ताइवान में वोटिंग के लिए लाइन में खड़े लोग
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ताइवान में शनिवार को नया राष्ट्रपति चुनने के लिए वोट पड़े। मौजूदा राष्ट्रपति और डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव एलाइंस की उम्मीदवार साईं इंग विन और कुओमिंतांग पार्टी के खान ग्वो ई के बीच यह मुकाबला चीन की पेशानी पर बल डालने वाला है। अगर साईं इंग विन दूसरी बार सत्ता में लौटती हैं तो चीन की मुश्किलें बढ़ जाएंगी। इंग विन ताइवान को चीन से अलग देश मानती हैं। उनकी तुलना में खान चीन के प्रति तनिक सहानुभूति रखते हैं। मगर ताइवान को चीन का हिस्सा वे भी नहीं मानते। हांगकांग में लगातार विरोध प्रदर्शनों का सामना कर रहे चीन के लिए अमेरिका का ताज़ा रवैया भी झटके से कम नहीं है। उसने ताइवान के साथ आला स्तर पर सीधे ही पींगें बढ़ानी शुरू कर दी हैं।
असल में ताइवान के बदले सुरों में चीन को खुली बगावत की बू करीब दो महीने पहले आई। नवंबर में गोल्डन हॉर्स फ़िल्म समारोह में सम्मानित फ़िल्म निर्देशक फ़ू यू ए ने अपने भाषण में ताइवान को स्वतंत्र देश माना। इससे वहां उपस्थित चीन समर्थकों ने हंगामा किया। तब राष्ट्रपति इंग विन ने हस्तक्षेप किया और साफ़ साफ़ कहा कि ताइवान चीन का हिस्सा नहीं है। इसके बाद चीन के कान खड़े हो गए । तब से दोनों चीन देशों के बीच तनाव है।
दोनों के चीन कहे जाने की भी अपनी अलग कहानी है। दोनों देश ही अपने को असल चीन बताते हैं। अगर हम क़रीब पौने चार सौ साल याने 1644 में लौटें तो चीन में चिंग राजवंश को सत्ता में पाते हैं। इसका चीन और ताइवान पर शासन था। कोई सवा सौ साल पहले चिंग वंश ने ताइवान जापान को दे दिया था। दूसरे विश्वयुद्ध में हार के बाद यह जापान ने कूओमिंतांग को वापस कर दिया।
जब 1949 में चीन की सत्ता पर माओत्से तुंग की अगुआई में कम्युनिस्ट पार्टी सत्तारूढ़ हुई तो कुओ मिनतांग ताइवान चले गए।तबसे आज तक ताइवान आज़ाद है। यह ताइवान अपना पुराना नाम रिपब्लिक ऑफ चाइना मानता है। इस कारण कम्युनिस्ट पार्टी ने अपने चीन का नाम बदलकर पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना रख लिया। इस आधार पर ताइवान अपने को असली चीन मानता है। जिन देशों ने ताइवान को स्वतंत्र देश की मान्यता दी है, उनसे चीन के संबंध टूटे हुए हैं। अमेरिका ने बीते दिनों नया यात्रा क़ानून बनाकर ताइवान से सीधी रिश्तेदारी बना ली है। चीन इससे खफा है।
भारत ने 1949 में कम्युनिस्ट पार्टी के नेतृत्व में अस्तित्व में आए चीन को ही मान्यता दी थी। लेकिन 1991 में नरसिंह राव सरकार ने ताइवान से कारोबारी रिश्ते बहाल किए और जमी बर्फ़ पिघलने लगी। सन 1995 में इंडिया ताइपे एसोसिएशन का गठन हुआ और ताइवान के साथ भारत के व्यापार ने रफ़्तार पकड़ी। दो बरस पहले भारत और ताइवान के बीच कारोबारी क़रार हुआ, जिससे व्यापार बढ़कर साढ़े छह अरब डॉलर तक पहुंच गया। भारत में ताइवान के राजदूत भी हैं। चीन इससे चिढ़ा हुआ है।
अब अगर इंग विन को एक करोड़ नब्बे लाख मतदाता दोबारा चुनते हैं तो माना जा रहा है कि ताइवान को देश के रूप में मान्यता की राह आसान हो जाएगी। हालांकि पिछले दिनों स्थानीय चुनावों में इंग विन की पार्टी को पराजय का सामना करना पड़ा था। पर उसके बाद विधायी चुनाव में उसने अपनी स्थिति सुधार ली। इस वजह से भी ताइवान के राष्ट्रवादी आशावान हैं। कुल मिलाकर ताइवान का नया राष्ट्रपति मुल्क के लिए ऐतिहासिक साबित हो सकता है।