विदित हो कि वर्तमान में करदाता अपनी वार्षिक आय के हिसाब से आयकर कानून के सेक्शन 80सी, 80सीसीसी, 80सीसीडी, 80डी, 80डीडी, 80डीडीबी, 80यू, 80ईई, 80टीटीए, 80जी, 80जीजी, 87ए, 80ई, 80जीजीसी, 80आरआरबी आदि के तहत 1.5 लाख की छूट हासिल कर सकते हैं जिसमें पीपीएफ/ईपीएफ, पांच वर्ष के बैंक/पोस्ट ऑफिस कर बचत जमा, एनएससी, इक्विटी युक्त बचत योजनाएं, बच्चों का ट्यूशन फी, जीवन बीमा के प्रीमियम, होमलोन (प्रिंसिपल) की देनदारी, नेशनल पेंशन सिस्टम, नए घर की खरीद के लिए स्टॉम्प ड्यूटी चार्ज आदि शामिल होते हैं। टीए, एचआरए, एलटीसी आदि से संबंधित छूट को भी जोड़ लिया जाए तो हिसाब में अधिक का फर्क नहीं पड़ता है।
विशेषकर उन पुराने करदाताओं को जिन्होंने कर में छूट हासिल करने के लिए कई सारे प्लान पहले ही ले रखें हैं। अब यदि वे पुराने प्लान को बंद कराते हैं तो भी नुकसान और नहीं कराते हैं तो भी नुकसान इसलिए आयकर में छूट के माध्यम से आम जनता को राहत और इसके माध्यम से खरीद बिक्री को बढ़ाकर बाजार में मुद्रा के प्रवाह को बढ़ाने का उद्देश्य पूरा होता दिखाई नहीं दे रहा है।
इस प्रकार इसे वित्त मंत्री के आंकड़ों की बाजीगरी कहना ही अधिक तार्किक प्रतीत होता है। हालांकि इस बात से राहत महसूस की जा सकती है कि करदाताओं के पास दोनों विकल्प मौजूद रहेंगे और वे नए या पुराने स्लैब में से किसी भी स्लैब को चुनने के लिए स्वतंत्र होंगे।
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