बहुत से देश चीन से नफरत करते हुए भी उनके उत्पादों का पूर्ण बहिष्कार नहीं कर पा रहे हैं- फाइल फोटो
- फोटो : अमर उजाला
भारत और चीन के बीच में घाटे का व्यापार है। लगभग 8600 करोड़ डॉलर का हम चीन से आयात करते हैं और 7030 करोड़ डॉलर का निर्यात करते हैं। लगभग 1500 करोड़ डॉलर का व्यापार घाटा चीन के साथ हमें होता है, क्योंकि चीन ने ऐसे क्षेत्रों में स्पर्धा करने की क्षमता पैदा कर ली है जिनमें आगे बढ़ने का हम प्रयास ही नहीं कर रहे हैं।
स्पर्धा से हम डरते हैं और मोनोपोली का लाभ उठाते हैं, यही हमारी कमी है। अभी-अभी जारी हुई गेटवे हाउस रिपोर्ट बताती है कि भारत के 30 सफल स्टार्टअप में से 18 में चीनियों का निवेश है। 10 करोड़ डालर से अधिक का निवेश लेने वाली स्टार्टअप यूनीकार्न्स में चीनी लोगों ने जमकर निवेश किया है और खतरा भी उठाया है। इसी कारण धीरे-धीरे दुनिया में उन्होंने व्यावसायिक वरीयता प्राप्त की है।
बहुत से देश चीन से नफरत करते हुए भी उनके उत्पादों का पूर्ण बहिष्कार नहीं कर पा रहे हैं। जब ज़्यादातर अमरीकी कंपनियां भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश कर रही थीं, तब चीनियों ने टेक स्टार्टअप्स में पैसा लगाया। अलीबाबा ,बाइक डांस, टेशेंट जैसी कंपनियों ने 92 भारतीय स्टार्टअप को पैसा दिया है ,जिसमें पेटीएम बाईजूस, ओयो और ओला जैसे यूनिकॉर्न शामिल है।
देश की कंपनियों के रिकॉर्ड में चीनी निवेश न दिखाई पड़े इसके लिए उन्होंने दूसरे देशों के माध्यम से भी निवेश करने की चतुराई की है। अलीबाबा ने पेटीएम में सीधे निवेश ना करके अपनी ही सिंगापुर की कंपनी अलीबाबा सिंगापुर होल्डिंग्स के माध्यम से निवेश किया है।
फॉसून कंपनी ने ग्लैंन फार्मा में लगभग 110 करोड़ डॉलर, एमजी मोटर्स में 30 करोड़ डॉलर का निवेश है। चीनी कंपनियों ने निवेश के क्षेत्र में रिस्क उठाने की क्षमता दिखाई है और वे कामयाब हो गए हैं। शुरुआत में पेटीएम को 3690 करोड़ का घाटा हुआ इसी तरह फ्लिपकार्ट को 3837 करोड़ का घाटा हुआ लेकिन चीनी निवेशकों ने पैर पीछे नहीं हटाए और वह भारतीय व्यापार पर बहुत हद तक कब्जा करने में सफल हो गए। क्या ऐसे चतुर निवेशक से बिना रणनीति के निपटा जा सकता है?
बहुत से देश चीन से नफरत करते हुए भी उनके उत्पादों का पूर्ण बहिष्कार नहीं कर पा रहे हैं- फाइल फोटो
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सरकार को ऐसे रोड मेप के साथ सामने आना चाहिए जिसमें भारत में दवा बनाने के लिए प्रयुक्त एपीआई का देश में ही उत्पादन हो सके, रसायन उद्योग को बढ़ावा मिले, पॉलीमर और अन्य रसायन प्रतिस्पर्धात्मक मूल्यों पर उत्पादित किए जाएं।
सरकार इन कंपनियों में रिस्क उठाए और नीतिगत समर्थन दे। कमलनाथ सरकार जब फार्मा सेक्टर की कंपनियों से निवेश की चर्चा कर रही थी, तब बहुत सी नीतिगत खामियां सामने आईं थीं, जिन्हें उन्होंंने तत्काल दूर किया किंतु ऐसी नीतियां अन्य राज्यों में भी बाधक बनीं है।
सेमीकडक्टर, एम्बेडेड टेक्नालाजी, चिप और मेमोरी मीडिया के क्षेत्र में हमें उतरना पड़ेगा और प्रतिस्पर्धात्मक जुनून के साथ भी तब कहीं यह घेराबंदी सफल हो सकती है।बहुत से देश चीन से नफरत करते हुए भी उनके उत्पादों का पूर्ण बहिष्कार नहीं कर पा रहे हैं किंतु क्या वजह है कि हम केवल नारा लगा रहे हैं और वियतनाम सफल होता दिख रहा है।
सोचिए कि हम लगभग 800 करोड़ रुपये की केवल अगरबत्ती का काड़ी का आयात करते हैं चीन से यह धंधा वियतनाम ने छीन लिया है। चीन ने हमें सिल्क में, गार्लिक में पीछे धकेल दिया है जबकि हमारा सिल्क सदियों से दुनिया की पसंद रहा है? क्या हमारी प्रशासनिक व्यवस्था भ्रष्टाचार छोड़कर जुनूनी भावना से इसे वापिस छीन सकती है?
हम भी उसे घेर सकते हैं पटक सकते हैं, मगर कोरोना की भीषण त्रासदी में भी निजी भंडार भरने वाली मशीनरी के सामने यही बड़ी चुनौती है। अगर जुनून है तो आइए इसका सामना करें यही सच्चा राष्ट्रवाद है।
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