राजनीतिक दृष्टि से बिहार को खास तौर पर उपकृत किया गया है। जिसमें मखाना बोर्ड का गठन प्रमुख है।
- फोटो : self
दरअसल, भारत में आर्थिकी की गाड़ी को बुलेट ट्रेन की रफ्तार से दौड़ाने, भारत को 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनाने में अभी कई चुनौतियां और रोड़े हैं। वित्त मंत्री द्वारा पेश आर्थिक सर्वेक्षण में यह बात साफ कही गई है कि देश की आर्थिकी के बुनियादी तत्व मजबूत हैं, इसलिए सकल घरेलू उत्पादन (जीडीपी) की ग्रोथ रेट 7.4 प्रतिशत के आसपास रहने वाली है।
यह इस मायने में तो संतोषजनक है कि दुनिया के केवल 11 देश ऐसे हैं, जिनकी जीडीपी वृद्धि दर 6 फीसदी से ज्यादा है, लेकिन इनमें भारत को छोड़कर बाकी सभी बहुत छोटे छोटे देश हैं। अगर हमें विश्व की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनना है तो जीडीपी वृद्धि दर 8 फीसदी से ज्यादा चाहिए, जो फिलहाल तो दूर की कौड़ी लगती है।
बहरहाल, जीडीपी ग्रोथ रेट जो भी हो, उसमें मध्यवर्ग की बड़ी भूमिका श्रम, आय, उत्पादन और कर भुगतान की दृष्टि से महत्वपूर्ण है। देश में बढ़ता मध्यम वर्ग इस बात की जमानत है कि बड़ी संख्या में लोग निम्न आय वर्ग के भंवर जाल से बाहर निकल कर बेहतर जिंदगी जीने के आकांक्षी मध्य वर्ग के दायरे में शामिल हो रहे हैं। माना जा रहा है कि आजादी के शताब्दी वर्ष 2047 में मध्य वर्ग की आबादी देश की कुल जनसंख्या का 60 फीसदी होगी। यही वर्ग देश का बहुत बड़ा उपभोक्ता और करदाता वर्ग भी होगा। इसीलिए यह सरकार के लिए ‘कामधेनु’ भी है।
मध्य वर्ग की खूबी यह है कि अगर उसकी आय सीमित है तो अपेक्षाओं का आकाश और खुशियों की झोली भी छोटी है।
- फोटो : PTI
भारत को आर्थिक महाशक्ति बनाने में मध्य वर्ग की महती भूमिका होगा। ऐसे में जब हर पार्टी वोटों की खातिर मुख्य रूप से निम्न वर्ग को रेवड़ी बांटने की स्पर्द्धा में शामिल है, तब ‘कामधेनु’ मिडिल क्लास की उपेक्षा करना अथवा उससे ‘घर के बड़े बेटे’ की तरह हमेशा त्याग और उदारता की अपेक्षा करना न्याय संगत नहीं होगा।
अगर वित्त मंत्री ने सालाना 12 लाख रुपये. तक कि आय को टैक्स फ्री कर दिया है तो इसमें संदेश यही है कि कर न देने के कारण बचा पैसा या तो बाजार में आएगा या फिर बचत के रूप में परोक्ष रूप से सरकार के पास ही जाएगा। यह तबले पर तिरकिट बजाने जैसा है। मेडिकल पॉलिसी पर टैक्स की बचत, अगर आपके माता-पिता सीनियर सिटीजन हैं, तो उनके नाम पर हेल्थ इंश्योरेंस खरीदने पर 50 हजार रुपए तक की अतिरिक्त छूट, नेशनल पेंशन सिस्टम (एनपीएस) में सालाना 50 हजार रुपये तक निवेश करने पर 50 हजार रुपए की छूट ऐसे प्रावधान हैं, जो मध्य वर्ग को सबसे ज्यादा राहत पहुंचाएंगे।
मध्य वर्ग की खूबी यह है कि अगर उसकी आय सीमित है तो अपेक्षाओं का आकाश और खुशियों की झोली भी छोटी है। बीते दो दशकों से मध्यम वर्ग भाजपा के साथ एक मजबूत वोट बैंक के रूप में खड़ा है। वित्त मंत्री ने उसे ही साधे रखने की आर्थिक कवायद की है। इससे मध्य वर्ग कितना संतुष्ट होगा, यह आने वाले चुनाव जता देंगे।
