Bihar Vidhan Sabha Chunav Parinam 2025: बिहार विधानसभा चुनाव में एनडीए की सुनामी के मूल में मुख्य रूप से तीन कारण हैं मोदी मैजिक, निश्चय नीतीश और कुशल चु्नाव मैनेजमेंट। इस चुनाव में प्रतिद्ंवद्वी महागठबंधन की दयनीय पराजय इस बात का अलार्म है कि विपक्ष को अपनी रणनीति, चुनाव प्रबंधन और जनता की नब्ज पकड़ने वाले राजनीतिक ऑक्सीमीटर पर नए सिरे से विचार करना होगा। बिहार के नतीजों ने यह भी साफ कर दिया है कि सोशल मीडिया और चंद बुद्धिजीवियों द्वारा बनाई नकली हवा को ‘मायासभा’ मानकर की जाने वाली राजनीति का परिणाम यही होता है।
बिहार में एनडीए की यह विजय आरंभिक आंतरिक विवादों, मनमुटावों आशंकाओं के बावजूद मतदान की तारीख आते आते एक समन्वित, सामंजस्यपूर्ण और निश्चित लक्ष्य के साथ किए गए चुनाव प्रचार की भी जीत है। चुनाव की घोषणा से पहले जीत की जमीन लक्षित मतदाता समूहों को ध्यान में रखकर की गई लोक लुभावन योजनाओं की घोषणा और उन पर अमल (जिसे आम बोलचाल में रेवड़ी कहा जाता है) से तैयार की गई। मतदाताओं में यह विश्वास पैदा किया गया कि आर्थिक सशक्तिकरण के नाम पर सौगातों की यह बारिश सत्ता में वापसी के बाद भी जारी रहेगी। फिर चाहे वह डेढ़ करोड़ महिलाओं के खाते में 10 हजार रू. नकद हों, गरीबों को घर हों, गांव में बिजली हो, बेरोजगार ग्रेजुएटों को दो साल तक 1 हजार रू. प्रतिमाह भत्ता हो या फिर दिव्यांगों, बुजुर्गों, निराश्रितों की पेंशन बढ़ाकर लगभग तिगुनी करना हो, लोगों के आर्थिक सशक्तिकरण की ये बारूदी सुरंगें थीं, जो चुनाव के पहले बड़ी चतुराई से बिछा दी गई थीं।
बिहार चुनाव नतीजों ने पारंपरिक मान्यताओं को भी तोड़ा है। ये शायद पहली बार है, जब बिहार में जातीय गोलबंदी पर साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण हावी हुआ है। योगी आदित्यनाथ ने जिन 43 सीटों पर चुनाव प्रचार किया, भाजपा उनमें से 32 सीटें जीत रही है। राजद, कांग्रेस और वामदल मुसलमानों के वोट बैंक को अपनी एफडी मानते आए हैं, उसमें ओवैसी ने सेंध लगा दी है और मुसलमानों में यह सोच गहराया है कि उनका अपना भी कोई नेता होना चाहिए। इसी तरह राजद का यादव वोट भी दरका है।
मप्र के मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को यह महती जिम्मेदारी दी गई थी। उन्होंने जिन यादव बहुल 21 सीटों पर प्रचार किया, उनमें से ज्यादातर भाजपा के खाते में गई हैं। राजद के एमवाय समीकरण की जगह महिला यूथ का एक नया समीकरण उभरा है, जिसने एनडीए की जीत में अहम भूमिका नहीं निभाई। जिन प्रशांत किशोर को बड़ा खिलाड़ी माना जा रहा था, लगता है उन्हें अब फिर से अपने धंधे में लौटना पड़ेगा। यानी चुनावी रणनीतिकार खुद भी चुनाव जीते जरूरी नहीं है।
यह लगभग तय है कि नीतीश कुमार फिर पांचवी बार सीएम होंगे। इसका कारण उनकी लोकप्रियता तो है ही, केंद्र की एनडीए सरकार की मजबूती के लिए भी उनके समर्थन की जरूरत है। इन नतीजों का असर दूसरे राज्यों पर भी दिखाई देगा। विपक्षी नेता सार्वजनिक रूप से कुछ भी कहें लेकिन पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में ‘एसआईआर’ का मुद्दा उन्हें चुनाव नहीं जितवा पाएगा। अलबत्ता सभी सत्तारूढ़ पार्टियां रेवड़ी कल्चर को तेजी से अपनाएंगीं ताकि मतदाता का भरोसा जीता जा सके। इस चुनाव के बाद एनडीए आत्मविश्वास और बढ़ेगा तथा राज्य सभा में भी उसकी ताकत बढ़ेगी।
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