समाज की मानसिकता में सफलता का मानक तय है मगर असफलता का नहीं।
- फोटो : Amar Ujala, Mumbai
असफलता को गले क्यों नहीं लगाता समाज?
उन्हें जीवन से अधिक आत्महत्या सरल लगती है। क्योंकि समाज ने सफलता को स्वीकार किया उसका स्वागत किया, उसे गले लगाया। उसे सेलिब्रेट करने के बहुत से उपक्रम बनाये मगर वहीं एक असफल व्यक्ति के लिए सिवाय खमोशी के कुछ नहीं दिया। न स्वागत हुआ न गले लगाया गया।
न उसके संघर्ष को सराहा गया। यही वो कमज़ोर कड़ी थी जिसने आत्महत्या की स्थितियों को उत्पन्न किया। ‘छिछोरे’ फिल्म सफलता और असफलता के बीच जूझते आत्महत्या करते युवाओं की कहानी है। असफलता और सफलता के बीच सिर्फ वर्ण का अंतर है। लेकिन इन दोनों के बीच की दूरी और उसे तय करने का लंबा संघर्ष होता है।
अक्सर सफलता और असफलता तो तुरन्त आंकलित हो जाती है पर उसी कार्यवाहक संघर्ष कहीं पीछे धकेल दिया जाता है और दुनिया इसी असफल और सफल के मध्य घूमती रह जाती है। सफलता में आदमी सराहा जाता है और असफलता में व्यक्ति, समूह विशेष धिक्कारा जाता है। समाज की मानसिकता में सफलता का मानक तय है मगर असफलता का नहीं। ताज़ा तरीन घटना में चंद्रयान-2 का सफल रूप से अपने लक्ष्य से चुकना। पूरी ‘इसरो’ टीम पर ही प्रश्न खड़ा कर देता है क्योंकि वह असफल हुए। मगर उनकी असफलता को भी सफलता की ओर एक कदम के रूप में सराहा जा सकता है।
इसी तरह जिंदगी भी है जो हर क्षेत्र में हमें सफलता नहीं देती वो संघर्ष देती है।
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जिंदगी हर क्षेत्र में सफलता ही नहीं, संघर्ष भी देती है
इसी तरह जिंदगी भी है जो हर क्षेत्र में हमें सफलता नहीं देती वो संघर्ष देती है। असफलता का पाठ देती है ताकि इसके जरिए जिंदगी को बेहतर तरीके से जिया जा सके। सफलता रिजल्ट पर नहीं उसके लिए की गई कोशिश पर निर्भर करती है। इसी असफलता और सफलता के बीच के संघर्ष को बहुत ही खूबसूरती के साथ ‘छिछोरे’ फिल्म सुशांत राजपूत (अन्नी उफ़ अनिरुद्ध), श्रद्धा कपूर (माया), वरुण शर्मा (सेक्सा), प्रतीक बब्बर (रागी), ताहिर राज भसीन (डेरिक), नवीन पॉलीशेट्टी (एसिड), सहर्ष कुमार शुक्ला (बेवड़ा) तुषार पांडे (मम्मी), नललीश (पंडू), मोहम्मद समद (बेटा) सभी पात्रों के साथ उभारती है।
हॉस्टल एच4 के रहवासी 9 दोस्त जिन्होंने लूजर होकर भी जिंदगी को बहुत ही खूबसूरती के साथ जिया। मगर उन्हीं की अगली पीढ़ी सफलता के दबाव में असफल होने से डरती है और आत्महत्या कर लेती है। ये पीढ़ी बचपन से स्कूल से कॉलेज तक के सफर के लिए अच्छे नम्बरों से पास होना, अच्छी रैंकिंग लाना ताकि अच्छा कॉलेज मिल सके।
समाज ‘फेलियर’ का टेग न लगा दे। इस डर से बचने के लिए माता-पिता, बच्चों पर अतिरिक्त दबाव बनाते हैं। माता-पिता का दबाव उनके सामाजिक परिवेश से उत्पन्न दबाव है जिसने सफलता को सेलेब्रेट किया मगर असफलता में उसे ही दोषी बना दिया। यही दबाव व्यक्ति में जीवन से अधिक आत्महत्या को सहज स्वीकार करने की मानसिकता का निर्माण करता है। क्योंकि आज की भाग-दौड़ की जिंदगी में सफल व्यक्ति की सराहा जाता है असफल और संघर्षरत व्यक्ति नहीं। आज के युवाओं में रिजल्ट का यही डर उन्हें आत्महत्या के लिए मजबूर करता है। रिजल्ट केवल परीक्षाओं का नहीं जीवन के उतार-चढ़ाव का भी है। इसी ने 10 सितंबर को ‘आत्महत्या रोकथाम दिवस’ के लिए मनाए जाने पर मजबूर कर दिया। इसलिए समाज को चाहिए कि जिस तरह से सफलता को सेलिब्रेट किया जाता है, उसी तरह से अफलता का भी उत्सव हो ताकि आत्महत्या की जगह युवा जीवन को चुने।
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