Climate Change in India: आज पूरी दुनिया जलवायु परिवर्तन, हीट वेव, सूखा, पानी के संकट और अनियमित वर्षा जैसी समस्याओं से जूझ रही है। इस समस्याओ का समाधान ढूंढने में लगे वैज्ञानिक और पर्यावरणविद क्लाइमेट एडाप्टेशन, नेचर बेस्ड सॉल्यूशन और सस्टेनेबल लिविंग जैसे नए सिद्धांत गढ़ रहे हैं। लेकिन जब हम थोड़ा पीछे मुड़कर देखते हैं तो भारत का लोकजीवन इन सिद्धांतों को सदियों पहले अपने त्योहारों, व्रतों, भोजन, खेती और सामाजिक व्यवहार आदि की परम्पराओं में प्रकृति के प्रति गहरे जुडाव को अपना हिस्सा बना चुका था।
चैते गुड़, बैसाखे तेल, जेठे पन्थ असाढ़े बेल।
सावन साग न भादों दही, क्वार करेला न कातिक मही।।
अगहन जीरा पूसे धना, माघे मिश्री फागुन चना।
ई बारह जो देय बचाय, वहि घर बैद कबौं न जाय।।
लोक परंपराओं का एक महत्वपूर्ण पक्ष सामुदायिक सहभागिता भी है। सामूहिक रूप में गर्मी के दिनों में राहगीरों के लिए प्याऊ लगाना, पक्षियों के लिए पानी रखना, चीटियों के लिए गुड डालना, पशुओं के लिए अलग से पानी की व्यवस्था और वृक्षों की सिंचाई करना धार्मिक कर्तव्य माने जाते थे।आज जब जलवायु परिवर्तन के कारण पक्षियों और वन्यजीवों का अस्तित्व संकट में है, तब ये परंपराएं और भी प्रासंगिक हो जाती हैं।
इस लोक-परंपराओं का सबसे महत्वपूर्ण आयाम इसकी 'जीरो कार्बन' और पूरी तरह स्थानीय जीवनशैली है। इन त्योहारों में उपयोग होने वाले सभी खाद्य पदार्थ जैसे—सत्तू, आम पन्ना, बेल का शरबत, जौ और मट्ठा—पूरी तरह स्थानीय होते हैं। इनके रख-रखाव या ठंडा रखने के लिए किसी रेफ्रिजरेटर या भारी बिजली की आवश्यकता नहीं होती, बल्कि मिट्टी के घड़े और सुराही के पारंपरिक विज्ञान का उपयोग किया जाता है। आज जब पूरी दुनिया 'क्लाइमेट चेंज' और ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए महंगे और कृत्रिम तरीके ढूंढ रही है, तब हमारी ये सदियों पुरानी ग्रीष्मकालीन परंपराएं बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए, न्यूनतम संसाधनों में शरीर को भीतर से ठंडा रखने का एक बेहद व्यावहारिक और प्रकृति-अनुकूल मार्ग दिखाती हैं।
आज जब पूरी दुनिया टिकाऊ विकास का मार्ग खोज रही है, तब भारत की धार्मिकता से ओत-प्रोत ऋतु-आधारित लोक परंपराएं केवल सांस्कृतिक धरोहर नहीं, बल्कि वर्तमान की पर्यावरणीय नीति की प्रेरणा बन सकती हैं। हमारे पूर्वजों ने प्रकृति पर विजय पाने का स्वप्न नहीं देखा था; उन्होंने उसके साथ चलना सीखा था। शायद इसी कारण उन्होंने त्योहारों को कैलेंडर की तिथियों से नहीं, बल्कि ऋतुओं की धड़कनों से जोड़ा, उसे किस्सों कहानियो में पिरोया, धार्मिकता का रंग दे पुण्य पाप से जोड़ा ताकि सम्पूर्ण समाज प्रकृति के साथ के ताने बाने में सुचारू रूप से जुड़ सके।
यदि हम इन परंपराओं को अतीत का अवशेष मानकर भूल जाएंगे, तो केवल अपनी संस्कृति ही नहीं खोएंगे, बल्कि उस जीवन-दर्शन को भी खो देंगे, जो भारतीय सभ्यता ने हजारो साल की अपनी यात्रा में प्रकृति के साथ असाधारण रूप से तालमेल के साथ जीना सिखा है। प्रकृति के साथ इस कठिन दौर में भारतीय लोकजीवन का यही संदेश सबसे अधिक प्रासंगिक है-प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सहजीवन ही भविष्य का मार्ग है।
दुर्भाग्य से आधुनिक जीवनशैली में इन परंपराओं को केवल कर्मकांड मानकर छोड़ दिया गया है। परिणामस्वरूप हम उनके भीतर छिपे पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संबंधी ज्ञान से भी दूर होते जा रहे हैं। यदि हम इन परंपराओं को वैज्ञानिक दृष्टि से समझें तो स्पष्ट होगा कि ये मौसम के अनुरूप जीवन जीने की संपूर्ण जीवन-पद्धति प्रस्तुत करती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि इन लोक परंपराओं को अंधविश्वास या रूढ़ि के रूप में नहीं, बल्कि जलवायु अनुकूलन के भारतीय मॉडल के रूप में देखा जाए। विद्यालयों में इनके वैज्ञानिक पक्ष को पढ़ाया जाए, स्थानीय समुदायों के अनुभवों का दस्तावेजीकरण किया जाए और आधुनिक जलवायु नीतियों में पारंपरिक ज्ञान को उचित स्थान दिया जाए।
यदि हम इन लोक परंपराओं को केवल धार्मिक कर्मकांड न मानकर पारंपरिक जलवायु ज्ञान के रूप में पुनः समझें, तो वे आज की जलवायु चुनौतियों से निपटने के लिए प्रेरक और व्यवहारिक दोनों सिद्ध हो सकती हैं। भारतीय संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता यही रही है कि उसने ऋतुओं को केवल कैलेंडर का हिस्सा नहीं माना, बल्कि जीवन जीने की संपूर्ण पद्धति का आधार बनाया। पिछले पांच दशको के वैश्विक प्रयासों से इतना तो मान लिया गया है कि जलवायु चुनौतियों का समाधान केवल अत्याधुनिक तकनीकों से संभव नहीं है, बल्कि हमाररी उन साधारण-सी दिखने वाली परंपराओं में भी छिपा हो सकता है, जो सदियों से मानव, प्रकृति और ऋतुओं के बीच संतुलन बनाए रखने का कार्य करती रही हैं। भारतीय लोकजीवन हरकदम पर हमें एक रास्ता दिखाता कि प्रकृति पर विजय नहीं, बल्कि उसके साथ सामंजस्य ही स्थायी विकास और सुरक्षित भविष्य का वास्तविक मार्ग है।
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