फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

एडजैक्ट पोलः बिहार के चुनाव में जो माई कहे, सो होई

सार

bihar election 2025 result exit poll and analysis and nda: हालांकि यह तो नतीजे के बाद ही साफ़ होगा, पर इतना तय है कि बिहार के पिछले तीन चुनावों (2010, 2015, 2020) में सत्ता की चाबी माई (महिलाओं) के हाथ में ही रही। इशारा साफ़ है, बिहार के चुनाव में जो माई कहे, सो होई।
विज्ञापन
बिहार चुनाव एग्जिट पोल 2025 - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

बिहार चुनाव के नतीजे की घड़ी आ गई है। सभी एग्ज़िट पोल के मुताबिक, “अबकी बार... फिर एनडीए सरकार।” अटकलें तो यह भी लग रही हैं कि जैसे रिकॉर्ड मतदान से इतिहास रचा गया, वैसे ही नतीजे भी रिकॉर्ड तोड़ होंगे यानी अब की बार... छप्पर फाड़। यह सच है कि बिहार लोकतंत्र की जननी है, तो जात-पात की धरती भी। इस संयोग के बीच बिहार ने कई बार प्रयोग किए हैं। बंपर मतदान से अक्सर बदलाव का सियासी आकलन लगाया जाता रहा है, खासकर तब जब अचानक मतदान के आंकड़े में पांच फीसदी का इज़ाफ़ा हो जाए या अब तक का सर्वाधिक रिकॉर्ड बने।

विज्ञापन


सवाल यह है कि क्या इस बार का सबसे बंपर मतदान भी बदलाव का संकेत है, या इसके उलट सरकार के बचाव का कवच? हालांकि यह तो नतीजे के बाद ही साफ़ होगा, पर इतना तय है कि बिहार के पिछले तीन चुनावों (2010, 2015, 2020) में सत्ता की चाबी माई (महिलाओं) के हाथ में ही रही। इशारा साफ़ है, बिहार के चुनाव में जो माई कहे, सो होई।

महिलाओं का निर्णायक मतदान

आंकड़े बताते हैं कि इस बार महिलाओं ने बंपर मतदान किया है। बिहार के सात जिलों में महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले 14 फीसदी ज़्यादा मतदान किया, जबकि दस जिलों में यह अंतर 10 फीसदी से भी अधिक रहा। कुछ जिलों में तो महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में 20 फीसदी तक ज़्यादा मतदान किया। समूचे बिहार का औसत महिला मतदान 71.78% रहा, जो पुरुषों के 62.98% से लगभग 10% आगे है। 2020 में यह अंतर मात्र 5% था। उस समय एनडीए में अंदरूनी खींचतान थी नीतीश बेबस और मोहरा दोनों थे, और ‘हनुमान’ (चिराग) उछल-कूद कर रहे थे। 2020 में पुरुष मतदाता 54.7% वोट डालने पहुंचे, जबकि महिलाओं ने 59.69% मतदान किया और नतीजे में एनडीए को 125 सीटें मिलीं, बहुमत से तीन अधिक। 2015 में भी यही रुझान था — महिलाओं का मतदान पुरुषों से लगभग पाँच फीसदी अधिक रहा, और नीतीश की सरकार बनी। इन चुनावों में महिलाओं पर शराबबंदी, उज्ज्वला गैस, इज्जत घर, स्कूटी-साइकिल जैसी योजनाओं का जादू चला। और अब एक बार फिर वही समीकरण लौटता दिख रहा है।  

माई बनाम माई : नया समीकरण

इस बार की लड़ाई माई (महिला-युवा) बनाम माई (मुस्लिम-यादव) की रही। नीतीश और मोदी ने भाई बनकर माई (महिला मतदाताओं) का दिल जीत लिया। महिलाओं को ₹10,000 नकद का वादा मास्टर स्ट्रोक साबित हुआ, वहीं स्थानीय महिलाओं को नौकरियों में आरक्षण का गणित भी नीतीश के पक्ष में गया।

दूसरी ओर मुस्लिम-यादव एका में ओवैसी फैक्टर ने असर डाला। वोट बंटे और कटे। मुस्लिम प्रभावी सीमांचल में भी महिला मतदाताओं ने बढ़-चढ़कर मतदान किया। किशनगंज में 19.5%, अररिया में 14.43%, पूर्णिया में 13.36%, और मधेपुरा में 14.24% अधिक मतदान किया। “जिसका खाएंगे, उसका गाएंगे” सीमांचल की महिलाओं का यह दो टूक जवाब चर्चित हुआ। मिथिलांचल, गोपालगंज, सीवान, सीतामढ़ी, सहरसा, चंपारण, खगड़िया, सुपौल और बांका जैसे जिलों में भी महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में 10-15% अधिक मतदान किया।
विज्ञापन


राहुल-तेजस्वी की सभाओं में मां की गाली के मुद्दे को उठाकर मोदी ने महिलाओं की सहानुभूति भी बटोरी। वहीं प्रशांत किशोर के “शराबबंदी खत्म करने” के बयान ने महिलाओं को नाराज़ किया। बिहार में शराब ने हजारों घर उजाड़े हैं ऐसे में पीके के खिलाफ़ महिलाओं का आक्रोश स्वाभाविक था। इससे नीतीश के प्रति सहानुभूति और मज़बूत हुई। कोरोना काल की राशन योजना ने भी महिलाओं का भरोसा बढ़ाया। नतीजा यह कि माई (महिला मतदाताओं) की बदौलत एग्ज़िट पोल सटीक साबित हो सकते हैं।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

 

 

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें