यह सिर्फ संयोग नहीं है कि छह माह बाद होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले देश में आरक्षण का मुद्दा फिर से गरमा रहा है। इस बार यह दो तरफा और दोधारी तलवार की तरह है। मसलन नई दिल्ली के जंतर मंतर पर सामान्य वर्ग के युवाओं ने देश में आरक्षण खत्म करने और इसकी आर्थिक आधार पर समीक्षा करने की मांग को लेकर ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ किया तो दूसरी तरफ केन्द्र और कई राज्यों में सत्तारूढ़ एनडीए के घटक दलों आरक्षण हर हाल में जारी रखने की वकालत की।
आरक्षण विरोधियों के हाथों में बैनर और भगवा झंडे थे। ये लोग ‘एक परिवार, एक आरक्षण’ की मांग भी कर रहे थे। इसके जवाब में जातिवादी राजनीति करने वाले घटक दलों ने साफ कहा कि आरक्षण खत्म करना तो दूर, इसकी समीक्षा की बात भी मंजूर नहीं है। यह देश में जाति आधारित आरक्षण को लेकर सड़कों पर टकराव की नई शुरूआत भर है।
यूपी में भाजपा की जीत की तमाम अटकलों के बावजूद आगामी विस चुनाव अगर इसी लाइन पर चला गया तो योगी सरकार की तीसरी बार सत्ता में वापसी मुश्किल हो सकती है। इस पूरे मामले में भाजपा की स्थिति ‘इधर कुआं, उधर खाई’ वाली है। वह न तो सामान्य वर्ग की मांग का खुलकर समर्थन कर पा रही है और न ही आरक्षण हर हाल में जारी रखने की बात डंके की चोट पर कह पा रही है।
इसी बीच कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने देश में हो रही जाति जनगणना को अधूरा बताते हुए मांग की है कि इसमें पिछड़ा वर्ग जातियों के लिए अलग से कॉलम हो, ताकि उनकी सही संख्या पता चल सके। जबकि केन्द्र सरकार ने जनगणना में पूछे जाने वाले 40 सवालों में जाति का कॉलम तो रखा है, लेकिन यह कही भी स्पष्ट नहीं किया है कि ओबीसी में कौन-कौन सी जातियां आधिकारिक रूप से शामिल हैं। ऐसे में ओबीसी आबादी की की संख्या कैसे पता चलेगी?
दिल्ली में चले ‘आरक्षण हटाओ आंदोलन’ की शुरूआत भी कॉकरोच जनता पार्टी की तर्ज पर उस वक्त हुई, जब हर्ष दुबे नामक छात्र ने आरएचए (आरक्षण हटाओ आंदोलन) का इंस्टाग्राम पेज शुरू किया। जल्द ही हजारों युवा आरएचए से जुड़ गए और बड़ी संख्या में जंतर मंतर प्रदर्शन में शामिल हुए।
उधर इस आंदोलन को लेकर लोक जनशक्ति पार्टी के नेता व केन्द्रीय मंत्री चिराग पासवान ने कहा कि जातिगत आरक्षण संवैधानिक अधिकार है। समाज में जातिगत भेदभाव कायम रहने तक यह जारी रहेगा। भीम आर्मी ने भी आरक्षण हटाओ का पूरी तरह विरोध किया।
हालांकि, अभी मामला बयानबाजी तक सीमित है, लेकिन अगर इसने जोर पकड़ा तो एनडीए में फूट भी पड़ सकती है। इसी जातिगत आरक्षण का दूसरा और दूरगामी कोण है, जातिगत जनगणना। भारत में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (एससी/एसटी) जातियों गणना तो पहले से होती रही है। लेकिन जब से देश में पिछड़ी जातियों (ओबीसी) को आरक्षण मिला है, तब से उनकी संख्या पता लगाने का दबाव सरकारों पर बढ़ता गया है।
मोटे तौर पर माना जाता रहा है कि देश में हिंदू समाज में ओबीसी की संख्या कुल आबादी का लगभग 50 फीसदी है। लेकिन यह अनुमानित आकंड़ा है और इसका सीधा सम्बन्ध वोट बैंक से है। ऐसे में मोदी सरकार पर विपक्षी पार्टियां लगातार दबाव बना रही हैं कि वह जनगणना में ओबीसी जाति गणना शामिल करें।
