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जन्मदिन विशेषः 'आवारा हूं' लिखने वाले शैलेंद्र ने जिंदगी के गम को अमर गीतों का लिबास पहनाया

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शैलेन्द्र सिर्फ 43 साल की उम्र में हिंदी फिल्म के गीतों के गाड़ीवान की तरह दूर क्षितिज में खो गए। - फोटो : social media
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"कम्बख्त तुझे आज ही का दिन मिला था मुझे छोड़ के जाने के लिए" राजकपूर के मुंह से ये बोलना हुआ और राजकपूर टूट गए, फूट फूटकर बच्चों की तरह रोने लगे। 14 दिसंबर को राज कपूर का जन्मदिन होता था और इसी दिन उन्होंने अपने जिगरी दोस्त शंकरदास केसरीलाल राव अर्थात़् गीतकार शैलेन्द्र को खो दिया।

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किसी के निजी दुर्भाग्य की कल्पना करना नामुमकिन होता है, और अगर उस शख्स ने अपने जिगरी दोस्त को अपने ही जन्मदिन के दिन खोया हो तो उस दर्द की पराकाष्ठा हो चुकी होती है। मैं स्वयं इस कटु अनुभव से ज़िन्दगी में दो बार गुज़र चुका हूं और सिर्फ कल्पना ही कर सकता हूं कि राजकपूर पर क्या गुज़री होगी। 

गोल्ड फ्लेक नाम की सिगरेट का डब्बा लेकर चलने वाले शैलेन्द्र सिर्फ 43 साल की उम्र में हिंदी फिल्म के गीतों के गाड़ीवान की तरह दूर क्षितिज में खो गए।बचपन से देखे अभाव, जवानी में संघर्ष, और मित्रों के धोखे से आहत शैलेन्द्र ने अपनी बनार्इ हुई फिल्म "तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफाम" की असफलता की वजह से बेतहाशा शराब पीना शुरू कर दिया था और इस अवसाद का प्रभाव उनके लिवर पर पड़ा।
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आज 50 साल से ज़्यादा हो गए हैं, दो पूरी पीढ़ियों ने शैलेन्द्र को सुना भी नहीं मगर जिन्होंने सुना है वो जानते हैं कि कठिन भावनाओं को सरल भाषा में व्यक्त करना और उसे जीवन की सीख के रूप में गीत की शक्ल देना, सिर्फ और सिर्फ शैलेन्द्र के बस की बात थी। 

शैलेन्द्र ने बचपन से अभाव देखे थे। रावलपिंडी में पैदा हुए थे क्योंकि दादाजी और पिताजी वहां रेलवे में कांट्रेक्टर थे। मंदिर में भजन गाना शैलेन्द्र ने वहां सीखा। फिर बुरे दिन शुरू हुए तो सपरिवार मथुरा आ गए। पढ़ाई शुरू की, गीत और भजन लिखने का शौक़ परवान चढ़ा।

भगवान को मानने वाले शैलेन्द्र ने अपने सामने अपनी मां और बहन को असमय बीमारी की वजह से काल का ग्रास बनते देखा। इन घटनाओं ने शैलेन्द्र को भगवान से दूर कर दिया और मथुरा में रहते हुए भी वो ईश्वर से नाराज़ रहने लगे। जन्म से शैलेन्द्र की जाति अनुसूचित थी। एक दिन वो हॉकी खेल रहे थे तो किसी ऊंची जाति के व्यक्ति ने ताना मारा - अब ये भी हॉकी खेलेंगे। गुस्सैल शैलेन्द्र ने अपनी हॉकी स्टिक तोड़ दी और फिर कभी हॉकी को हाथ नहीं लगाया। 

समाज की इस वर्ण व्यवस्था से दुखी शैलेन्द्र मुंबई आ गए, माटुंगा रेलवे यार्ड में मेंटेनेंस का काम करने लगे। - फोटो : File Photo
समाज की इस वर्ण व्यवस्था से दुखी शैलेन्द्र मुंबई आ गए, माटुंगा रेलवे यार्ड में मेंटेनेंस का काम करने लगे। मगर समय के पहिये ने कविता को छूटने नहीं दिया। खाली समय में कविता लिखते रहते और शाम को प्रगतिशील लेखकों की संस्था में जाकर अपनी कविता सुनाते।

विभाजन की त्रासदी से आहत शैलेन्द्र की कविता "जलता है पंजाब" ने युवा फिल्मकार राज कपूर पर बड़ा प्रभाव डाला। वो शैलेंद्र के पास पहुंच गए और उनसे कहा कि वो पृथ्वीराज कपूर के बेटे हैं और फिल्म बना रहे हैं "आह"। क्या शैलेन्द्र अपनी कविता उन्हें बेचेंगे। तल्ख़ शैलेन्द्र ने दो टूक जवाब दिया कि मेरी कविता बेचने के लिए नहीं हैं"। राजकपूर मुस्कुरा कर एक कागज़ पर अपना नाम पता उन्हें दे कर चले आए। 

