सरकार ने अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए कारपोरेट टैक्स में छूट दी थी। कारपोरेट टैक्स का बेस 30 प्रतिशत से 22 प्रतिशत लाया गया था।
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टैक्स कलेक्शन का टारगेट पूरा करने में दिक्कत
सवाल यही है कि सरकार के पास खर्च के लिए पैसा कहां से आएगा? टैक्स कलेक्शन को लेकर सरकार के सामने कई चुनौतियां आ गई है। प्रत्यक्ष कर वसूली को लेकर पिछले वित्त वर्ष के टारगेट पूरा करने में परेशानी है। प्रत्यक्ष कर से सरकार ने 13 लाख करोड़ रुपये की आय की योजना थी। लेकिन अभी तक यह 7.5 लाख करोड़ रुपये पहुंच पाया है। टैक्स अधिकारियों के अनुसार प्रत्यक्ष कर 11 लाख करोड रुपये भी आ जाए तो बड़ी बात होगी। जीएसटी के फ्रंट पर लगातार सरकार को चुनौती मिल रही है। यह भी टारगेट से 1 लाख करोड़ रुपये कम रहने की उम्मीद है। वैसे में सरकार के सामने सबसे बडी चुनौती राजकोषिय घाटे को 3 से 3.5 प्रतिशत रखना है। वैसे में सरकार अगर खर्च बढ़ाएगी तो राजकोषीय घाटा बढ़ेगा। दरअसल मंदी ने आयकर से लेकर जीएसटी तक प्रभावित किया है। व्यापारी टैक्स दफ्तरो में जाकर साफ बोल रहे है कि जो टैक्स विभाग निकाल रहा है, उसे देने के लिए उनके पास पैसे नहीं है। ज्यादा तंग करेंगे तो दुकान बंद कर चले जाएंगे। उनके पास दुकान बंद करने के सिवाए कोई चारा नहीं है।
कारपोरेट टैक्स में छूट दिया, लेकिन अर्थव्यवस्था को लाभ नहीं मिला
सरकार ने अर्थव्यवस्था में तेजी लाने के लिए कारपोरेट टैक्स में छूट दी थी। कारपोरेट टैक्स का बेस 30 प्रतिशत से 22 प्रतिशत लाया गया था। वहीं नई कंपनियों के लिए कारपोरेट टैक्स का बेस 25 से 15 प्रतिशत तक लाया गया। लेकिन इससे कोई तेजी नहीं आयी। कंपनियों को जो पैसे कारपोरेट टैक्स से बचे उसे उन्होंने निवेश करने के बचाए भविष्य के लिए बचत कर लिए। नई कंपनियां आयी नहीं। क्योंकि उन्हें लगता है कि भारत से बेहतर निवेश का स्थान इस समय बांग्लादेश, थाईलैंड, वियतनाम, इंडोनेशिया, मलेशिया जैसे देश है जहां कच्चा माल से लेकर सस्ता श्रम उपलब्ध है। वैसे में बेरोजगारी दर के आंकड़े भी देश में बढ़े है। सरकार बेरोजगारी फ्रंट पर बुरी तरह से फेल होती नजर आ रही है।
आयकर में छूट की संभावना, पर लाभ की गारंटी नहीं
बजट से पहले आयकर में छूट की सलाह दी गई है। सरकार को लगता है कि आयकर में छूट देने के बाद आयकर से बचे हुए पैसे लोग बाजार में खर्च करेंगे। इससे अर्थव्यवस्था चलेगी। लेकिन कई अर्थशास्त्रियों की राय है कि इससे भी लाभ की उम्मीद कम है। लोगों का विश्वास अर्थव्यस्था पर नहीं है। लोग बचत करने के चक्कर में है। क्योकि उन्हें लगता है कि भविष्य के लिए कुछ पैसे बचा कर रखें। क्योंकि भविष्य में रोजगार