काफी असमंजस और राजनीतिक गुणा भाग के बाद केन्द्र सरकार ने जाति गणना को जनगणना में शामिल तो किया, लेकिन विपक्ष इसके तरीके से संतुष्ट नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर जनगणना जनगणना के सवालों में पिछड़ा वर्ग शब्द नहीं होने पर भी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि इससे देश में ओबीसी आबादी का सही आंकड़ा सामने आने में परेशानी हो सकती है।
कांग्रेस नेताओं ने इसके लिए तेलंगाना और बिहार जैसी प्रक्रिया अपनाने की मांग की है। दरअसल जनगणना में जो चालीस सवाल पूछे जाने वाले हैं, उनमें 10 वां प्रश्न अपनी जाति बताने का भी है। यानी नागरिक अपनी जो चाहे जाति बताएगा, वह रिकॉर्ड में आ जाएगी, लेकिन सामूहिक तौर पर ओबीसी जातियों और उसके सदस्यों की कुल संख्या का पता शायद ही चल पाए। यानी कहने को जाति गणना हो भी जाएगी और नहीं भी होगी।
चूंकि इस बार जाति जनगणना डिजीटल हो रही है, इसीलिए विपक्ष जनगणना में ड्राॅप डाउन मेन्यू शामिल करने की मांग कर रहा है। ड्राॅप डाउन मेन्यू बोले तो एक कॉलम जिसमें ओबीसी के तहत आने वाली सभी अधिसूचित जातियों के नाम होते हैं, जिनमें से कोई एक आॅप्शन व्यक्ति अपनी इच्छा से चुन सकता है।
इसमें पेंच यह है कि देश में केन्द्र सरकार के सामाजिक न्याय और अधिकारिता विभाग की अधिकृत सूची के मुताबिक अधिसूचित ओबीसी जातियों की संख्या 99 है। इनमें भी 35 जातियां मुस्लिमों की हैं। लेकिन इसका राज्यवार आंकड़ा अलग-अलग है। अकेले मप्र में ही ओबीसी की 68 जातियां अधिसूचित हैं।
देश में सर्वाधिक 261 ओबीसी जातियां महाराष्ट्र में हैं तो सबसे कम 5 ओबीसी जातियां अंडमान निकोबार में हैं। देश के सभी राज्यों और केन्द्र शासित प्रदेशों की ओबीसी सूची को मिला दें तो भारत में ओबीसी की कुल अधिसूचित 2027 जातियां बनेंगी। ऐसे में ड्राॅप डाउन मेन्यू में यह बहुत बड़ा कॉलम बनेगा। जबकि इसकी तुलना में देश में एससी जातियों की संख्या लगभग आधी यानी 1270 ही है। इसी तरह देश में कुल 748 आदिवासी समूह हैं।
लेकिन यहां बात केवल एक अलग कॉलम की ही नहीं है। पेचीदा सवाल ओबीसी की जातिवार गणना आंकड़ों के सामने आने के बाद का है। क्योंकि उसके बाद देश में जो राजनीतिक और सामाजिक तनाव, संघर्ष और उथल पुथल शुरू होगी, वह न केवल मोदी बल्कि सभी सरकारों के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए।
अभी जाति गणना सही ढंग से न होने का मुद्दा उठा रहे राहुल गांधी ने पिछले साल पार्टी के ओबीसी सम्मेलन में इस बात के लिए माफी मांगी थी कि यूपीए के दौरान सत्ता में रहकर भी हम जाति जनगणना नहीं करा सके। यह सही नहीं है। क्योंकि डाॅ.मन मोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में हुई 2011 की जनगणना में समाजार्थिक के साथ जातिगणना कराई गई थी। लेकिन उसमें भी ड्राॅप डाउन मेन्यू नहीं था।
