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रहस्यमय रात्रिचर: सुपेगांव देवराई के पवित्र वन में दिखे दुर्लभ नाइटजार !

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नाइटजार पक्षी - फोटो : प्रदीप नामदेव चोगले
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महाराष्ट्र के रायगढ़ जिले में स्थित, फणसाड वन्यजीव अभयारण्य, जैव विविधता से भरपूर एक ऐसा हरा-भरा स्वर्ग है जो कभी जंजिरा के सिद्दी नवाब का निजी शिकारगाह हुआ करता था। आज यह संरक्षित क्षेत्र तेंदुओं, विशालकाय गिलहरियों और कई दुर्लभ पक्षियों व तितलियों का सुरक्षित आश्रयस्थल बन चुका है।

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इस अभयारण्य की खासियत है इसका अनूठा पर्यावास- तटीय वन, घास के मैदान और अर्ध-सदाबहार जंगलों का मनोरम मिश्रण। पश्चिमी घाट की इस अनमोल जैव विविधता को नजदीक से देखने के लिए प्रकृति प्रेमियों, बर्डवाचर्स और शोधकर्ताओं का यहां जमावड़ा लगा रहता है।

ऐसे ही एक शोध अभियान के दौरान, जब मैं फणसाड के जंगलों में पक्षियों की गिनती में व्यस्त था, तब मेरा ध्यान इसके निकट स्थित एक और प्राकृतिक चमत्कार की ओर गया, सुपेगांव देवराई का पवित्र वन। यहां की शामें जैसे किसी जादुई दुनिया का दरवाजा खोल देती हैं!
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महाराष्ट्र की हरित विरासत के रूप में फैले 1,000 से अधिक देवराई (पवित्र वन) प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत संगम प्रस्तुत करते हैं। कोंकण के रत्नागिरी, रायगढ़ और सिंधुदुर्ग से लेकर विदर्भ तक फैले इन पवित्र वनों को स्थानीय भाषा में 'देवराई', 'पवित्र वन' या 'जंघा' जैसे श्रद्धापूर्ण नामों से जाना जाता है।

ये ग्रोव्स न सिर्फ वाघोबा (टाइगर गॉड) जैसी पौराणिक मान्यताओं से जुड़े हैं, बल्कि फणसाड के निकट सुपेगांव देवराई जैसे क्षेत्रों में दुर्लभ नाइटजार प्रजातियों और औषधीय पौधों का आश्रयस्थल भी हैं।

एक रोमांचक प्रकृति-अनुभव के रूप में, फणसाड वन्यजीव अभयारण्य के निकट स्थित सुपेगांव देवराई के इस पवित्र वन में मुझे दो दुर्लभ नाइटजार प्रजातियों को देखने का अवसर मिला! स्थानीय समुदाय द्वारा संरक्षित यह पवित्र स्थल, जो रायगड के मुरुड-जंजिरा क्षेत्र में नंदगांव तट के समीप स्थित है, प्रकृति प्रेमियों के लिए एक खजाना साबित हुआ।

जंगल नाइटजार

भारतीय वनों की रात्रि व्यवस्था में एक अनोखा संगीतकार छिपा है- जंगल नाइटजार! यह रहस्यमय पक्षी अपने 'चक-चक-चक' की मधुर आवाज़ से संध्या के समय को संगीतमय बना देता है। प्रकृति प्रेमियों के लिए इसकी आवाज़ सुनना किसी खजाने को खोजने जैसा है, क्योंकि यह पक्षी अपने उत्कृष्ट छद्मावरण के कारण देखने में बेहद मुश्किल होता है।

इसका धूसर-भूरा शरीर सूखी पत्तियों और पेड़ की छाल जैसा दिखता है, जो इसे दिन के समय शिकारियों से छुपने में मदद करता है। रात के समय यह अद्भुत शिकारी बन जाता है, जो हवा में ही मच्छरों, पतंगों और अन्य कीटों को पकड़ लेता है। 

महाराष्ट्र के सुपेगांव देवराई जैसे पवित्र वनों में इसकी मौजूदगी इन क्षेत्रों के पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करती है। यह पक्षी जमीन पर ही अंडे देता है, और नर व मादा दोनों मिलकर अंडों की देखभाल करते हैं- एक अनूठा व्यवहार! मानसून के मौसम में इसकी गतिविधियां बढ़ जाती हैं, जब यह प्रजनन के लिए अपनी मधुर आवाज का प्रयोग करता है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, यह प्रजाति महाराष्ट्र के 65% वन क्षेत्रों में पाई जाती है।

इसी पारिस्थितिकी तंत्र में जंगल नाइटजार का एक करीबी रिश्तेदार जर्डन्स नाइटजार भी पाया जाता है, जो अपने गहरे रंग और अधिक शांत स्वभाव के कारण और भी रहस्यमय बन जाता है। जहां जंगल नाइटजार अपनी आवाज़ से खुद को प्रकट कर देता है, वहीं जर्डन्स नाइटजार मौन रहकर शिकार करना पसंद करता है। इसकी आंखों में एक विशेष चमक होती है जो रात के समय प्रकाश पड़ने पर चमक उठती है।

यह प्रजाति घने सदाबहार वनों को अधिक पसंद करती है और अक्सर नम भूमि के आसपास देखी जाती है। इसके पंखों का डिज़ाइन इसे बिल्कुल निःशब्द उड़ान भरने में मदद करता है, जिससे यह शिकार को आसानी से पकड़ लेता है। प्रजनन काल में नर जर्डन्स नाइटजार के गले में सफेद पट्टी स्पष्ट दिखाई देती है, जो इसे पहचानने का एक प्रमुख लक्षण है।

महाराष्ट्र के तटीय वनों में यह प्रजाति कम संख्या में पाई जाती है, जिसके कारण इसका दर्शन एक दुर्लभ अनुभव माना जाता है। इन दोनों नाइटजार प्रजातियों का एक साथ पाया जाना किसी भी वन क्षेत्र के समृद्ध पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत देता है।

यह अनूठा सह-अस्तित्व प्रकृति के संतुलन की एक जीवंत मिसाल पेश करता है, जहां दो भिन्न व्यवहार वाली प्रजातियां एक ही आवास को साझा करती हैं। संध्याकाल में जब सूरज की आखिरी किरणें विदा ले रही थीं, जंगल नाइटजार (Caprimulgus indicus) की मधुर 'चुर्र-चुर्र' ध्वनि ने वातावरण को संगीतमय बना दिया। वहीं जर्डन्स नाइटजार (Caprimulgus atripennis) अपनी खामोश उड़ान के साथ रहस्य का आवरण बनाए हुए था।

यह अवलोकन इस क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता को प्रमाणित करता है। स्थानीय लोगों की सक्रिय भागीदारी से संरक्षित यह पवित्र वन न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि वन्यजीवों का एक सुरक्षित आश्रयस्थल भी है। प्रकृति के इन अनमोल क्षणों को देखकर एक बार फिर समझ आता है कि पर्यावरण संरक्षण में सामुदायिक भागीदारी कितनी महत्वपूर्ण है!


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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