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राज्यसभा में भाजपा का विस्तार: इस्तीफों और दल-बदल की 12 साल की कहानी

सार

2014 से 2026 के बीच भाजपा ने राज्यसभा में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए चुनावी जीत के साथ-साथ संसदीय रणनीति और संवैधानिक प्रावधानों का भी प्रभावी उपयोग किया। इस्तीफों के जरिए विपक्षी नेताओं को अपने साथ जोड़ना और दो-तिहाई वाले विलय प्रावधान का इस्तेमाल- इन दोनों रणनीतियों ने उच्च सदन के शक्ति-संतुलन को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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राज्यसभा की कार्यवाही (फाइल फोटो) - फोटो : ANI
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विस्तार
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2014 में केंद्र में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने के बावजूद भाजपा के सामने सबसे बड़ी संसदीय चुनौती राज्यसभा थी। लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद उच्च सदन में पर्याप्त संख्या नहीं होने के कारण कई महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए उसे विपक्ष या अन्य दलों के सहयोग की आवश्यकता पड़ती थी। 

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यही कारण था कि पिछले बारह वर्षों में भाजपा ने राज्यसभा में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए केवल राज्यों में चुनाव जीतने पर ही भरोसा नहीं किया, बल्कि राजनीतिक और संसदीय स्तर पर समानांतर रणनीतियां भी अपनाईं।

इन रणनीतियों में दो तरीके प्रमुख रहे।
 

  • पहला, विपक्षी दलों के प्रभावशाली नेताओं को पहले राज्यसभा और अपनी पार्टी से इस्तीफा दिलाकर भाजपा में शामिल कराना तथा बाद में उन्हें पुनः राज्यसभा भेजना।
  • दूसरा, संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 4 में निहित दो-तिहाई सदस्यों के 'विलय' संबंधी प्रावधान का उपयोग कर बिना इस्तीफा दिए संसदीय दल का भाजपा में विलय कराना।

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इन दोनों तरीकों ने मिलकर राज्यसभा के शक्ति-संतुलन को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

इस्तीफे के बाद भाजपा में नई पारी

इस रणनीति की शुरुआत उन नेताओं से हुई, जिन्होंने अपनी पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता छोड़ने के बाद भाजपा का दामन थामा। 2019 में सपा के नीरज शेखर, सुरेंद्र सिंह नागर और संजय सेठ ने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा की सदस्यता ग्रहण की। बाद में तीनों भाजपा के उम्मीदवार के रूप में फिर राज्यसभा पहुंचे। 

इसी वर्ष कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भुवनेश्वर कलिता ने अनुच्छेद 370 के मुद्दे पर पार्टी से मतभेद के बाद इस्तीफा दिया और बाद में भाजपा की ओर से राज्यसभा पहुंचे। इसके बाद यह सिलसिला अन्य राज्यों तक पहुंचा। 2024 में बीजू जनता दल की ममता महंता और सुजीत कुमार ने राज्यसभा की सदस्यता छोड़कर भाजपा का दामन थामा और बाद में भाजपा के उम्मीदवार बने। आंध्र प्रदेश से वाईएसआर कांग्रेस के आर कृष्णैया ने भी यही रास्ता अपनाया।

2026 में पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा बदलाव देखने को मिला, जब टीएमसी के सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देब और प्रकाश चिक बराइक ने पार्टी और राज्यसभा सदस्यता से इस्तीफा देकर भाजपा की सदस्यता ग्रहण की तथा बाद में भाजपा के टिकट पर फिर राज्यसभा पहुंचे।

इस तरह 2014 से 2026 के बीच ऐसे दस प्रमुख राज्यसभा सांसद रहे, जिन्होंने पहले इस्तीफा दिया और फिर भाजपा के प्रतिनिधि के रूप में उच्च सदन में वापसी की।