सारी गणना मेन्युअल ही हुई थी। इस गणना में पता चला कि लोगों ने जाति के नाम पर अपनी उपजाति, कुल, गोत्र अादि तक लिखवा दिए थे। भारत में जातियों की कुल संख्या करीब 46.7 लाख तक जा पहुंची, जो वास्तविकता से बहुत दूर थी। इसका एक कारण यह भी है कि देश में एक ही जाति अलग-अलग हिस्सों में कई नामों से पहचानी जाती है।
सोचिए जरा कहां भारत में सभी जातियों की आधिकारिक कुल संख्या लगभग 3 हजार और कहां 46 लाख। इन आंकड़ों से घबराई तत्कालीन सरकार ने इन्हें जारी ही नहीं किया। इस बार भी खतरा उसी तरह का है। क्योंकि लोगों से कहा गया है कि वो खुद ही अपनी जाति बताएं। कोई सूची पहले से देकर सिलेक्ट करने का आॅप्शन नहीं है।
ज्यादातर लोगों को इस बात का ज्ञान नहीं है कि जातियों की अधिकृत सूची में कौन-कौन सी जातियां शामिल हैं। दूसरे, इसमें सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े, आरक्षित वर्ग में िपछड़ और अति पिछड़े वर्ग की सही संख्या पता लगाना मुश्किल होगा, जबकि इन वर्गों के कल्याण के लिए योजना बनाने की दृष्टि से ही आंकड़े सामने होना जरूरी है।
कांग्रेस जिस जाति गणना के िजस तेलंगाना माॅडल की बात कर रही है, उसमें जाति की सूची बाकायदा दी गई थी, खासकर ओबीसी के संदर्भ में। खास बात यह भी थी कि इसमे एक कॉलम ‘अजातीय’ ( नो कास्ट) का भी था, अर्थात ‘किसी जाति का नहीं।‘ ऐसा लिखवाने वालों की संख्या भी 3.4 फीसदी थी। इस जाति जनगणना में तेलंगाना में ओबीसी की संख्या राज्य की कुल आबादी का 46.25 प्रतिशत पाई गई, जो देश में अनुमानित ओबीसी संख्या 50 फीसदी के आसपास ही है।
इसी जनगणना से यह भी स्पष्ट हुआ कि राज्य में ओबीसी श्रेणी में भी सर्वाधिक संख्या मुदिराज जाति की है, जो 7.4 फीसदी है, जबकि दूसरी सबसे बड़ी ओबीसी जाति यादव (गोल्ला या ग्वाला) समुदाय की है, जो 5.69 प्रतिशत है।
जातियों की स्पष्ट संख्या गिनती का बड़ा खतरा यह है कि जैसे ही किसी भी जाति या समुदाय की सही संख्या उजागर होगी, उसी अनुपात में ‘जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी’ लागू करने की मांग तेज होगी। देश में सामान्य वर्ग की संख्या लगभग 20 फीसदी है।
सही आंकड़ा आने पर उसी अनुपात में उनकी नौकरियों और राजनीति में उनका प्रतिनिधित्व सीमित करने की मांग भी उठेगी। इसके अलावा जातियों की सभी श्रेणियों में संख्या के आधार पर आंतरिक संघर्ष और छीना झपटी तेज होगी।
कुल मिलाकर हर मामले में पैमाना किसी भी जाति की संख्या से तय होगा। इससे सबसे बड़ा धक्का ‘हिंदू एकता’ नारे को लग सकता है, क्योंकि जाति की संख्या के आधार पर ब्लैकमेल की प्रवृत्ति बढ़ेगी।
उधर यूपी में योगी इस खतरे को भांप कर राज्य में महिला वोटरों को रिझाने के िलए रेवड़ी कल्चर को प्रमोट करने में लगे हैं, लेकिन लाभार्थी महिलाएं भी चुनाव के समय अगर जातीय समूहों में बंट गई तो भाजपा के लिए बहुत मुश्किल होगी। हालांकि रेवड़ी मामले में सपा भी उसका काउंटर कर रही है।
दरअसल कांग्रेस और विपक्षी पार्टियां अपने तात्कालिक राजनीतिक स्वार्थों के चलते भले जाति जनगणना के बर्र के छत्ते में हाथ डाल रही हों, लेकिन सत्ता में आने पर इसमें उनके भी हाथ इसकी आंच में झुलसेंगे यह तय है।
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