की स्थिति और खराब हुई तो बचे हुए पैसे काम आएंगे। दरअसल देश में ईमानदारी से टैक्स देने वाले लोग मात्र 4 प्रतिशत है। वैसे में सिर्फ इन चार प्रतिशत लोगों से लिए जाने वाले टैक्स में छूट के बाद अर्थव्यवस्था में तेजी आएगी इसकी उम्मीद काफी कम है। क्योंकि कारपोरेट टैक्स में छूट देकर सरकार ने 1.4 लाख करोड़ रुपये का घाटा सरकारी खजाने को दिया, लेकिन इसका लाभ अर्थव्यवस्था को कुछ नहीं मिला।
आंकड़ों की हेरफेर से बचे सरकार
सरकार पर लगातार आंकडों के हेरफेर के आरोप लग रहे है। आर्थिक आंकड़ों के हेरफेर चुनावी फायदा दे सकता है, लेकिन लंबे समय में देश को नुकसा देगा। पूर्व वित्त सचिव का दावा है कि सरकार आर्थिक आंकड़ों में सारा कुछ सच नहीं दिखा रही है। सरकार ऑफ बजट खर्च से वित्तीय घाटा को प्रबंधित कर रही ताकि जनता को सबकुछ ठीक नजर आए। खुद पूर्व वित्त सचिव का दावा है कि वित्त वर्ष 18 में वित्तीय घाटा वास्तव में 4.39 प्रतिशत था। पर सरकार ने इसे मात्र 3.5 प्रतिशत दिखाया था। वित्त वर्ष 2019 में वास्तविक वित्तीय घाटा 4.66 प्रतिशत था जबकि इसे दिखाया 3.5 प्रतिशत गया था। वित्त वर्ष 2020 में वित्तीय घाटा 4.5 से 5 प्रतिशत तक रहने की उम्मीद है। जबकि सरकार का दावा है कि यह 3.3 प्रतिशत तक रहेगा। सरकार कई योजनाओं पर खर्च के लिए ऑफ बजट खर्च का इंतजाम कर रही है। ऑफ बजट खर्च का मतलब होता है कि बजट के बहीखाते से अलग योजनाओं पर खर्च करना। दरअसल सरकार ने ऑफ बजट खर्च से बैंकों का पुन:पूंजीकरण, खाधय़ सब्सिडी और सिंचाई से संबंधित योजनाओं पर पैसे लगाए है। वैसे में यह साफ तौर पर कहा जा सकता है कि सरकार के खुद के आर्थिक हालात बहुत अच्छे नहीं है।
बैकों का एनपीए सबसे ब़ड़ी चुनौती
सरकार के सामने बैंकों का एनपीए सबसे बड़ी चुनौती है। एनपीए कम होने के बजाए लगातार बढ़ रहा है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैकों की हालात खराब है। अर्थशास्त्रियो का दावा है कि बैंकों को चार मोर्चे पर चुनौती मिल रही है। टेलीकॉम सेक्टर और एनर्जी सेक्टर के एनपीए ने बैंकों को पहले ही बदहाल कर दिया था। अब नई चुनौती बैकों के सामने रीएल एस्टेट सेक्टर और नॉन बैंकिंग फाइनांसिएल सेक्टर है। इन दो सेक्टरों को दिए गए कर्ज बैंकों को शायद ही आए। वैसे में बैकों की हालत कैसे सुधरेगी यह समझ में अर्थशास्त्रियों को नहीं आ रहा। बैंक तो बैंक भारतीय जीवन बीमा निगम का एनपीए भी 6 प्रतिशत पहुंच गया है। बताया जाता है कि एलआईसी की स्वायतता पर प्रहार कर सरकार ने एलआईसी के पैसे कई जगहों पर लगवा दिए है। ये पैसे डूब सकते है। वैसे में आम जन का विश्वास एलआईसी से उठ सकता है। इसका सीधा नुकसान एलआईसी को होगा।
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