टीडीपी मॉडल: बिना इस्तीफे दल-बदल का रास्ता

भाजपा के राज्यसभा विस्तार की कहानी केवल इस्तीफों तक सीमित नहीं रही। 2019 में पहली बार दल-बदल कानून की दसवीं अनुसूची के पैरा 4 में निहित 'विलय' प्रावधान राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में आया।

टीडीपी के छह राज्यसभा सांसदों में से वाईएस चौधरी (सुजाना चौधरी), सीएम रमेश, टीजी वेंकटेश और जी मोहन राव एक साथ भाजपा में शामिल हो गए। चूंकि यह संख्या संसदीय दल के दो-तिहाई से अधिक थी, इसलिए उनके विलय को संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप स्वीकार किया गया और उनकी राज्यसभा सदस्यता बनी रही।

इस घटनाक्रम ने स्पष्ट किया कि यदि किसी संसदीय दल के दो-तिहाई सदस्य सामूहिक रूप से विलय का निर्णय लेते हैं और उसे संबंधित संवैधानिक प्राधिकारी स्वीकार कर लेता है, तो बिना इस्तीफा दिए भी दूसरे दल में जाने का रास्ता खुल सकता है। भाजपा ने इसे संविधान सम्मत प्रक्रिया बताया, जबकि विपक्ष ने इसे दल-बदल विरोधी कानून की मूल भावना के विपरीत करार दिया।

2026 : आम आदमी पार्टी में सबसे बड़ी सेंध

2026 में राज्यसभा की राजनीति ने एक और बड़ा मोड़ लिया। आप के राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक कुमार मित्तल, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राजिंदर गुप्ता और विक्रमजीत सिंह साहनी सहित सात राज्यसभा सांसदों ने भाजपा में विलय का दावा किया। संसदीय दल में दो-तिहाई से अधिक सदस्यों के समर्थन के आधार पर इस विलय को स्वीकार किए जाने के बाद राज्यसभा में भाजपा की स्थिति और मजबूत हो गई।

इस घटनाक्रम ने राजनीतिक और संवैधानिक बहस को भी नई दिशा दी। आप ने इसे मतदाताओं के जनादेश के साथ विश्वासघात बताया, जबकि भाजपा ने इसे संविधान के अनुरूप सांसदों का वैधानिक और लोकतांत्रिक निर्णय बताया। संवैधानिक विशेषज्ञों के बीच भी यह प्रश्न उठा कि क्या केवल संसदीय दल का विलय पर्याप्त है या मूल राजनीतिक दल का विलय भी आवश्यक होना चाहिए। इस पर अलग-अलग कानूनी व्याख्याएं सामने आईं।

दो समानांतर रणनीतियों का असर

2014 से 2026 के बीच भाजपा ने राज्यसभा में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए दो समानांतर रणनीतियों पर काम किया। पहली, विपक्षी दलों के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ना। नीरज शेखर, सुरेंद्र सिंह नागर, संजय सेठ, भुवनेश्वर कलिता, ममता महंता, सुजीत कुमार, आर. कृष्णैया, सुखेंदु शेखर रॉय, सुष्मिता देब और प्रकाश चिक बराइक ने इस्तीफे के बाद भाजपा का दामन थामा और फिर राज्यसभा पहुंचे।

दूसरी रणनीति थी दसवीं अनुसूची के पैरा 4 के तहत दो-तिहाई सदस्यों के 'विलय' प्रावधान का उपयोग। पहले वाईएस चौधरी (सुजाना चौधरी), सीएम रमेश, टीजी वेंकटेश और जी मोहन राव के साथ टीडीपी का मामला सामने आया और बाद में राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक कुमार मित्तल, हरभजन सिंह, स्वाति मालीवाल, राजिंदर गुप्ता और विक्रमजीत सिंह साहनी के साथ आम आदमी पार्टी का। इन दोनों घटनाक्रमों ने दिखाया कि संसदीय दलों के भीतर होने वाला पुनर्संरेखण भी अब राज्यसभा के शक्ति-संतुलन को बदल सकता है।

