दिलीप साहब और अमित जी दोनों ही बहुत बड़े कलाकार हैं, इससे भी बढ़कर बहुत ही अच्छे इंसान।
- फोटो : फाइल फोटो
खैर, उस दिन पिता और पुत्र के बीच का वह सीन फिल्माया जाना था जिसमें दिलीप साहब और बच्चन जी आमने-सामने होते हैं और दोनों के बीच बहुत ही तनाव पूर्ण संवाद चल रहा होता है। तभी अचानक से दिलीप साहब रुक जाते हैं और अमिताभ बच्चन से बड़े प्यार से पूछते हैं- आपने मेरी फिल्म मुगल-ए-आजम देखी है , इस पर बच्चन साहब कहते हैं- एक बार नहीं बल्कि कई बार देखी है। बच्चन जी पूरी विनम्रता से बोले।
इतना सुनते ही दिलीप साहब प्यार से बोले- आपने गौर किया होगा कि अकबर और सलीम के बीच संवाद के दौरान सलीम ने अपने पिता अकबर से कभी उनकी आंख से आंख मिला कर बात नहीं की।
मैं उम्मीद करता हूं कि आज इस सीन में भी हम लोग इस बात का ख्याल रखेंगे। बेटा कितना भी गुस्ताख क्यों ना हो जाए, बाप की नजर से नजर मिला कर कभी बात नहीं करता। यही हमारी तहज़ीब है।
दिलीप साहब और अमित जी दोनों ही बहुत बड़े कलाकार हैं, इससे भी बढ़कर बहुत ही अच्छे इंसान- दोनों के सफलता के शीर्ष पर पहुंचने पर भी अंत तक उनके सीखने के जज़्बे को सलाम। फिल्म शक्ति में भी दिलीप साहब अपने पुलिस कमिश्नर के किरदार को और बेहतर तरीके से अदा करने के लिए पुलिस कर्मियों की जिंदगी से जुडी किताबों का शूटिंग के दरमियान तक अध्ययन करते नज़र आते हैं और बच्चन जी का भी अपने सीनियर के प्रति सम्मान, उनसे सीखने की जिज्ञासा-दोनों ही लाजवाब हैं!
फिल्म मुगले-ए-आज़म के एक बहुत ही मशहूर डायलॉग की एक पंक्ति याद आ रही है, जहां पर बादशाह अकबर सलीम से नराज हो कर अपने सिपाहियों को हुक्म देते हैं
‘सलीम की बढ़ती हुई गुस्ताखियों को क़ैद कर लिया जाए।‘ आज ऐसा लग रहा जैसे सलीम यानी दिलीप कुमार उस क़ैद से आज़ाद हो गए। पर हम सब उनके, अपने बीच न रहने पर सोगवार हैं, शायद ऐसी ही बड़ी शख्सियतों के बारे में इक़बाल ने कहा है -
हज़ारों साल नरगिस अपनी बे-नूरी पे रोती है
बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।