खबर है कि पटना में कांग्रेस विधायक दल का नेता चुने जाने के लिए शुक्रवार को बुलाई गई बैठक में हाथापाई की नौबत आ गई। बिक्रम से विधायक सिद्धार्थ सौरभ ने विजय शंकर के खिलाफ नारेबाजी की। और अंत में विधायक दल का नेता चुनने के लिए सोनिया गांधी को अधिकृत किया गया।
हाईकमान के हस्तक्षेप के बाद भागलपुर से मामूली मतों से जीते अजीत शर्मा को विधायक दल का नेता बना दिया गया। दूसरी खबर यह है कि एनडीए के घटक दलों के प्रमुखों संग बैठक में 15 नवंबर को नेता चुनने पर औपचारिक फैसला होगा। फैसला राजग के सभी नवनिर्वाचित विधायक मिलकर करेंगे।
नीतीश का नेता चुना जाना तय है। इन दोनों घटनाक्रम में अप्रत्याशित कुछ भी नहीं। दोनों में अंतर है तो बस भाजपा और कांग्रेस का। एक घटनाक्रम में यह झलकाने की कोशिश की गई है कि एनडीए में नेता का चुनाव नवनिर्वाचित विधायक मिलकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से करेंगे।
दूसरे घटनाक्रम में जूतमपैजार के बाद विधायक दल नेता का चुनाव नवनिर्वाचित विधायकों के बदले कांग्रेस हाईकमान को करना पड़ा। भाजपा के दो से यहां तक पहुंचने के सफर और कांग्रेस के सिकुड़ने को बिहार चुनाव के ताजा घटनाक्रम से महसूस किया जा सकता है।
कांटे की टक्कर में एनडीए के चुनाव जीतने पर नरेंद्र मोदी ने दिल्ली भाजपा मुख्यालय में मेगा शो कर मामूली जीत को न केवल बड़े जश्न में तब्दील कर दिया, बल्कि पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया। एनडीए के बहुमत से महज तीन सीटें ज्यादा हासिल करने पर भाजपा ने इसे बड़ी जीत साबित करने की कोशिश की।
जश्न बिहार की जीत का था लेकिन जोश बंगाल के लिए भरा जा रहा था। भाजपा अब बिहार में आत्मनिर्भर हो चुकी है। उसे बंगाल में अपने पैरों पर खड़ा होना है। मौत से मत को जोड़ने और कार्यकर्ताओं की हत्याओं की निंदा कर मोदी ने बंगाल का लक्ष्य साफ कर दिया। असल में बिहार के इसी नतीजे ने बंगाल के लिए भाजपा के सामने चुनौती भी रख दी है।
बिहार में वामदलों ने शानदार प्रदर्शन किया। बंगाल में भाजपा को जहां ममता से लड़ना है, वहीं वामपंथ की पुरातन धरती पर कमल खिलाने की चुनौती है। जब बिहार में मतदान का दौर चल रहा था, तो भाजपा के चाणक्य बंगाल की धरती पर कमल खिलाने के होमवर्क में जुट चुके थे।
दक्षिणेश्वर काली की पूजा-अर्चना और भात खाकर वह बंगाल की नब्ज टटोलने के साथ-साथ एजेंडा सेट कर रहे थे। इससे पहले भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा भी बंगाल हो आएं हैं। चर्चा रही कि पूरे बिहार चुनाव में कहीं भी भाजपा के चाणक्य नजर नहीं आएं।
जब बंगाल के चुनाव हों तब भी शायद वह लोगों और सियासी विश्लेषकों को नजर न आएं। तब उनकी जेहन में शायद यह याद न रहे कि नतीजे में जब बिहार खास था तो बंगाल से आस था। चाणक्य अपनी नीति-रणनीति तैयार करने में बंगाल में जुट चुके थे। बिहार में भी ऐसा ही हुआ था।
चुनाव से तीन महीने पहले कोरोना संकट में उन्होंने न केवल ताबड़तोड़ वर्चुअल रैलियां कीं, बल्कि नीतीश के साथ-साथ सहयोगियों और विरोधियों का मन-मिजाज पढ़ चुके थे। भाजपा की यह तीन स्तरीय तैयारी को दर्शाता है। अमित शाह, जेपी नड्डा और फिर मोदी का फाइनल स्ट्रोक।