राज्यसभा की बदलती राजनीति

2014 के बाद राज्यसभा का चरित्र भी बदला है। पहले इसे मुख्यतः राज्यों की विधानसभाओं के चुनावी गणित का परिणाम माना जाता था, लेकिन अब राजनीतिक पुनर्संरेखण भी उतना ही महत्वपूर्ण कारक बन गया है। प्रभावशाली सांसदों को अपने पक्ष में करना, क्षेत्रीय दलों में राजनीतिक सेंध लगाना और संसदीय दलों के भीतर समर्थन जुटाना भी उच्च सदन के अंकगणित को बदलने का माध्यम बन गया।

लोकसभा में बहुमत होने के बावजूद भाजपा के लिए राज्यसभा में मजबूत स्थिति बनाना आवश्यक था, क्योंकि आर्थिक सुधारों, कर व्यवस्था, श्रम सुधारों और अन्य महत्वपूर्ण विधेयकों के लिए उच्च सदन की मंजूरी भी जरूरी होती है। इसी कारण चुनावी विस्तार के साथ-साथ संसदीय रणनीति भी पार्टी की प्राथमिकता बनी।

इन घटनाक्रमों ने विपक्षी दलों के सामने भी नई चुनौती खड़ी की। सपा, कांग्रेस, बीजद, वाईएसआर कांग्रेस, टीएमसी, टीडीपी और आप—सभी को अलग-अलग समय पर अपने राज्यसभा सांसदों के जाने का सामना करना पड़ा। कई नेताओं ने इसे वैचारिक निर्णय बताया, जबकि विपक्ष ने सत्ता के आकर्षण और राजनीतिक दबाव का परिणाम माना।

दो-तिहाई का नियम और आगे की राह

इन घटनाओं ने संविधान की दसवीं अनुसूची के पैरा 4 की व्याख्या पर भी नई बहस छेड़ दी। इस्तीफा देकर दूसरी पार्टी में जाना अपेक्षाकृत स्पष्ट प्रक्रिया है, लेकिन दो-तिहाई सांसदों के आधार पर संसदीय दल के विलय का प्रावधान लगातार चर्चा का विषय बना हुआ है।

टीडीपी और आप के मामलों ने यह संकेत दिया कि जब किसी संसदीय दल के दो-तिहाई सदस्य विलय का दावा करते हैं और उसे स्वीकार कर लिया जाता है, तो यही संवैधानिक व्यवस्था भविष्य के समान मामलों पर भी लागू होगी। जब तक संसद दसवीं अनुसूची में संशोधन नहीं करती या न्यायपालिका इसकी नई व्याख्या नहीं करती, तब तक दो-तिहाई का यह प्रावधान भारतीय संसदीय राजनीति का वैध आधार बना रहेगा।

निष्कर्ष : संख्या से आगे की राजनीति

2014 से 2026 के बीच भाजपा ने राज्यसभा में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए चुनावी जीत के साथ-साथ संसदीय रणनीति और संवैधानिक प्रावधानों का भी प्रभावी उपयोग किया। इस्तीफों के जरिए विपक्षी नेताओं को अपने साथ जोड़ना और दो-तिहाई वाले विलय प्रावधान का इस्तेमाल—इन दोनों रणनीतियों ने उच्च सदन के शक्ति-संतुलन को बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

यह दौर यह भी बताता है कि राज्यसभा अब केवल विधानसभा चुनावों का प्रतिबिंब नहीं रह गई है। राजनीतिक पुनर्संरेखण, दलों के भीतर बदलते समीकरण और संसदीय प्रबंधन भी अब उतने ही निर्णायक हो चुके हैं। आने वाले वर्षों में यदि दल-बदल कानून में संशोधन नहीं होता या उसकी न्यायिक व्याख्या नहीं बदलती, तो दो-तिहाई का संवैधानिक प्रावधान भविष्य की राज्यसभा राजनीति को भी इसी तरह प्रभावित करता रहेगा।


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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