ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (12-13 सितंबर) और शंघाई शिखर सम्मेलन (एससीओ 31 अगस्त 1 सितंबर) से ऐन पहले भारत और चीन के बीच आपसी धींगामुश्ती हद तक नरम पड़ी है। आपसी तनातनी और वैश्विक हालात के बीच दोनों के लिए यह नरमी शुभ संकेत है। ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए जिनपिंग भारत आने वाले हैं।
ब्रिक्स के बहाने नरेंद्र मोदी और जिनपिंग में द्विपक्षीय वार्ता हो सकती है। इससे पहले शंघाई शिखर सम्मेलन के दौरान दोनों की मुलाकात लगभग तय है। मोदी-जिनपिंग की इन मुलाकातों से पहले राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने चीन जाकर वहां के विदेश मंत्री वांग यी से सीमा विवाद को लेकर उपजे ताजा हालात को शांत और स्थिर करने की दिशा में बड़ी पहल की है।
अरुणाचल के नक्शे को लेकर वाकयुद्ध के बीच एनएसए डोभाल और वांग की मुलाकात में सीमा निर्धारण पर परामर्श तंत्र, दो हॉटलाइन चैनल, सैन्य और कूटनीतिक कोशिशें, सीमा व्यापार, पर्यावरण व अन्य क्षेत्रों में सहयोग के अलावा बह्रमपुत्र-सतलुज नदी पर हाइड्रोलॉजिकल (जल विज्ञान) डाटा साझा करने जैसे 8 अहम मुद्दों पर आपसी सहमति बनी है।
नेपाल के ताजा जलप्रलय को देखते हुए बह्मपुत्र-सतलुज नदी पर जल विज्ञान डाटा साझा करने पर रजामंदी दोनों के लिए हितकारी है। वैसे, हाईड्रोलॉजिकल डाटा साझा करने की पहल आज से करीब 20 वर्ष पहले 2006 में ही हो गई थी। इस दिशा में फिर से बढ़े एहतियाति कदम से हमारे हित और मजबूत व सुरक्षित होंगे। अभी तबाही झेल रहे नेपाल का यही आरोप है कि चीन ने समय से तिब्बत से होने वाली तबाही को लेकर उसे आगाह नहीं किया। ऐसे में नेपाल का मंजर सामने है।
डोभाल-वांग की मुलाकात में यह भी तय हुआ कि सीमा विवाद पर अगले दौर की (26 वीं) बातचीत अगले साल यानी 2027 में भारत में ही होगी। यह भी सीमा विवाद हल की दिशा में भविष्य क रोडमैप तैयार करता है।
भारत और चीन के बीच तनातनी
यूं तो भारत और चीन के बीच तनातनी अरसे से चली आ रही है। 1962 के युद्ध के बाद सिक्किम के नाथुला-चोला में 1967 में, अरुणाचल के तुलुंगला में 1975 में, जून 2020 में पूर्वी लद्दाख के गलवान में, 2022 में अरुणाचल के तवांग में टकराव हुए। 2020 के गलवान संघर्ष में तो हमारे 20 जवान बलिदान तक हो गए। अब ताजा तनातनी अरुणाचल के नक्शे पर 27 स्थानों को लेकर उपजी है।
अरुणाचल भारत का हिस्सा है और नक्शे पर 27 स्थान तय किए तो चीन को मिर्ची लगी। चीन हमेशा ही विस्तारवादी रवैया अपनाता रहा है जिसका भारत ने सदैव विरोध किया है। ऐसे में डोभाल-वांग की मुलाकात से सीमा विवाद को लेकर फिर से सैन्य और कूटनीतिक स्तर पर बातचीत के दरवाजे खोलने की पहल निश्चित तौर पर सराहनीय है। दोनों पहले की शांति व सुरक्षा की स्थिति पर राजी भी है। ऐसे में अब ब्रिक्स और शंघाई के बहाने मोदी-जिनपिंग की बातचीत से विकास के नये दरवाजे खुलने की संभावना बनी है।
शंघाई शिखर सम्मेलन और ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के नजरिये से यह पखवाड़ा बेहद अहम साबित होने वाला है। दरअसल, विस्तारवादी चीन और विकासवादी भारत दोनों के लिए ताजा वैश्विक हालात के बीच ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के मंच पर भारत, रूस और चीन (मोदी, पुतिन व जिनपिंग) की त्रिशक्ति एक साथ नजर आने वाली है, जिस पर अमेरिका के साथ-साथ दुनिया की निगाहें टिकी होंगी।