संघर्ष जारी रहे। फिर शैलेन्द्र जी का परिवार बड़ा होने वाला था, उनके पुत्र शैली शैलेन्द्र के जन्म का समय था। पैसे थे नहीं। संघर्ष यात्री ने बहुत सोचने के बाद राजकपूर से संपर्क साधा। बिना किसी सोच के राज कपूर ने उन्हें गाने लिखने को कहा। पारिश्रमिक 500 रुपये। गाने थे - पतली कमर है तिरछी नज़र है और बरसात में हम से मिले तुम सजन। ये शुरुआत थी राजकपूर, शंकर जयकिशन, हसरत जयपुरी और शैलेन्द्र की चौकड़ी की।  

देवआनंद ने अपने भाई विजय आनंद के साथ मिल कर आरके नारायण के उपन्यास पर फिल्म बनाने की ठान ली थी। गीत लिखने का काम सौंपा गया था "हसरत जयपुरी" को। आनंद बंधुओं को गीत और संगीत की गहरी समझ थी, तो हसरत साहब के गाने उन्हें स्क्रिप्ट में कहीं खटकने लगे। ऐसे में उन्होंने एप्रोच किया हसरत जयपुरी के साथी गीतकार शैलेन्द्र को।

अभावों से भरी ज़िन्दगी में रहने वाले शैलेन्द्र को इस बात का गुस्सा आया कि वो एक रिप्लेसमेंट की तरह देखे जा रहे हैं। लेफ्टिस्ट विचारधारा से प्रेरित शैलेन्द्र ने ऐसी फीस बता दी कि कोई और होता तो भाग जाता। आनंद बंधू, मरते क्या न करते, हां कर बैठे।

शैलेन्द्र ने फणीश्वर नाथ रेणु की लघुकथा "मारे गए गुलफाम" के प्रमुख किरदार हरिया में कहीं न कहीं अपने आप को देखा। - फोटो : File Photo
यहां से शुरू हुआ इस सदी की सर्वश्रेष्ठ म्यूजिक वाली फिल्म "गाइड" का। गीतों की बानगी देखिये -
-आज फिर जीने की तमन्ना है
(पानी के मटके को तोड़ती वहीदा का खुद को आज़ाद घोषित करना)
-दिन ढल जाए
(किसी से बातें करने के लिए तरसते देव आनंद का शराब पीकर खुद से बात करना)
-गाता रहे मेरा दिल (बांके छैले देव आनंद का वहीदा के साथ परवान चढ़ता रोमांस)
-क्या से क्या हो गया (वहीदा के जाने के बाद देव आनंद के दिल की आह)
-पिया तोसे नैना लागे रे (वहीदा की बढ़ती प्रसिद्धि और देव आनंद का बढ़ता लालच)
-सैयां बेईमान (लड़ाई के बाद के छोटे छोटे उलाहने)
-तेरे मेरे सपने अब एक रंग है (सांझ के डूबते सूरज में देव और वहीदा का मासूम सा अबूझा इश्क़)
-वहां कौन है तेरा (फिल्म का टाइटल सॉन्ग जो देव आनंद की एंट्री भी बना)
-हे राम हमारे रामचंद्र (मंदिर का भजन)
-अल्लाह मेघ दे पानी दे (गाइड का क्लाइमेक्स, बारिश का आवाहन और देव आनंद की बिगड़ती तबियत)। 

शैलेन्द्र ने फणीश्वर नाथ रेणु की लघुकथा "मारे गए गुलफाम" के प्रमुख किरदार हरिया में कहीं न कहीं अपने आप को देखा। सीधा-सादा उसूलों पर चलने वाला और हर बात से सबक लेने वाला, इसलिए अपनी जमा पूंजी लगाकर उन्होंने इस पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया। हीरो के लिए मित्र राज कपूर हाज़िर किये गये।

राजकपूर एक कुशल निर्माता निर्देशक थे। कहानी सुनकर उन्होंने शैलेन्द्र को फिल्म न बनाने की सलाह दी क्योंकि इसमें व्यावसायिक सफलता की गुंजाइश नहीं दिख रही थी। शैलेन्द्र तो कसम खा के काम करते थे। राजकपूर से बहुत विवाद भी किया फिर राज कपूर ने अपने दोस्त कविराज शैलेन्द्र का मान रखा और फिल्म शुरू की। बहुत अड़चनें आईं। बहुत पैसा बहा।

