राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥
इसका मतलब साफ है कि दुनिया में ऐसा कोई कठिन काम नहीं है, जो तुमसे न हो सके और खासकर राम के किसी भी काम को करने के लिए ही तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान पर्वताकार हो गए।
दरअसल प्रधानमंत्री मोदी कोई बात यूं ही नहीं कहते। उन्होंने हनुमान जयंती के बहाने पार्टी के हर कार्यकर्ता को हनुमान बनने का हौसला दिया। यानी, राम की हर आज्ञा या हर इच्छा पूरी करने का संकल्प लेने वाले हनुमान बनने की नसीहत दी। जाहिर है आज के इस कलयुगी सियासी दौर में भी राम तो एक ही होगा, बेशक हनुमान या उनकी वानर सेना अपने विशाल और वृहद रूप में नज़र आनी चाहिए, जो अपने प्रभु के इशारे समझे और उसे पूरा करने के लिए कुछ भी कर गुज़रने को तैयार रहे।
दरअसल हमारे पौराणिक पात्र बहुत मायने रखते हैं। तुलसीदास ने जब रामचरित मानस की रचना की, तब भी उन्होंने इसके हर दोहे, चौपाई, सोरठा या छंद के जरिये ये बात बताने की कोशिश की कि राम तो मर्यादा पुरुषोत्तम थे ही, लेकिन वो जैसे-जैसे बढ़ते गए, उनका कारवां बनता गया। और अगर पवनपुत्र हनुमान न होते, तो शायद राम को भी आज मौजूदा स्वरूप में न माना जाता। यानी राम और हनुमान की परिकल्पना एक दूसरे के बगैर नहीं की जा सकती।
वैसे देखें तो किसी भी पार्टी के लिए उसके कार्यकर्ता ही सबसे बड़ी ताकत होते हैं। आप अपनी रणनीति बनाते रहिए, अगर आपके पास कार्यकर्ताओं की ताकत नहीं है, तो आप उसे मजबूती से लागू भी नहीं कर सकते। भाजपा इन 43 सालों में अपनी इसी ताकत के साथ बढ़ती चली गई है और दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी का दर्जा हासिल कर लिया। अबतक 18 करोड़ सदस्यों वाली भाजपा के मुकाबले कांग्रेस के सदस्यों की संख्या दो करोड़ से भी कम है। 1980 में बेशक भाजपा बनी हो, लेकिन इससे पहले भारतीय जनसंघ ने और साथ ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के अलग-अलग संगठनों ने अपना जनाधार तैयार कर रखा था। बेशक राम मंदिर आंदोलन और लालकृष्ण आडवाणी की 1990 की रथयात्रा के बाद माहौल और बना और अयोध्या आंदोलन ने भाजपा को इतना मजबूत बना दिया। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आते आते भाजपा के सदस्यों की संख्या करीब दो करोड़ पार कर चुकी थी और मोदी सरकार आने से पहले यह छह करोड़ तक पहुंच गई थी। लेकिन पिछले नौ सालों में पार्टी ने जबरदस्त विस्तार किया और सदस्य संख्या छह से 18 करोड़ तक पहुंच गई, यानी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी से भी दोगुनी।
लेकिन कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि भाजपा के जबरदस्त विस्तार की वजह खुद कांग्रेस के भीतर की कमजोरियां रही हैं, साथ ही कांग्रेस और भाजपा विरोध के नाम पर तीसरे मोर्चे जैसी ताकतों का सामने आना, गठबंधन की राजनीति और सत्ता के लिए बेमेल तालमेल का खेल का भी भाजपा ने फायदा उठाया है। बावजूद इसके अब भी कांग्रेस के तमाम नेता मानते हैं कि बेशक भाजपा संख्या के लिहाज़ से दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बन जाए, लेकिन जिस विचारधारा और हिंदू कट्टरवाद को लेकर वह आगे बढ़ती है वह इस देश की साझी संस्कृति को शायद बहुत दिनों तक कबूल नहीं होगा।
वहीं कम्युनिस्ट और समाजवादी खेमे के नेताओं का कहना है कि देश की जनता को बेशक लग रहा हो कि विकल्प का अभाव है या मोदी जैसा मजबूत नेतृत्व कोई और नहीं दे सकता, लेकिन जो उसकी रोजमर्रा की मुश्किलें हैं, महंगाई है, बेरोज़गारी है और सबसे बड़ी बात नफरत और असुरक्षा का माहौल है, उसे लेकर भीतर ही भीतर असंतोष की चिंगारी तो सुलग ही रही है। कांग्रेस समेत इन तमाम पार्टियों को अब भी लगता है कि 2024 में कुछ कमाल हो सकता है। वह तो यह भी मानते हैं कि कर्नाटक से ही इस बदलाव की शुरुआत हो जाएगी।
जमीनी हकीकत पर गौर करें, तो फिलहाल ऐसा होता नहीं दिख रहा। यह बात कांग्रेस के साथ कम्युनिस्ट और समाजवादी पार्टी के नेता भी दबी जुबान से स्वीकारते हैं लेकिन यह बात वह खुल कर नहीं कर सकते।
भाजपा के स्थापना दिवस पर मोदी ने जिस तरह के संदेश दिए और जो संकेत दिए हैं, उसके खास मायने हैं। खासकर तब जब पूरा देश हनुमान जयंती के रंग में रंगा है और हर ऐसे उत्सव और शोभायात्राओं के अपने सियासी मायने होते हों। अब सबकी निगाह भाजपा के राम और हनुमान पर है कि देखें ये 2024 में क्या गुल खिलाते हैं।