खाड़ी संकट के बीच भारत, चीन, रूस तीनों की अमेरिका से दूरी बढ़ी है। ताजा हालात में इन त्रिशक्ति (भारत, रूस, चीन) का करीब आना निश्चित तौर पर वैश्विक स्तर पर अपना खासा प्रभाव छोड़ सकता है। वैश्विक अशांति व आर्थिक मोर्चे पर उपजी चुनौतियों से उबरने के लिहाज से त्रिशक्ति की यह नई एकजुटता वैश्विक स्तर पर खास मायने रख सकती है।
चीन के विदेश मंत्री वांग भी यह स्पष्ट संकेत दे चुके हैं कि वर्तमान हालात में भारत के साथ संबंध महज द्विपक्षीय दायरे तक सीमित नहीं रह गए हैं। वैश्विक संघर्ष से उपजी आर्थिक चुनौतियों के बीच हर किसी को अवसर यानी बाजार की तलाश है।
भारत ने खोले चीन के लिए दरवाजे
हाल के वर्षों की तनानती के बाद अब भारत ने भी चीन के लिए अवसर के दरवाजे खोल दिए हैं। 10 मार्च 2026 को मोदी कैबिनेट ने विदेशी निवेश में चीन की कंपनियों के लिए थोड़ी ढील दी। बिजली क्षेत्र में निवेश के लिए पूर्व अनुमति के बैरियर को 10 फीसदी तक के निवेश के लिए पूरी तरह खोल दिया। जनवरी से जून 2026 की छमाही में द्विपक्षीय कारोबार करीब 91.71 अरब डॉलर का हुआ। जुलाई तक कुल द्विपक्षीय कारोबार में 36 फीसदी तक का इजाफा हुआ।
अब चीन की फर्मों की निगाहें 17 से 19 सितंबर के बीच सेमिकॉन इंडिया पर भी टिकी हैं। चीन सेमिकॉन इंडिया के जरिये चिप से लेकर इलेक्ट्रॉनिक बाजार तक पैठ बनाने को उतावला है। यही वजह है कि सेमिकॉन इंडिया (17-19 सितंबर) के ठीक पहले ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (12-13 सितंबर) के लिए जिनपिंग अपने साथ 400 प्रतिनिधियों के शिष्टमंडल को लेकर भारत आने वाले हैं।
यह चीन के लिए अपने बाजार के विस्तारवाद की रणनीति के लिहाज से अहम है। ऐसा नहीं कि ताली सिर्फ एक हाथ यानी भारत की ओर से बजी है। चीन ने भी कैलाश मानसरोवर यात्रा की न केवल राह खोली बल्कि तीर्थयात्रियों की संख्या में भी इजाफा किया। दोनों देशों के बीच सीधी उड़ानें चालू हुईं। भारत ने भी चीन के नागरिकों के लिए वीजा जारी करना शुरू किया।
वर्षों की तनातनी के बीच वास्तविक नियंत्रण रेखा पर हालात सामान्य करने की पहल हुई और दोनों ने अपने-अपने सैनिकों को पीछे खींचा। सीमा विवाद निपटाने के लिए दोनों के बीच कमांडर स्तर की कई दौर की वार्ता हुई। विशेषज्ञ समूह गठित करने का फैसला हुआ। अब फिर से सैन्य संपर्क केंद्र स्थापित करने से लेकर कमांडर स्तर की बैठक व वार्ता के लिए प्वाइंट तय किए गए हैं। सीमा व्यापार के दरवाजे खोले जा रहे हैं। वैश्विक हालात के बीच आर्थिक चुनौतियों से उबरने की दिशा में यह दोनों के लिए ही लाभकारी है।
7 साल बाद मोदी-जिनपिंग की होगी मुलाकात
सितंबर 2014 में पहली बार मोदी-जिनपिंग गुजरात में मिले। फिर 2019 में मोदी-जिनपिंग तमिलनाडु के महाबलीपुरम में मिले। अब करीब 7 साल बाद फिर से मोदी-जिनपिंग शंघाई और ब्रिक्स के बहाने मिलने वाले हैं। कूटनीतिक लिहाज से ये मुलाकात मायने रखेंगी लेकिन सामरिक लिहाज से हमें चौकन्ना भी रहने की जरूरत है क्योंकि 2014 की मुलाकात के बाद 2016 में दोकलम में दोनों देशों की सेनाएं एक-दूसरे के आमने-सामने आ गईं।
2019 की मुलाकात के बाद 2020 में गलवान संघर्ष हुआ। ऐसे में विस्तारवादी चीन से चौकन्ना रहते हुए कूटनीतिक मार्ग के जरिये विकास की राह पर अग्रसर होने की पहल निश्चित तौर पर सराहनीय है। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि इन मुलाकातों के बहाने अब आगे कुछ बात बन जाए क्योंकि वैश्विक हालात भी बुद्ध का मार्ग ही प्रशस्त करते हैं।
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