दोस्तों से उधार लेकर, लम्बा चौड़ा क़र्ज़ लेकर फिल्म बनाई गई। मगर अफसोस के बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने दम तोड़ दिया। इस सपने के टूटने से शैलेन्द्र भी पूरी तरह टूट गए। स्वाभिमानी शैलेन्द्र को फिल्म इंडस्ट्री ने नकार दिया। इस दुःख में शैलेन्द्र दुनिया छोड़कर चले गए।

शैलेन्द्र के बारे में अब बहुत कम लोग जानते हैं मगर शैलेन्द्र के अंदर की पीड़ा समझने के लिए उनके गीत किसी भी जनरेशन के लिए काफी हैं। मशहूर लेखक ख्वाजा अहमद अब्बास ने एक फिल्म की कहानी राज कपूर को सुनाई थी।

राज कपूर अपने साथ शैलेन्द्र को भी ले गए थे। पूरे नैरेशन के बाद राज कपूर ने शैलेन्द्र की और देखा तो शैलेन्द्र के मुंह से बोल फूटे - या गर्दिश में हूं, आसमान का तारा हूं आवारा हूं-  ख्वाजा अहमद अब्बास भौंचक्के रह गए! 3 घंटे की कहानी का निचोड़ एक पंक्ति में! पूरे नैरेशन के समय उन्हें शैलेन्द्र की उपस्थिति का अंदाज़ा भी नहीं था मगर इस पंक्ति के बाद वो शैलेन्द्र के कायल हो गए।

शैलेन्द्र को फ़िल्मी गीतों का वो परवाना कहा जाता है जो शमा से मिलने के लिए बेताब और बेचैन रहता था। - फोटो : social media
इस समय जन्म हुआ फिल्म "आवारा" का और टाइटल सॉन्ग "आवारा हूं" का। इस फिल्म में हिंदी कविता और खड़ी बोली के गीत की प्रस्तुति देखिए; दम भर जो उधर मुंह फेरे, ओ चंदा, मैं उनसे प्यार कर लूंगी।

पारसी थिएटर और उर्दू; पंजाबी के बड़े बड़े शायरों से सजी हिंदी फिल्म इंडस्ट्री में प्रेम के माधुर्य और शर्म का इतना बढ़िया उदहारण न पहले कभी आया न बाद में। विरह में त्रस्त नायिका का क्रन्दन "तेरे बिना आग ये चांदनी, तू आ जा" या फिर मिस्र की मशहूर गायिका उम् कुलसुम के गाने "अल बलादी एलमेह्बूब" की धुन पर शंकर जयकिशन का ऑर्केस्ट्रा से सुसज्जित गाना "घर आया मेरा परदेसी"। 

शैलेन्द्र को फ़िल्मी गीतों का वो परवाना कहा जाता है जो शमा से मिलने के लिए बेताब और बेचैन रहता था। और इसलिए बहुत जल्दी ख़ाक में मिल गया। टूटे हुए सपने आवाज़ नहीं करते, मगर शैलेन्द्र ने अपनी ज़िन्दगी के हर ग़म को अमर गीतों का लिबास पहनाया। दिल के अनछुए कोने में, कोई एक दर्द की किरच लगी थी, उस घाव को हर बार कुरेद कर अपनी आह को लोगों तक पहुँचाने की कोशिश शैलेन्द्र ने की।

हिंदी जुबां में तल्खी देखिये। उस भोले शख्स की बेचारगी देखिये। एक सुन्दर, सभ्य और समान समाज की कल्पना  शैलेन्द्र ने लिख कर एक यूटोपियन दुनिया की जो कल्पना की थी, उन गीतों के विषयों की रेंज देखिये। 

-ऐ मेरे दिल कहीं और चल, ग़म की दुनिया से दिल भर गया, ढूंढ ले अब कोई घर नया - फिल्म दाग 
-छोटी सी ये ज़िंदगानी रे, चार दिन की कहानी तेरी। - फिल्म आह
-नन्हे  मुन्ने बच्चे, तेरी मुट्ठी में क्या है - फिल्म बूट पालिश
-अंधे जहां के अंधे रास्ते, जाए तो जाए कहां - फिल्म पतिता
-कहाँ जा रहा है तू ऐ जाने वाले - फिल्म सीमा
-मेरा जूता है जापानी, पतलून इंग्लिशस्तानी - फिल्म श्री 420 
-सुर न सजे क्या गाऊं मैं - बसंत बहार
-आजा के इंतज़ार में - फिल्म हलाकू
-अरे भाई निकल के आ घर से - फिल्म न्यू डेल्ही
-ये मेरा दीवानापन है - फिल्म यहूदी
-सब कुछ सीखा हमने न सीखी होशियारी - फिल्म अनाड़ी
-अब कहां जाए हम - फिल्म उजाला 

