क्या आरक्षण को लेकर एक समीक्षा यह नहीं होनी चाहिए कि कौन सी ऐसी जातियां हैं, जो आरक्षण के दायरे में आती हैं?
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क्या नहीं उठने चाहिए ये सवाल?
क्या देश को स्वयं से यह सवाल नहीं पूछना चाहिए कि जब हमारा तिरंगा चांद पर पहुंच गया तो जाति के आधार पर राजनीति से हटकर देश की मूल समस्याओं जैसे:- गरीब उन्मूलन, लैंगिक असमानता को दूर करना, शिक्षा का स्तर ऊंचा उठाना, रोजगार के अवसर पैदा करना, नए आविष्कार करना, जल संकट दूर करना जैसे मुद्दों पर केंद्रित नहीं होना चाहिए।
क्या आरक्षण को लेकर एक समीक्षा यह नहीं होनी चाहिए कि कौन सी ऐसी जातियां हैं, जो आरक्षण के दायरे में आती हैं, लेकिन उन्हें आज भी इसका लाभ नहीं मिला है।
कुछ खास जातियों को ही आरक्षण का लगातार लाभ मिल रहा है या जिन परिवारों ने एक बार आरक्षण का लाभ ले लिया, वही लगातार आरक्षण के लाभ को लेते आ रहे हैं। जातीय जनगणना के साथ आरक्षण का लाभ ले चुके परिवारों और नहीं लाभ लेने वाले परिवारों की जानकारी भी दी जानी चाहिए। साथ ही, आर्थिक आधार पर भी जातियों की गणना होनी चाहिए। क्रीमीलेयर को सख्ती से निर्धारित किया जाना चाहिए। आज ऐसे बहुत से उदाहरण देखने को मिल जाएंगे, जहां परिवार बहुत संपन्न है, लेकिन वह आरक्षण का लाभ जाति के नाम पर ले रहा है।
जाति के आधार पर नए सिरे से आरक्षण की मांग तो उठेगी, लेकिन उसमें उन आरक्षित परिवारों पर ज्यादा फोकस करने की जरूरत है, जिनका उद्धार अभी तक आरक्षण से नहीं हुआ है। आरक्षण की कितनी सीमा रखी जाए, इस पर भी सभी राजनीतिक दलों को बैठकर सोचने की जरूरत है, क्योंकि मेरिट भी जरूरी है।
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