मध्यवर्ग के अलावा देश में बहुत बड़ा वोट बैंक किसानों का है। मोदी सरकार ने इस बजट में किसानों को कर्ज मुहैया कराने वाले किसान क्रेडिट कार्ड की लिमिट 3 लाख से बढ़ाकर 5 लाख कर दी है। सरकार के मुताबिक इससे 7.7 करोड़ किसान, पशुपालकों और मछुआरों को लाभ होगा। किसान क्रेडिट कार्ड योजना 1998-99 में अटलजी की सरकार ने शुरू की थी।
अब इसका लाभ लेने वाले किसानों की संख्या 7 करोड़ से ज्यादा हो चुकी है। देश की आर्थिकी को मोड़ देने वाला बड़ा ऐलान बजट में भारत को खिलौना निर्माण का हब बनाने का है। इस क्षेत्र पर चीन का दबदबा है। भारत की आबादी में करीब 43 करोड़ बच्चे हैं, जिनमें आधे से ज्यादा खिलौनों से खेलने वाले आयु वर्ग के हैं।
ऐसे में भारतीय खिलौनों के लिए घरेलू बाजार तो है ही साथ में विदेशों में निर्यात की संभावनाएं हैं। बशर्ते कि हम उच्च गुणवत्ता, विविधता और तकनीक वाले खिलौने वाजिब दर पर बना सकें। इसके अलावा दालों का उत्पादन बढ़ाने के लिए 6 साल का मिशन, जूता चप्पल उत्पादों के लिए विशेष योजना, सभी सरकारी स्कूलों में ब्राॅड बैंड, इलेक्ट्रिक कारों को बढ़ावा आर्थिकी को तेज करने वाले उपाय हैं।
राजनीतिक दृष्टि से बिहार को खास तौर पर उपकृत किया गया है। जिसमें मखाना बोर्ड का गठन प्रमुख है। याद रहे कि देश में मखाने का सर्वाधिक उत्पादन बिहार में होता है। मखाना ऐसी वस्तु है जो मंगल कार्य से लेकर मय्यत तक में चढ़ती है। माना जा सकता है कि मखाने के जरिए बिहार में आर्थिक विकास की नया मंगल गीत रचने की कोशिश है। साथ ही बिहार में ग्रीन एयरपोर्ट, राष्ट्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी उद्यमिता व प्रबंध संस्थान तथा वेस्टर्न कोसी केनाल प्रोजेक्ट को मंजूरी भी बड़ी घोषणाएं हैं। वहां एनडीए का पूरा फोकस फिर से सत्ता में लौटने पर है। हालांकि इन सबके बाद भी बिहार बीमारू राज्य के अभिशाप से कब निकलेगा, यह कोई नहीं बता सकता।
वैसे बिहार के प्रति यह अतिरिक्त राजनीतिक प्रेम केन्द्रीय वित्त मंत्री के परिधान में भी दिखा। वो इस बार बिहार की मशहूर मधुबनी साड़ी पहन कर बजट पेश करने आईं। वित्त मंत्री के रूप में उनका यह अब तक सबसे छोटा यानी 77 मिनट में खत्म होने वाला भाषण था। उधर विपक्ष को बजट में कुछ भी ‘खास’ नजर नहीं आया। उसका तर्क था कि आर्थिक विकास के आंकड़ों से बहलाने की जगह सरकार को प्रयागराज महाकुंभ में हुई भगदड़ में मरने वालों के आंकड़े देश को बताने चाहिए।
हैरानी की बात यह रही कि मध्य वर्ग को राहत की बरसात शेयर मार्केट को नहीं लुभा पाई। बाजार उछलने के बजाए नीचे चला गया। वैसे आम आदमी की खुशी और बाजार की गमक में कोई सीधा सम्बन्ध नहीं होता। वह किन सेंटीमेंट पर उछलता और किन पर धराशायी होता है, यह खोज का विषय है। हालांकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि गरीब को राहत की संवेदनाओं को सकारात्मक रूप से समझने में बाजार को वक्त लगता है और जरूरी नहीं कि वह समझ ही जाए। बाजार की तुलना में सियासत जन सामान्य के जज्बात को ज्यादा संवेदनशीलता से समझ पाती है। देर से ही सही, मध्यमवर्ग की पुकार को वित्त मंत्री ने समझा है। इसका राजनीतिक फलित आगे उजागर होगा। यानी कामधेनु खुश तो लक्ष्मी का प्रसन्न होना बनता ही है। आगे आगे देखिए, होता है क्या।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।