उत्तर बिहार ने जनादेश दिया है कि इस एनडीए सरकार को अभी और मौका मिलना चाहिए।
बिहार प्रशासनिक रूप से जरूर एक इकाई है, मगर भौगोलिक और सामाजिक रूप से दो हिस्सों में साफ बंटा नजर आता है। उत्तर बिहार और दक्षिण बिहार। गंगा नदी इसे दो हिस्से में बांटती है। मगर अब तक कभी राजनीतिक सोच को लेकर ऐसा विभाजन बिहार में नहीं दिखा था, जैसा इस बार दिखा है।
दक्षिण बिहार के मतदाताओं ने जहां महागठबंधन को भरपूर समर्थन दिया है। वहीं उत्तर बिहार में चंपारण से लेकर मिथिला और कोसी तक ज्यादातर सीटों पर एनडीए विजयी हुई है।
यह इसलिए भी दिलचस्प है, क्योंकि अब तक उत्तर बिहार के लोग बिहार सरकार पर उनकी उपेक्षा का आरोप लगाते रहे हैं। नीतीश सरकार पर यह आरोप लगते रहे हैं कि उनका विकास गंगा नदी को पार नहीं कर पाता है। इसके बावजूद उत्तर बिहार ने जनादेश दिया है कि इस एनडीए सरकार को अभी और मौका मिलना चाहिए।
हालांकि यह समर्थन नीतीश को कम और भाजपा को अधिक है। यह भी दिलचस्प है कि दक्षिण बिहार में लेफ्ट की ताकत ने महागठबंधन को मजबूत किया है, तो पूरे उत्तर बिहार में भाजपा और एमआईएम जैसी दक्षिणपंथी ताकतें मजबूत हुई हैं। दिलचस्प इसलिए भी है कि दक्षिण बिहार और उत्तर बिहार में एक बड़ा फर्क आर्थिक विकास का भी है।
दक्षिण बिहार अमूमन विकसित माना जाता है और उत्तर बिहार में बाढ़ और पलायन का प्रकोप अधिक है और वह इलाका गरीब और पिछड़ा माना जाता है। तो क्या गरीब आबादी के बीच दक्षिणपंथ का और संपन्न इलाकों में वामपंथ का क्रेज बढ़ा है?
हालांकि ये सब संकेत अभी बहुत शुरुआती हैं और इन्हें अभी स्टैब्लिश होना है। मगर इन संकेतों को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
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