ऐसे ही कुल 900 से ज़्यादा गाने लिखे शैलेन्द्र ने, जिसमें से शंकर जयकिशन के साथ करीब 400 गाने बनाये। संगीत की समझ और कविता पर पकड़ की वजह से इनकी जोड़ी बहुत मक़बूल रही। 

एक सुन्दर लड़की को संगीतकार शंकर बार-बार मुड़ के देख रहे थे और गाड़ी में बैठे शैलेन्द्र ने कहा - मुड़ मुड़ के न देख मुड़ मुड़ के। चलते-चलते सहजता के साथ एक बड़ी ही भोली सी सिचुएशन पर ऐसा मस्ती भरा गीत लिखने वाले शैलेन्द्र को गुलज़ार साहब अपना अघोषित गुरु समझते हैं।

शैलेन्द्र, डायरेक्टर बिमल रॉय के साथ काम करते थे। किसी बात पर अनबन हो गर्इ, क्योंकि शैलेन्द्र सच पसंद व्यक्ति थे और साफ़ बेलाग बात करते थे। तब गुलज़ार गोष्ठियों में कविता सुनाया करते थे। शैलेन्द्र को उनकी कविताएं पसंद थी। उन्होंने कहा कि जाओ बिमल रॉय से मिल लो।

गुलज़ार की बेबाकी देखिए उन्होंने कहा कि वो नहीं जाएंगे। शैलेन्द्र ने फटकार लगाई और कहा की फिल्मों में सिर्फ गंवार नहीं होते, कुछ पढ़े लिखे लोग भी होते हैं। बिमल रॉय किसी को यूं ही काम नहीं देते, तुम्हें मिल रहा है तो जाओ वहां। ऑर्डर पारित हुआ तो गुलज़ार साहब ना ना करते हुए भी हां कर आए।

बहरहाल, लब्बो-लुआब किस्सा कोताह यूं है कि इसके साथ पदार्पण हुआ लिरिसिस्ट गुलज़ार का - मोरा गोरा अंग लई ले । फिल्म थी बंदिनी और म्यूजिक डायरेक्टर थे दादा बर्मन।  
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दोस्ती और प्यार के हाथों बिकनेवाले इस भोले इंसान के साथ किस्मत ने हमेशा अच्छा नहीं किया। - फोटो : SELF
शैलेन्द्र के मन में अहंकार नहीं था। दोस्ती और प्यार के हाथों बिकनेवाले इस भोले इंसान के साथ किस्मत ने हमेशा अच्छा नहीं किया। मगर उनके मुरीद और उनका काम हमेशा उन्हें पहचान दिला ही लाया। 1964 का फिल्म फेयर अवार्ड साहिर लुधियानवी साहब को मिला था फिल्म "जो वादा किया वो निभाना पड़ेगा" (ताज महल) के लिए। स्टेज पर साहिर साहब ने शैलेन्द्र साहब को बुलाया और सबके सामने घोषणा की कि ये अवार्ड शैलेन्द्र को मिलना चाहिए "मत रो माता" (बंदिनी) के लिए जो कि अब तक लिखे गए देशप्रेम के गीतों में सर्वश्रेष्ठ है। सकुचाये और शर्माए शैलेन्द्र की कला का ये असली सम्मान है। 

बिमल रॉय की कालजयी फिल्म "दो बीघा ज़मीन" जिसने कान्स अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिवल और कार्लोवी वैरी फिल्म फेस्टिवल में सामाजिक विषय पर बानी सर्वश्रेष्ठ फिल्म का खिताब जीता था। भैरवी के अलाप से शुरू होने वाले एक गीत में, जिसकी धुन "रेड आर्मी" के मार्च संगीत पर आधारित थी, शैलेन्द्र ने ज़िन्दगी के हर अच्छे बुरे अनुभव का निचोड़ लिख दिया था।

वैसे शैलेन्द्र के कई गाने ऐसे हैं जिन्होंने हिंदी फिल्म में गीतों को सर्वोच्च स्थान दिलाया मगर, ये गीत शैलेन्द्र की ऐसी परिभाषा है, जिसको समझने के लिए उनके कोमल मन की परतों को खोलना पड़ेगा। इस गाने में एक लाइन है "मौसम बीता जाए"। जब ये गीत शूट हो रहा था तो बिमल रॉय ने गांव के लोगों को भी शूट में शामिल कर लिया था।

भोले गांव वाले इस लाइन को सुनकर "मौसम बीता जाए" को "मौसम्बी ताज़ा" समझते थे और सोचते थे की गाने की शूटिंग के बाद उन्हें मौसम्बी मिलेगी। यहां भी दर्द रहा, और यहां भी एक हंसी छुपी रही। 

अपनी कहानी छोड़ जा 
कुछ तो निशानी छोड़ जा 
कौन कहे इस ओर 
तू फिर आये न आए
मौसम बीता जाए।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें। 
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