कि यह भी कि हम कौन हैं, कहां हैं, और हमारा भविष्य कैसा हो सकता है।

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यह एक राष्ट्रीय दस्तावेज है जो नीतियों को दिशा देता है, संसाधनों का बंटवारा करता है, और देश की एकता को मजबूत करने का अवसर प्रदान करता है। लेकिन इसके साथ ही यह कई जटिल सवाल भी उठाता है- क्या ये आंकड़े समय पर उपलब्ध होंगे? क्या इनका उपयोग समावेशी विकास के लिए होगा, या यह राजनीतिक और सामाजिक विभाजन को गहरा करेगा? यह लेख इन सवालों की पड़ताल करता है और जनगणना के महत्व को नए संदर्भ में प्रस्तुत करता है।

समयसीमा और पुनर्सीमांकन का सवाल

भारत सरकार ने घोषणा की है कि 2027 तक जनगणना का कार्य पूरा कर लिया जाएगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या इसके अंतिम आंकड़े 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले उपलब्ध हो पाएंगे? और यदि हां, तो क्या संसदीय क्षेत्रों के पुनर्सीमांकन की प्रक्रिया समय पर पूरी हो सकेगी?
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पिछली जनगणना 2011 में हुई थी, जिसके आंकड़े 2013 में ही उपलब्ध हो पाए थे। यदि इस बार भी ऐसी ही देरी होती है, तो 2029 के चुनावों से पहले पुनर्सीमांकन की प्रक्रिया अधूरी रह सकती है। यह देरी न केवल नीतिगत योजनाओं को प्रभावित करेगी, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भी असमंजस पैदा कर सकती है। उदाहरण के लिए, 1971 की जनगणना के आधार पर 2002 में शुरू हुआ पुनर्सीमांकन 2008 तक ही पूरा हो पाया था। ऐसे में समयबद्धता सुनिश्चित करना सरकार के लिए एक बड़ी चुनौती है।

जनगणना का व्यापक महत्व

जनगणना केवल जनसंख्या की गणना तक सीमित नहीं है। यह देश की सामाजिक, आर्थिक और भौगोलिक संरचना का आधार तैयार करती है। 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत की 68% आबादी ग्रामीण क्षेत्रों में रहती थी, लेकिन पिछले एक दशक में शहरीकरण की गति तेज होने के कारण यह अनुपात बदल सकता है। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में जनसंख्या का वितरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, आय और प्रवास जैसे पहलुओं की जानकारी नीतिगत योजनाओं के लिए आवश्यक है।

उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) के अनुसार, 2011-2020 के बीच भारत में शहरीकरण की दर 31% से बढ़कर अनुमानित 35% तक पहुंच चुकी है। लेकिन सटीक आंकड़ों के अभाव में शहरी बुनियादी ढांचे, रोजगार योजनाओं और सामाजिक कल्याण कार्यक्रमों की योजना बनाना मुश्किल हो रहा है। जनगणना के आंकड़े यह भी बताएंगे कि कितने लोग मुफ्त राशन, आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के पात्र हैं, और उपभोग की बदलती प्रवृत्तियां क्या हैं।

पुनर्सीमांकन और क्षेत्रीय असंतुलन

2027 की जनगणना के बाद संसदीय सीटों का पुनर्सीमांकन एक संवेदनशील मुद्दा है। यह प्रक्रिया न केवल राजनीतिक ताकत का भूगोल बदल सकती है, बल्कि भारत के संघीय ढांचे को भी प्रभावित कर सकती है। दक्षिण भारत के राज्य जैसे तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक ने जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। 2011 की जनगणना के अनुसार, तमिलनाडु का जनसंख्या वृद्धि दर मात्र 15.6% था, जबकि उत्तर प्रदेश में यह 20.2% था।

यदि सीटों का वितरण केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ, तो उत्तर भारत के राज्यों को अधिक सीटें मिलेंगी, जिससे दक्षिण भारत के राज्यों में प्रतिनिधित्व कम हो सकता है। यह ‘उत्तर बनाम दक्षिण’ का टकराव पैदा कर सकता है, जो भारत की एकता और संघीय ढांचे के लिए खतरा बन सकता है। इसे संतुलित करने के लिए सरकार को वैकल्पिक मॉडल पर विचार करना चाहिए, जैसे जनसंख्या के साथ-साथ क्षेत्रीय और सामाजिक कारकों को भी ध्यान में रखना।

जातिगत जनगणना: अवसर या जोखिम?

जातिगत जनगणना का मुद्दा भी चर्चा में है। सरकार ने संकेत दिए हैं कि इस बार जातियों की गणना हो सकती है, लेकिन इसका स्वरूप और उपयोग अभी अस्पष्ट है। 2011 में सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना (SECC) की गई थी, लेकिन इसके आंकड़ों का उपयोग नीतिगत स्तर पर सीमित रहा। बिहार और कर्नाटक में हाल की जातिगत जनगणनाएं विवादों में घिरी रहीं, और इनसे कोई ठोस नीति नहीं बन पाई।

जातिगत आंकड़े सामाजिक न्याय और समावेशी नीतियों के लिए उपयोगी हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, यह जानना महत्वपूर्ण है कि कितने लोग अभी भी सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हैं। लेकिन यदि इन आंकड़ों का उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए हुआ, तो यह समाज में विभाजन और तनाव को बढ़ा सकता है।

भारत पहले ही जाति, धर्म और क्षेत्रीय आधार पर कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसलिए सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि जातिगत जनगणना का उपयोग समावेशी विकास के लिए हो, न कि विभाजनकारी राजनीति के लिए।

डिजिटल युग में जनगणना की प्रासंगिकता

भारत आज डिजिटल अर्थव्यवस्था और वैश्विक निवेश के दौर में है। स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया और मेक इन इंडिया जैसे कार्यक्रमों के लिए सटीक जनसांख्यिकीय डेटा जरूरी है। उदाहरण के लिए, नीति आयोग की 2023 की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में 15-59 आयु वर्ग की 65% आबादी कार्यशील है, लेकिन बेरोजगारी और कौशल की कमी एक बड़ी चुनौती है। बिना सटीक आंकड़ों के, सरकार इन समस्याओं का समाधान नहीं कर सकती।

इसके अलावा, जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय चुनौतियों के संदर्भ में भी जनगणना महत्वपूर्ण है। यह हमें बताएगी कि कितने लोग तटीय क्षेत्रों, बाढ़-प्रवण क्षेत्रों या सूखाग्रस्त क्षेत्रों में रहते हैं, जिससे आपदा प्रबंधन और पर्यावरण नीतियां बनाना आसान होगा।

एकता और विकास के लिए जनगणना

जनगणना केवल आंकड़ों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह भारत की पहचान को समझने का एक जरिया है। यह हमें बताती है कि हम कौन हैं, कहां हैं, और हमें किस दिशा में जाना है। लेकिन इसके साथ एक बड़ी जिम्मेदारी भी जुड़ी है। सरकार को चाहिए कि वह न केवल समयबद्ध जनगणना सुनिश्चित करे, बल्कि इसके आंकड़ों का उपयोग समावेशी और टिकाऊ नीतियों के लिए करे।

2027 की जनगणना भारत के लिए एक अवसर है — एक ऐसी जनगणना जो समाज को जोड़े, क्षेत्रीय और सामाजिक असंतुलन को कम करे, और विकास के लिए एक ठोस आधार तैयार करे। यह समय है कि हम आंकड़ों को न केवल गिनें, बल्कि उन्हें समझें और उनके आधार पर एक मजबूत, एकजुट भारत का निर्माण करें।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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